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Saturday, December 29, 2012

(174) झूठ बोलो

                   

         "झूठ बोलो"

                                  

सच ! सियासत क्या,अदालत में भी अब मजबूर है,
झूठ  बोलो,  झूठ  की  कीमत  बहुत  है  आजकल।

जो  शराफत  ढो  रहे  हैं , हर  तरह  से  तंग  हैं ,
बदगुमानों की कदर, इज्जत बहुत है आजकल।

छोड़िये ईमानदारी , छोड़िये रहम-ओ-करम,
लूट कर भरते रहो घर, मुल्क में ये ही धरम ,

हर तरफ  बदकार,  दंगाई ,  फसादी,  राहजन ,
इनपे ही सरकार की रहमत बहुत है आजकल। 

जुल्म, बेकारी,गरीबी, मुफलिसी के देश में,
हैं लुटेरों  की जमातें , साधुओं  के वेश  में ,

हर  हुकूमत  की बड़ी कुर्सी पे,  एक मक्कार है,
सिर झुकाओ, इनकी ही कीमत बहुत है आजकल।

                                                -एस .एन .शुक्ल 

Friday, December 7, 2012

(173) कौन करता है इबादत ?

कौन करता है इबादत , सब तिजारत कर रहे ,
ख्वाहिशें पसरी  हुई  हैं ,  हर  इबादतगाह  में।

भीड़ से ज्यादा  कहीं अब , मन्नतों  की  भीड़ है,
चर्च, गुरुद्वारों, शिवालों, मस्जिद-ओ-दरगाह में।

कितनी खुदगर्जी , कि सौदेबाजी भी भगवान से,
भीख   देते  , रहमतें  हैं   देखते   अल्लाह   में।

मजहबों   के   रहनुमा ,   धर्मोपदेशक ,  पादरी ,
सबके सब बगुला भगत, दौलत है सबकी चाह में।

धर्म भी धंधा हुआ , सब कुछ बिकाऊ है यहाँ ,
चलना मुश्किल हो रहा, पगडंडियों की राह में।

बेअकल ,  बेभाव  बिकते  रोज  इस   बाज़ार  में ,
फिर भी कितनी भीड़, हर दूकां पे ख्वाहम-ख्वाह में।

                                  - एस .एन .शुक्ल 

Sunday, December 2, 2012

(172) मुक्तक

                                                 मुक्तक
                                               (1)

 हवस  इनसान को  अंधा बना देती है ,  ये सच है।
 हवस  किरदार  को गंदा बना  देती है ,  ये सच है।
हवस  में आदमी , फिर आदमी रह ही कहाँ जाता ,
हवस , इज्जत को भी  धंधा बना देती है , ये सच है।
                                        (2)
अँधेरे हर  कदम  के   सामने ,  हर  ओर  खतरा  है।
समंदर है  ये  दुनिया  और  बस  इनसान कतरा  है।
वो किश्मत हो , कि दौलत हो कि इज्जत हो कि शोहरत हो,
बलंदी पर  बशर जब  भी पहुंचता  है , तो खतरा है।
                                 (3)
जवानी में , जमाने  की  किसे परवाह होती है।
वहाँ बस आग होती है, वहाँ बस आह होती  है।
बहुत कम लोग बच पाते हैं, इस तूफाँ के मंज़र से,
बहुत मुश्किल जवानी की, ये जालिम राह होती है।

                                   - एस . एन . शुक्ल 

Thursday, October 18, 2012

(171) कुछ शेर

                                     खुदा 

ज़न्नत  है  आसमान में , ये तो  पता नहीं ,
दोजख जमीन पर है , इसका इल्म है हमें।

जो आसमान पे है उस खुदा का खौफ क्या ,
खुद को खुदा समझने वाले आदमी से डर।

हमको लगता है, खुदा बन्दों से खुद खाता है खौफ ,
इसलिए  चाहे  जो हो , वह  सामने  आता  नहीं।

कौन  कहता  है  , खुदा   आदमी   ईजाद  है,
आदमी खुद ही खुदा बनाने लगा है आजकल। 

कौन करता है इबादत, सब तिजारत कर रहे ,
हर  इबादतगाह  में , हैं  ख्वाहिशें पसरी  हुई।

मन्नतों को जो इबादत का नाम देते हैं ,
वो सौदेबाज हैं , झूठी है इबादत उनकी।

           -एस .एन .शुक्ल 

Wednesday, October 10, 2012




















(170) वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।

तेल  बाती  से  परिपूर्ण  हूँ , मुग्ध  हूँ ,
प्रज्ज्वलन की मिली पर कला ही नहीं।
वे  दमकते  रहे ,  मैं  तमस  से  घिरा ,
वह  दिया  हूँ ,  कभी जो जला ही नहीं।

सैकड़ों सांझ ले आस जीता रहा ,
कोई स्पर्श दे , थपथपाये मुझे ,
मेरी बाती को भी, कोई निज ज्योति से ,
जोड़ , स्पन्दित कर जगाये मुझे ,
पर वो हतभाग्य हूँ मैं, कि जिसका कभी ,
कोई जादू किसी पर चला ही नहीं।
वे  दमकते  रहे ,  मैं  तमस  से  घिरा ,
वह  दिया  हूँ ,  कभी जो जला ही नहीं।

