About Me

My photo
Greater Noida/ Sitapur, uttar pradesh, India
Editor "LAUHSTAMBH" Published form NCR.

हमारे मित्रगण

विजेट आपके ब्लॉग पर

Monday, June 27, 2011

(71) कैसे चुप रहूँ मैं ?

नहीं फितरत, धधकता आग के जैसा रहूँ मैं ,
नहीं आदत,कि शोलों सा भड़कता ही रहूँ मैं ,
मगर जब अन्नदाता स्वयं भूखा मर रहा हो ,
जवाँ इस देश का , खुद आप से ही लड़ रहा हो ,
सिसकती बेटियों के जिस्म नोचे जा रहे हों ,
वतन को बेच , रखवाले वतन के खा रहे हों ,
हो अंधा देश का क़ानून , तो कैसे सहूँ मैं ?
ये सब कुछ देख, आँखें फेर कैसे चुप रहूँ मैं ?

उठायी थी कलम यह सोच कर, सत्पथ चलूँगा ,
अँधेरे रास्तों को दीप बन रोशन करूंगा  /
थीं तब भी अड़चनें सन्मार्ग पर, इतनी नहीं थीं,
अँधेरे बढ़ रहे थे, पर कंदीलें जल रही थीं ,
वो था वह दौर जब इन्सानियत कुछ-कुछ मरी थी ,
चमन में रोग था , पर पत्तियाँ तब तक हरी थीं /
थे जो भी बागवाँ, वे स्वार्थ में अंधे नहीं थे ,
जमीं के लोग थे वे ,इस तरह नंगे नहीं थे /

मगर इस दौर सारे मुल्क में उल्टी हवा है,
हर एक डाली पे उल्लू है, बताओ क्या दवा है ?
चमन में फूल, पत्ती, फल नहीं, गुब्बार है अब ,
शज़र को क्या कहें, मिट्टी तलक बीमार है अब /
जरूरत है दवाई की चमन को,खाद- पानी की ,
सफाई की, निराई की, हिफाज़त, निगहबानी की /
हवा कुछ कह रही है,सुन तो लो सरगोशियाँ उसकी,
वो शायद पूछती है,अब हिफाज़त कैसे हो इसकी ?
     
   

9 comments:

रविकर said...

बहुत ही प्रभाव शाली आक्रोश --
जबरदस्त तारतम्य ||
बधाई ||

रविकर said...

प्रेम-क्षुदित व्याकुल जगत, मांगे प्यार अपार |
जहाँ कहीं देना पड़े, कर देता है मार ||


आम सभी बौरा गए, खस-खस होते ख़ास |
दुनिया में रविकर मिटै, मिष्ठी-स्नेह-सुबास ||


सरपट बग्घी भागती, बड़े लक्ष्य की ओर |
घोडा चाबुक खाय के, लखे विचरते ढोर ||


चले हुए नौ-दिन हुए, चला अढ़ाई कोस |
लोकपाल का करी शुभ्र, तनिक होश में पोस || करी = हाथी


कुर्सी के खटमल करें, मोटी-चमड़ी छेद |
मर जाते अफ़सोस पर, पी के खून सफ़ेद |

रविकर said...

सोखे सागर चोंच से, छोट टिटहरी नाय |
इक-अन्ने से बन रहे, रुपया हमें दिखाय ||

सौदागर भगते भये, डेरा घुसते ऊँट |
जो लेना वो ले चले, जी-भर के तू लूट ||

कछुआ - टाटा कर रहे , पूरे सारोकार |
खरगोशों की फौज में, भरे पड़े मक्कार ||

कोशिश अपने राम की, बचा रहे यह देश |
सदियों से लुटता रहा, माया गई विदेश ||

कोयल कागा के घरे, करती कहाँ बवाल |
चाल-बाज चल न सका, कोयल चल दी चाल ||

प्रगति पंख को नोचता, भ्रष्टाचारी बाज |
लेना-देना क्यूँ करे , सारा सभ्य समाज ||

रिश्तों की पूंजी बड़ी , हर-पल संयम *वर्त | *व्यवहार कर
पूर्ण-वृत्त पेटक रहे , असली सुख *संवर्त || *इकठ्ठा

मनोज कुमार said...

बहुत सशक्त संदेश देती रचना।

S.N SHUKLA said...

Ravikar ji,
Manoj ji,

Aabhari hoon ap dwara kee gayee prashansa ke prati,dhanyawad.

नीरज गोस्वामी said...

इस सार्थक रचना के लिए ढेरों बधाई स्वीकारें...

नीरज

dipak kumar said...

bahut sundar s.n shukla ji aapka mere blog me aane ke lye abhar mai aapki kya maadad kar saktu hu kripya spast sabdo me bataye mahandaya hogi

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सशक्त रचना ...

S.N SHUKLA said...

Neeraj ji,
Deepak ji,
Sangeeta ji,
aap logon ka bahut- bahut aabhar.