सब कहते भ्रष्टाचार बहुत , यह लोकतंत्र बीमार बहुत ,
सब कहते समय खराब ,और सब कहते अत्याचार बहुत /
औरों की देखादेखी जब , क्षमता से कई गुना चाहत ,
तो फिर कैसे मिल पायेगी ,इस भ्रष्ट व्यवस्था से राहत ?
सब चाह रहे फिर भगत सिंह , सब चाह रहे फिर हों सुभाष ,
सब चाह रहे आज़ाद और बाघा जतीन हों आस-पास /
वे पैदा हों, संघर्ष करें , पर केवल औरों के घर हों ,
अम्बानी, टाटा , डालमिया , बिड़ला हों तो मेरे घर हों /
बस यही चाह , इस लोकतंत्र की सफल राह का काँटा है,
सोचो! खुद को तुमने ही तो , सांचों - खेमों में बांटा है /
मीठा हप- हप , कड़वा थू- थू , उपदेशों की बांचें पोथी ,
बाहर उजले, अन्दर मैले , यह कैसी राजनीति थोथी ?
जब हो चुनाव तो , जाति - धर्म की करते हो पैरोकारी ,
खुद जान - बूझकर पैदा की, अब कहते इसको बीमारी /
बोलो संसद में किसने भेजे, चोर , लुटेरे , जमाखोर ,
जब बार- बार गलती अपनी , तो मचा रहे क्यों व्यर्थ शोर ?
यह भ्रष्टाचार एक दिन में , नाले से सागर नहीं बना ,
यह अनाचार - रिश्वतखोरी भी अनायास तो नहीं तना /
यह देन तुम्हारी खुद की है , तुमने ही इसको पोषा है ,
लेकिन जब खुद को दर्द हुआ , तो खुद तुमने ही कोसा है /
मैं भी अन्ना - मैं भी अन्ना , सड़कों पर चिल्लाने वालों,
झूठे सपनों, थोथे नारों से , मन को बहलाने वालों /
तुम में से ऐसे कितने हैं , जो खुद हैं पाक- साफ़ बोलो,
जब खुद का ही दामन मैला, तो पहले तोलो फिर बोलो /
पहले अपना मन साफ़ करो, अपनी गलती भी स्वीकारो ,
फिर गलत दिखे चाहे कोई , गिनकर सौ- सौ जूते मारो /
जैसे व्यभिचारी , चोर और मिर्गी की औषधि जूता है ,
बस उसी तरह इस भ्रष्ट व्यवस्था का इलाज भी जूता है /
- एस.एन.शुक्ल