मैं छुआ जब गया , तो ललकने लगा,
नेह नैनों से बाहर छलकने लगा।
मैं भी मानिन्द उनकी प्रभा दूंगा अब ,
सोच मन , बालमन सा किलकने लगा।
पर वही ढाक के पात बस तीन से ,
वह विटप हूँ , कभी जो फला ही नहीं।
 वे  दमकते  रहे ,  मैं  तमस  से  घिरा ,
वह  दिया  हूँ ,  कभी जो जला ही नहीं।

दर्द इसका नहीं, मैं जला क्यों नहीं,
दर्द यह है , तमस से लड़ा क्यों नहीं,
जब अँधेरे रहे फ़ैल थे हर तरफ ,
तो उन्हें रोकने , मैं बढ़ा क्यों नहीं।
हिम सदृश शांत , विभ्रांत प्रश्तर बना,
उस तपन में भी किंचित गला क्यों नहीं।
 वे  दमकते  रहे ,  मैं  तमस  से  घिरा ,
वह  दिया  हूँ ,  कभी जो जला ही नहीं।
                           - एस .एन .शुक्ल 

Saturday, September 29, 2012

(169) अलग फितरत से खुद को कर नहीं पाते

परिंदों के घरौंदों को , उजाड़ा था तुम्हीं ने कल ,
मगर अब कह रहे हो , डाल पर पक्षी नहीं गाते।

तुम्हीं थे जिसने वर्षों तक , न दी जुम्बिश भी पैरों को ,
शिकायत किसलिए , गर दो कदम अब चल नहीं पाते ?

वो पोखर , झील , नदियाँ , ताल सारे पाटकर तुमने ,
बगीचे  ,  पेड़  -  पौधे ,  बाग़  सारे  काटकर  तुमने   ,

खड़ी अट्टालिकाएं कीं , बनाए  महल - चौमहले  ,
मगर अब कह रहे , बाज़ार में भी फल नहीं आते।

ये कुदरत की , जो बेजा दिख रही तसवीर है सारी ,
तुम्हारी  ही  खुराफातों  की ,  ये  तासीर  है  सारी  , 

वही  तो  काटना  है  पड़  रहा  , बोते  रहे  जो  कुछ ,
मगर फिर भी ,अलग फितरत से खुद को कर नहीं पाते।

                                          - एस .एन .शुक्ल 

Saturday, September 22, 2012

(168) नदी सागर से मिले है

उम्मीद की  दरिया में  कवँल  कैसे  खिले  है ,
लम्हों की खता की सज़ा , सदियों को मिले है।

मज़बूर बशर की कोई सुनता नहीं सदा ,
वह बेगुनाह होके भी , होठों को सिले है।

इनसान की फितरत में ही , इन्साफ कहाँ है,
जर, जोर, ज़बर हैं जहां , सब माफ़ वहाँ  है।

हर दौर गरीबों पे सितम , मस्त सितमगर ,
कब  मंद  हवा से  कोई ,  कोहसार  हिले है ?

कुदरत का भी उसूल ये, कमजोर झुके है ,
सागर नहीं मिलते , नदी सागर से मिले है।

                        - एस .एन . शुक्ल 

Thursday, September 13, 2012

(167) हिन्दी हमारी मातृभाषा है

ज्यों गंगा संग विविध नदियाँ , सरस्वति है , कालिंदी है  /
त्यों अपनी अन्य सखियों संग , बड़ी बहना सी हिन्दी है  /
इसी में  कृष्ण  का  शैशव ,  इसी  में  राम  का  वैभव ,
ये भारत भाल चन्दन  है , ये  भारत  माँ की  बिंदी है  /

यहाँ   उर्दू  है  ,  बंगाली  ,  मराठी  और  गुज़राती ,
तमिल, तेलगू , असमिया और मलयालम मेरी थाती /
गुरुमुखी , कोंकड़ी , कन्नड़ हैं, उड़िया , डोंगरी भी हैं  ,
हमें हरियाणवी , मैथिलि , मिजो भी ,मणिपुरी भाती /

सगी बहनें ये हिन्दी की , वो  माँ है  तो ये मासी  हैं  ,
कहा जाता  है  भाषाएँ  ये , संस्कृत  की  नवासी हैं  ,
न होती माँ से मासी कम , मिले समवेत अपनापन ,
हमें है गर्व खुद पर , क्योंकि हम बहु भाषाभासी हैं  /


महक तुलसी की हिन्दी में , यही कबीरा की बानी है ,
ये है  रसखान  का  अनुनय  , यहीं  मीरा  दीवानी है  ,
शिवा की  बावनी  भूषण , रचाते  हैं  यहाँ  विधि से ,
ये है जगनिक का आल्हाखण्ड , वीरों की कहानी है  /

महादेवी का निर्झर स्नेह , तो फक्कड़ निराला है  ,
यहाँ बच्चन की मधुशाला में, हाला और प्याला है ,
बिहारी , सूर , जयशंकर , घनानंद और रहिमन हैं ,
यहीं नागर के नटवर हैं , तो रतनाकर की माला है  /

जायसी , पन्त , केशव, देव , दिनकर और पदमाकर ,
गिनाएं नाम कितने , व्योम है , धरती है , यह सागर  ,
ये हिन्दी ! हिंद का गौरव , करोड़ों जन की आशा है  ,
न  भाषा मात्र  यह  ,  हिन्दी  हमारी  मातृभाषा  है /

                                 - एस एन  शुक्ल 

Wednesday, September 12, 2012

(166) दीवाना बना डाला

      
हकीकत को तेरी इक जिद ने अफसाना बना डाला /
तेरी  मासूमियत  ने , मुझको   दीवाना  बना डाला /

ये दुनिया भी तेरी ही हमनवा , दुश्मन हमारी है ,
तुझे रोशन शमा  ,तो मुझको परवाना बना डाला /

तू समझे या न समझे , अपने दिल को तेरी फुरकत में ,
हमेशा  के  लिए  मैंने  ,  सनमखाना  बना  डाला /

तेरी ही याद की वर्जिश , सुबह से शब् तलक हर दम ,
ये दिल अब दिल कहाँ है,  दिल को जिमखाना बना डाला /

मैं फाकेमस्त हूँ  , मुझको ज़मीं ज़र की ज़रुरत क्या ,
तेरी  उल्फत  की  दौलत  ने  ही  , शाहाना बना डाला /

                                        -  एस.एन.शुक्ल  

Sunday, September 2, 2012

( 165 ) जीने का बहाना हो तुम

            जीने का बहाना हो तुम


जागती रातों में , सपनों का खजाना हो  तुम  /
कैसे बतलाएं , कि  जीने  का बहाना हो तुम  /

अब तो हर साँस में , धड़कन में तुम्हारी ही रिदम ,
तुम  मेरी  नज़्म , रुबाई  हो ,  तराना  हो  तुम  /

मेरे  गुलशन  में , खिलाये हैं  फूल तुमने ही ,
रंग- ओ - खुशबू से , सजाये हैं फूल तुमने ही ,

इस इनायत का , तहे दिल से हूँ मैं शुक्र -ए - गुज़ार ,
तुम  मेरी  जीश्त हो , जीनत  मेरी, ज़ाना  हो  तुम  /

तुमसे होती है शुरू दुनिया मेरी , तुम पे ख़तम ,
हमारे  वास्ते !  यह  सारा  ज़माना  हो  तुम  /

                                 - एस .एन .शुक्ल 

Sunday, August 26, 2012

(164) जब तक रहो , जलो

जीवन ऐसे जियो , कि जैसे दीपक जीता है  /
तब भी लड़ता , तेल पात्र जब होता रीता है  /

भरा पात्र हो ,  दीपशिखा  तब रहती तनी खड़ी  ,
कीट - पतंगों की भी , उस पर रहती लगी झड़ी  /

झप - झप करते आते वे , लेकिन जब टकराते ,
कहाँ तेज  सह  पाते ,  पंख  जलाते , मर जाते  /

पवन वेग  भी ,  उसे बुझाने  का  प्रयत्न  करता  ,
पर दीपक आख़िरी साँस तक , उससे भी लड़ता /

तैल पात्र जब रीत रहा होता , तब  भी  दीपक  ,
अंतिम बूँद निचुड़ने तक लड़ता रहता अनथक /

यह तो निश्चित है , ऊर्जा के शेष न रहने पर  ,
जाना होगा सबको तजकर , यह शरीर नश्वर  /

पर जो जीवन रहते , दीपक जैसा जलते  हैं ,
वे अपने प्रकाश से , जग आलोकित करते हैं /

इसीलिये कहता हूँ , बस दीपक की भाँति जलो ,
शेष रहो , न रहो जग में , पर जब तक रहो जलो /

                                   - एस . एन . शुक्ल 

Friday, August 17, 2012

(163) ये दुनिया दीवानी होगी

जड़ी शीशे में जो तस्वीर पुरानी होगी  /
नयी तामीर तुझे खुद से करानी  होगी  /

आइना  सिर्फ  दिखाता  है  बाहरी  सूरत  ,
क्या वो तस्वीर , किसी रूह की मानी होगी ?

शराब सी ये ज़िंदगी है , बहकना न कहीं  ,
आग में आग  और पानी में पानी होगी  /

ज़िंदगी रोज नए रंग बदलती है खुद  ,
ज़िंदगी है , तो नयी रोज कहानी होगी /

गुमान कर न अपने हुस्न , रंग -ओ -खुशबू का ,
ये  जो  तसवीर  नयी  है  ,  तो  पुरानी  होगी  /

कुछ ऐसा कर के गुज़र , लोग वाह - वाह कहें  ,
तुम्हारे  नाम  की  , ये  दुनिया  दीवानी  होगी /

                              - एस . एन . शुक्ल 

Sunday, August 12, 2012

(162) मुकद्दर का गिला क्या


राहे -गुनाह चल के , बता  तुझको  मिला क्या  ,
छलनी में गाय दुह के ,मुकद्दर का गिला क्या ?

इंसान  होके  कर  रहा , इंसानियत  का  खूं  ,
अन्दर के तेरे आदमी का , दिल न हिला क्या ?

जितना है , उससे और भी ज्यादा की आरजू ,
इंसान  की  हवस की ,  यहाँ  कोई  हद नहीं ,

इस  चंद - रोजा  ज़िंदगी  के  वास्ते  फरेब ,
दुनिया का किया तूने फतह , कोई किला क्या ?

हर दिल  में  है  निशातो - मसर्रत  की  तश्नगी ,
ता ना -ए- खुदसरी से , कोई गुल भी खिला क्या ?

                                        - एस . एन .शुक्ल

निशातो -मसर्रत = हर्ष और आनंद
तश्नगी = प्यास
ता ना - ए - खुदसरी = उद्दंडता 

Thursday, August 9, 2012

(161) आदमी से डर

जो आसमान पे है उस खुदा का खौफ क्या ,
खुद को खुदा समझने वाले आदमी से डर  /

गैरों में कमी खोज रहा , खुद से बेखबर ,
नासेह तू नहीं है , खुद अपनी कमी से डर /

दोजख - बहिश्त दोनों , तखैयुल की चीज हैं ,
तू जिस जमी की गोद में है , उस जमी से  डर /

हिटलर , मुसोलिनी -ओ - सिकंदर चले गए ,
शाह -ए - जहान तू भी नहीं , परचमी से डर /

मत कर गुरूर ऐसा ज़माल -ओ -ज़लाल पर ,
किसका गुमां रहा है , इसलिए हमीं से डर /
                               - एस . एन . शुक्ल

नासेह = उपदेशक
तखैयुल = कल्पना
परचमी = पताका फहराना
हमी = अहंकार 

Wednesday, August 1, 2012

(160) बशर नाकामियों को जब मुकद्दर मान लेता है

जो मेहनत और हिकमत को ,  इबादत मान लेता है  /
उसे मिलता है वह सब कुछ , जो चाहत ठान लेता है  /

तवंगर  भी  कदमबोशी  को  तब  मज़बूर  होता  है  ,
वो फाकेमस्त ! जिस दम अपनी ताकत जान लेता है /

बदल जाती हैं हाथों  की  लकीरें , और  किश्मत भी ,
बशर जब जीतने की जिद , को मन में ठान लेता है /

मचलता दिल , मगर फिर भी वो बच्चा जिद नहीं करता ,
जो  अपने  बाप  की ,  माली  हकीकत  जान  लेता  है  /

ठहर जाती हैं सारी सलवटें मौजों की बस उस दम ,
समंदर जिस समय , सोने को चादर तान लेता है  /

खुदा भी चाहकर , उसके लिए कुछ कर नहीं सकता ,
बशर  नाकामियों  को  जब  मुकद्दर  मान  लेता  है  /

                                  - एस. एन. शुक्ल 

Tuesday, July 31, 2012

प्रिय महोदय
                                    "श्रम साधना "स्मारिका के सफल प्रकाशन के बाद
                                                      हम ला रहे हैं .....
 स्वाधीनता के पैंसठ वर्ष और भारतीय संसद के छः दशकों की गति -प्रगति , उत्कर्ष -पराभव, गुण -दोष , लाभ -हानि और सुधार के उपायों पर आधारित सम्पूर्ण विवेचन, विश्लेषण   अर्थात ...

                                               " दस्तावेज "

जिसमें स्वतन्त्रता संग्राम के वीर शहीदों की स्मृति एवं संघर्ष गाथाओं , विजय के सोल्लास और विभाजन की पीड़ा के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र की यात्रा कथा , उपलब्धियों , विसंगतियों ,राजनैतिक दुरागृह , विरोधाभाष , दागियों -बागियों का राजनीति में बढ़ता वर्चस्व , अवसरवादी दांव - पेच तथा गठजोड़ के  दुष्परिणामों , व्यवस्थागत दोषों , लोकतंत्र के सजग प्रहरियों के सदप्रयासों , ज्वलंत मुद्दों तथा समस्याओं के निराकरण एवं सुधारात्मक उपायों सहित वह समस्त विषय सामग्री समाहित करने का प्रयास किया जाएगा , जिसकी कि इस प्रकार के दस्तावेज में अपेक्षा की जा सकती है /
     इस दस्तावेज में देश भर के चर्तित राजनेताओं ,ख्यातिनामा लेखकों, विद्वानों के लेख आमंत्रित किये गए है / स्मारिका का आकार ए -फोर  (11गुणे 9 इंच ) होगा तथा प्रष्टों की संख्या 600 के आस-पास  / इस अप्रतिम, अभिनव अभियान के साझीदार आप भी हो सकते हैं  / विषयानुकूल लेख, रचनाएँ भेजें तथा साथ में प्रकाशन अनुमति , अपना पूरा पता एवं चित्र भी / विषय सामग्री केवल हिन्दी , उर्दू  अंगरेजी भाषा में ही स्वीकार की जायेगी / लेख हमें हर हालत में 10 सितम्बर 2012 तक प्राप्त हो जाने चाहिए ताकि उन्हें यथोचित स्थान दिया जा सके /
                          हमारा पता -
जर्नलिस्ट्स , मीडिया एंड राइटर्स वेलफेयर एसोसिएशन 
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Thursday, July 26, 2012

(159) राह बनाते रहिये

               राह बनाते रहिये


या ढलें वक़्त के सांचों में, हवा संग बहिये  /
या लड़ें वक़्त से  , इतिहास  रचाते  रहिये  /

या चलें देख किसी और के पैरों के निशाँ  ,
या निशाँ वक़्त के , सीने पे बनाते रहिये  /

या जियें खुद के लिए , खुद की परस्ती के लिए ,
या  जियें  सबके  लिए  ,  प्यार  लुटाते  रहिये  /

या रहें तन के खड़े , खुश्क पहाड़ों की तरह  ,
या बहें बर्फ सा गल ,  प्यास बुझाते रहिये  /


हर कोई  तुमको  सराहे , ये  ज़रूरी  तो  नहीं  ,
सबकी सुनिए भी , मगर अपनी चलाते रहिये /

फैसला सोच-समझकर लें , न पछताना फिर ,
जियें गुमनाम ,  या कि  नाम कमाते रहिये  /

                             
या रहें रोते मुकद्दर को , हाथ रख सिर पे  ,
या चलें  राह  नयी ,  राह  बनाते  रहिये  /
     
                            - एस . एन . शुक्ल

Sunday, July 22, 2012

(158) ज़रूरी तो नहीं

              

पकड़ के बाहँ चलूँ मैं , ये ज़रूरी  तो नहीं  /
पुरानी  राह चलूँ  मैं ,  ये ज़रूरी  तो नहीं  /

तुम्हें जो ठीक लगे , शौक से करते रहिये ,
वही गुनाह करूँ  मैं , ये ज़रूरी  तो नहीं  /

जो गुनहगार हैं , उनको सज़ा मिले तो मिले ,
बे-वजह आह  भरूँ  मैं , ये  ज़रूरी  तो नहीं  /

बहुत से लोग , सिर झुका के चल रहे हैं यहाँ ,
उनका हमराह बनूँ  मैं , ये  ज़रूरी तो नहीं  /

ये है मुमकिन , कि नयी राह में हों पेच-ओ-ख़म ,
खुद को  गुमराह  कहूँ  मैं ,  ये ज़रूरी तो  नहीं  /

ज़िंदगी मेरी है  , अपनी तरह जिया हूँ  मैं  ,
सबकी परवाह  करूँ मैं , ये ज़रूरी तो नहीं  /

                              - एस .एन .शुक्ल


Friday, July 13, 2012

(157) अज़नबी से शहर


               अज़नबी से शहर

इस चकाचौंध में , मतलबी हर नज़र  /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

धर्म-ओ -मजहब वहां , जातियां हैं मगर ,
रिश्ते - नातों की भी , थातियाँ  हैं  मगर ,
पर शहर में किसे , कौन , कब  पूछता  ,
मरने - जीने से  भी , लोग  हैं  बेखबर   /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

दौड़ती  -  भागती   जिन्दगी  है  यहाँ ,
रात-ओ-दिन जागती जिन्दगी है यहाँ ,
काम है ,  दाम है ,  काम ही काम है  ,
काम में मुब्तिला शख्स आठों पहर  /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

ये शहर क्या है , बस  एक  बाज़ार है ,
रिश्ते- नातों में भी दिखता व्यापार है ,
कौन, कब, कैसे , किसकी गिरह काट ले ,
हर कोई खोजता है यहाँ  माल-ओ- जर  /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

कितने सम्पन्न , साधन भरे हों नगर ,
आश्रिता आज भी उनकी है गावों पर ,
गाँव   संसाधनों  से  परे  ही  सही ,
किन्तु फिर भी हैं वे अन्नदाता के घर /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

                            - एस . एन . शुक्ल 

(156) हमें रोना नहीं आता

  वो बेशक हैं मुसलमां , सिख हैं , हिन्दू हैं , ईसाई हैं ,
 मगर हमको सिवा इन्सां के , कुछ होना नहीं आता /

 वो मालिक एकड़ों  के हैं ,  हमारी क्यारियाँ छोटी ,
 वजह ये है , कि हमको नफरतें बोना नहीं आता  /

वो चलती आँधियों को देखकर , मुह फेर लेते हैं ,
हमें गर तल्ख़  हो माहौल , तो सोना नहीं आता /

जिधर देखो वही काबिज, वही मालिक, वही हाकिम ,
हमारी  किश्मतों में , एक भी कोना नहीं आता /

तवंगर हैं , जमाने भर में उनकी खूब चलती है ,
हमें उन सा कोई जादू , कोई टोना नहीं आता /

हमारे और उनके बीच में बस फर्क इतना है ,
उन्हें हंसना नहीं आता , हमें रोना नहीं आता /

   
wow factor...bahut khoob shukl ji... keep writing.. on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/13/12
आभार,बहुत सार्थक व मन को छूने वाली गजल के लिए............ on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/11/12
हरेक पंक्तियाँ लाजवाब ..... सुंदर अभिव्यक्ति !! on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/11/12
बहुत खूब : निशब्द कर दिया आपके एहसासों ने .. वो मालिक एकड़ों के हैं , हमारी क्यारियाँ छोटी , वजह ये है , कि हमको नफरतें बोना नहीं आता|| शुभकामनाएँ! on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/11/12
वो मालिक एकड़ों के हैं , हमारी क्यारियाँ छोटी वजह ये है , कि हमको नफरतें बोना नहीं आता ..बहुत गहन अभिव्यक्ति..सुन्दर गज़ल..आभार on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/11/12
वो चलती आँधियों को देखकर , मुंह फेर लेते हैं हमें गर तल्ख़ हो माहौल तो , सोना नहीं आता . बहुत खूब। और आखिरी दो पँक्तियाँ तो और भी कमाल हैं। on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/11/12
वो चलती आँधियों को देखकर , मुंह फेर लेते हैं हमें गर तल्ख़ हो माहौल तो , सोना नहीं आता . सभी लाइन खुबसूरत हैं बस इस लाइन ने मन मोह लिया .. on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/10/12
on 7/10/12
बहुत सुन्दर...अगर आज भी हम अपनी इन खासियतों को बनाकर रख सकें ...तो इस बात पर केवल फक्र करना ही आता है ..... on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/10/12
वो मालिक एकड़ों के हैं , हमारी क्यारियाँ छोटी वजह ये है , कि हमको नफरतें बोना नहीं आता Waah...Behtreen Panktiyan.... on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति. मेरे ब्लॉग पर आपके आने का आभार,शुक्ल जी. on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
बहुत सुंदर शुक्ला जी । मेरे नए पोस्ट आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद। on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
हमारे और उनके बीच में , बस फर्क इतना है , उन्हें हँसना नहीं आता , हमें रोना नहीं आता इससे अच्छी और कोई दूसरी बात हो सकती है .... on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
हमारे और उनके बीच में , बस फर्क इतना है , उन्हें हँसना नहीं आता , हमें रोना नहीं आता बेहतरीन प्रस्तुति ,,,,, RECENT POST...: दोहे,,,, / on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
वो बेशक हैं मुसलमां , सिख हैं , हिन्दू हैं , ईसाई हैं , मगर हमको सिवा इन्सां के , कुछ होना नहीं आता वा...वाह...... वो मालिक एकड़ों के हैं , हमारी क्यारियाँ छोटी , वजह ये है , कि हमको नफरतें बोना नहीं आता बहुत खूब ......वाह ....!! वो चलती आँधियों को देखकर , मुह फेर लेते हैं , हमें गर तल्ख़ हो माहौल , तो सोना नहीं आता क्या बात है ...... जिधर देखो , वही काबिज, वही मालिक , वही हाकिम , हमारी किश्मतों में , एक भी कोना नहीं आता क्या बात है शुक्ल जी सभी शे'र एक से बढ़ कर एक ..... - on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
बहुत लाजबाब सुंदर गजल ,,,,,,,,आभार RECENT POST...: दोहे,,,, on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
हमारे और उनके बीच में , बस फर्क इतना है , उन्हें हँसना नहीं आता , हमें रोना नहीं आता...... बहुत सुंदर बेहतरीन गजल ....... RECENT POST...: दोहे,,,, on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
भाई शुक्ल जी एक से एक बेहतरीन शे’र से बनी इस रचना ने मन मोह लिया। खास कर दो शे’र को फिर से याद करना चाहूंगा - वो मालिक एकड़ों के हैं , हमारी क्यारियाँ छोटी वजह ये है , कि हमको नफरतें बोना नहीं आता हमारे और उनके बीच में , बस फर्क इतना है , उन्हें हँसना नहीं आता , हमें रोना नहीं आता on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
हमारे और उनके बीच में , बस फर्क इतना है , उन्हें हँसना नहीं आता , हमें रोना नहीं आता और यही फर्क सारी बात कह देता है..बहुत सुंदर ! on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
बड़ी गहरी गजलें.. on (156) हमें रोना नहीं आता
on 7/9/12
बहुत बढ़िया गज़ल शुक्ला जी.... बड़े दिनों बाद पढ़ने मिली आपकी रचना.... सादर अनु on (156) हमें रोना नहीं आता
   
                  -  एस .एन .शुक्ल 

Wednesday, June 27, 2012

(155) सभी बेपर्द कर डालो

  शकर कैसे भला छोड़ेगी पीछा , और क्यों छोड़े ,
  तुम्हीं थे जिसने कैथे और जामुन काट डाले हैं  /

 तुम्हीं कहते ज़हर फैला है चारों ओर नफ़रत का ,
 तुम्हीं  ने  आस्तीनों  में , विषैले  नाग  पाले  हैं  /

  लबारों और मक्कारों को , कितनी बार परखोगे ,
  ये तन से खूब उजले हैं , मगर अंदर  से काले हैं /

  वो छत्तीस लाख के सन्डास में , पेशाब करते हैं ,
  यहाँ छब्बीस रुपये रोज की आमद भी लाले हैं  /

  ज़बानें  लपलपाते  भेड़िये  हैं ,  ये  दरिंदे   हैं ,
  ये आदमखोर हैं , मज़लूम ही इनके निवाले हैं /

  उठाओ आँधियाँ , अब और रस्ता भी नहीं कोई ,
  सभी बेपर्द कर डालो , जो शैतानों की चाले हैं  /

                                     - एस . एन . शुक्ल 

Sunday, June 24, 2012

(154) वक्त का मारा समझता है

           वक्त का मारा समझता है


कोई नादां , कोई दाना , कोई प्यारा  समझता है ,
कोई भटका हुआ कहता है , आवारा समझता है  /

मेहरबां वक्त हो जिस पर , वो क्या समझे , वो क्या जाने ,
है  कैसा  वक्त  होता  ,  वक्त  का  मारा  समझता  है  /

नज़र का फेर है , जिस आँख पर जैसा लगा चश्मा  ,
उजाले  को  अंधेरा , चाँद  को  तारा  समझता  है  /

ये आदत  में  नहीं  है , इसलिए  निकले  नहीं  आँसू  ,
मगर कितनी तपिश है , दिल का अंगारा समझता है /

वो कहते हैं , कि  उनको नीद ही आती नहीं शब् भर ,
है मतलब नीद का क्या , यह थका - हारा समझता है /

जिसे होता है मतलब , सिर्फ अपनी खुदपरस्ती से ,
वो हर इन्सान को -  इन्सां नहीं , चारा समझता है  /

मुबारक हो तुम्हें दुनिया तुम्हारी , तंग दिल वालों ,
ये बंजारा तो ,  अपना  ही जहां  सारा समझता है  /

                                     - एस.एन. शुक्ल 

Sunday, June 17, 2012

(153) उगालदान है यारों





 ये ऐसा मुल्क है , हर शख्श जुल्म सहकर भी ,
ज़ुबान   होते   हुए  ,  बेजुबान   है   यारों   /

मस्जिदों , मंदिरों , गिरिजाघरों , गुरुद्वारों में ,
सभी की अपनी , मजहबी दुकान  है यारों  /

आदमी ही यहाँ , बिकता - खरीदा जाता है ,
ये अपने मुल्क का , सियासतान है यारों  /

इतने फिरके , कि इन्हें गिन नहीं सकता कोई ,
और  दावा  ये ,  एकता  की  शान  हैं  यारों  /

भीड़ है , मेले हैं , रेले हैं , रैलियाँ हैं मगर ,
ढूँढता हूँ  ,  कहाँ  हिन्दोस्तान  है  यारों  /

ये सौ करोड़ से ज्यादा हैं , मगर भेड़ों से ,
इसलिए ! हुक्मरान , बेईमान हैं यारों  /

कहीं भी कुछ भी करो , गालियाँ दो , उगलो ज़हर ,
मुल्क  है   या कि  ये  ,  उगालदान  है  यारों  /

                                -एस.एन. शुक्ल
किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से लगभग डेढ़ माह तक स्रजन बाधित रहा , पुनः आप मित्रों का स्नेह पाने के लिए उपस्थित हूँ / आशा है हमारे मित्र हमें क्षमा करेंगे /

Tuesday, May 29, 2012

रवि शंकर उपाध्याय

                         1

कौन  जश्न मनाये भारत की आजादी का,
गरीब मातम मना रहा है अपनी बर्बादी का/

रोंकता नहीं है कोई दंगे फसाद की आंधी को,
सुख चैन लुटता जा रहा है भारत की आबादी का/

जान की की कीमत कुछ भी नहीं है जालिमों के पास,
ऐसे ही क़त्ल किया था भारत की शहजादी का/

चेहरे पर कुछ और दिल में कुछ और है,
जनता को बस लूट रहे हैं, कपड़ा पहनकर खादी का/

ऐश-ओ-आराम से रहने वालों कभी देखो आकर,
है आज गरीब नंगा और भूंखा भारत की वादी का/

एस देश में देश द्रोहियों की कमी नहीं है रवी,
सबके चेहरें छुपे हैं नाम बदनाम है आतंकवादी का/


                              2

खून से खिलती है होली  आज हिन्दुस्तान में,
खून से छपकर है निकला अखबार हिन्दुस्तान में/

खून का प्यासा है खंजर जल रही हैं बस्तियां,
बच्चा बच्चा सो रहा है आज हिन्दुस्तान में/

बह रहा है नालियों में आज लोंगों का लहू,
खून पानी बन गया है आज़ाद हिन्दुस्तान में/

ऐ जालिमों हर खून करने से पहले सोच लो,
एक दिन तुम सबका होगा, खून हिन्दुस्तान में/

मैं रवि का नूर हूँ, ये सोचकर हैरान हूँ/
मर चुकी इंसानियत आज़ाद हिन्दुस्तान में/


                                                           रवि शंकर उपाध्याय 

Thursday, May 24, 2012

आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को ........


आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को,
​मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको/

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊबकर,
​मर गयी फुलिया बेचारी थी कुएँ में डूबकर/

है सधी सिर पर बिनौली कंडीयों की टोकरी,
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी/

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा,
मैं इसे कहता हूँ सरयू पार की मोनालिसा/

कैसी यह भयभीत है हिरनी सी घबरायी हुयी,
लग रही जैसे कली बेला कि कुम्भालाई हुयी/

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसे मौन है,
जानते हो इसकी खामोशी का कारण कौन है/

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को,
सो रही बूढी ओसारे में बिछाए खात को/

डूबती सूरज कि किरनें खेलती थीं रेत पर,
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से/

आ रही थी वह चली खोयी हुयी जज्बात में,
क्या पता उसको कि कोई भेंडिया है घात में/

होनी से बेखबर कृष्णा, बेखबर राहों में थी,
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाँहों में थी/

चीख निकली भी तो होंठो में ही घुटकर रह गयी,
छटपटाई पहले फिर ढीली पडी फिर ढह गयी/

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया,
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया/

और उस दिन ये हवेली हंस रही थी मौज में,
होश में आयी तो कृष्णा थी पिता की गोद में/

जुड़ गयी थी भीड़ जिसमें जोर था शैलाब था,
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था/

badh ke mangal ne kahaa , kaakaa too kaise maun hai .
poochh to betee se aakhir vo darindaa kaun hai .

कोई भी हो संघर्ष से हम पाँव मोडेंगे नहीं,
कच्चा खा जायेंगे जिन्दा उनको छोड़ेंगे नहीं/

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें,
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुंह काला करें/

बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से,
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से/

पड़ गयी इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में,
वे एकट्ठे हो गए थे सरपंच के दालान में/

द्रष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर,
देखिये सुखराज सिंह बोले हैं खैनी ठोंककर/

क्या कहें सरपंच भाई क्या जमाना आ गया,
कल तलक जो पांव के नीचे था रुतबा पा गया/

कहती है सरकार की आपस में मिलझूल कर रहो,
सूअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो/

देखिये ना यह जो कृष्णा है चमारों के यहाँ,
पढ़ गया है सीप का मोती गंवारों के यहाँ/

जैसे बरसाती नदी अल्हड नशे में चूर है,
हाँथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है/

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ,
फिर कोई बांहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ/

आज सरजू पर अपने श्याम से टकरा गयी,
जाने-अनजाने में लज्जत जिन्दगी की पा गयी/

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गयी,
वरना वह मरदूद बातों को कहने से रही/

जानते है आप मंगल एक ही मक्कार है,
हरखू उसकी शह पे थाणे जाने को तैयार है/

कल सुबह गर्दन अगर नपती है बेटे-बाप की,
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी/

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया,
हाँथ मूंछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था/

छडिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था,
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था/

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुरजोर था,
भोर होते ही वहां का द्रश्य बिलकुल और था/

सर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाँथ में,
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में/

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने,
जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आये सामने/

निकला मंगल झोपडी का पल्ला खोलकर,
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़कर/

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया,
सुन पडा वो माल फिर चोरी का तुने क्या किया/

कैसी चोरी माल कैसा उसने जैसे ही कहा,
एक लाठी फिर पडी बस होश फिर जाता रहा/

होश खोकर वह पडा था झोपडी के द्वार पर,
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर/

मेरा मुंह क्या देखते हो इसके मुंह में थूक दो,
आग लाओ और इसकी झोपडी को फूंक दो/

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी,
बेसहारा निर्बलों की झोपडी जलने लगी/

दूधमुहाँ बच्चा और बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था,
वह अभागा दीं हिंसक भीड़ के घेरे में था/

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे,
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे/

कह दो एन कुत्तों के पिल्लों से की इतराएँ नहीं,
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाएँ नहीं/

यह दरोगा जी थे मुंह से शब्द झरते फूल से,
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रुल से/

फिर दहाड़े इनको डंडों से सुधारा जाएगा,
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा/

एक सिपाही ने कहा साईकिल इधर को मोड़ दें,
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें/

बोला थानेदार मुर्गे की तरह मत बाग़ दो,
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो/

ये समझते हैं की ठाकुर से उलझना खेल है,
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है/

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अक्सर यह सवाल,
कैसा है कहिये न सरजू पर की कृष्णा का हाल/

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को,
साद रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को/

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को,
प्रांत के मंत्री गडों को केंद्र की सरकार को/

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ, आयें मेरे गाँव में,
तट पे नदियों के घनी अमराएयों की छाँव में/

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही है,
या अंहिंसा की जहां पर नथ उतारी जा रही है/

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए,
बेचती हैं जिस्म कितनी कृष्णा रोटी के लिए/

यह रचना सुप्रसिद्ध जनकवि अदम गोंडवी की है/ हमारी हार्दिक श्रृद्धांजलि




Sunday, May 6, 2012

(152) कुत्ते ही कुत्ते हैं ?

कुत्ते  ही  कुत्ते  हैं ,  कुत्तों  में  कुत्ते  हैं ,
कुत्तों के पिछलग्गू ,  कुत्तों के कुत्ते हैं 
कुत्तों सा भौंकते हैं , काटते हैं , नोचते हैं 
कुत्तों के  साथ - साथ  घूम  रहे  कुत्ते हैं  /

बंगलों में कुत्ते हैं , जंगलों में कुत्ते हैं ,
गोदियों में कुत्ते हैं , बगलों में कुत्ते हैं ,
आदमी का बच्चा है आया के भरोसे पर ,
मालकिन की गोदी में दुलराते कुत्ते हैं /
अक्सर ये बच्चे ही , बड़े हो - समर्थ होकर ,
अपने माँ - बाप को समझते हैं , कुत्ते हैं /
कुत्ते ही कुत्ते हैं---------------------

गाड़ियों  में  कुत्ते   हैं , सोफों  में  कुत्ते  हैं ,
बिस्तर पर , मसनद पर , साड़ियों में कुत्ते है,
रोटी का निवाला जहां मुश्किल आम आदमी को ,
मिल्ककेक  , बिस्किट , मलाई खाते कुत्ते है ,
कुत्तों की जिन्दगी से आदमी गया - बीता ,
मखमली  बिछौनों  में  इठलाते  कुत्ते  हैं  /
कुत्ते ही कुत्ते हैं----------------------

कुत्ते बुलडाग जैसे , पिद्दी से , बौने से ,
शेर जैसे , भालुओं से , कुत्ते खिलौने से,
दमवाले , पुछकटे, कबरे से , झबरे से ,
बिना बाल वाले तो शेरनी के छौने से ,
आवारा , घुरचट्टे, किनहे से , घिनहे से ,
गाँव , गली , नगर- नगर मंडराते कुत्ते हैं /
कुत्ते ही कुत्ते हैं---------------------

कुत्तों की श्रेणियां हैं , गाँव , गली ,शहर वाले ,
हड्डियों पर लड़ते , कुछ गद्दियों पर लड़ते हैं ,
दूम  को हिलाते हैं , चूमते हैं पावों को ,
अपने दरवाजों पर भौंकते , अकड़ते हैं ,
कुत्ता है जानवर , यदि खाता तो निभाता भी है ,
लेकिन कुछ खाकर भी गुर्राते कुत्ते हैं  /
कुत्ते ही कुत्ते हैं--------------------

कोठियों के , बंगलों के मुख्यद्वार फाटक पर -
धनिकों का दूर से ही दीखता है स्वाभिमान ,
बड़े - बड़े हर्फों में , बड़े ही करीने से -
प्रायः लिखा रहता है " कुत्तों से सावधान "
ऐसे आवासों को देख क्या नहीं लगता -
जैसे इन भवनों में , आदमी नहीं , कुत्ते हैं ?
कुत्ते ही कुत्ते हैं---------------------

कहते हैं , बहन के घर भाई कुत्ता है ,
और ससुराल में जमाई , तो कुत्ता है ,
बड़ा वाला कुत्ता जो बेटी का खाय बाप ,
भाई का अंश मारे भाई , तो कुत्ता है ,
सोचो फिर , जो सारा देश नोच खा रहे हैं -
दुनिया में उनसे भी बड़े कोई कुत्ते है ?
कुत्ते ही कुत्ते हैं---------------------

                         - एस. एन . शुक्ल 



 

Wednesday, May 2, 2012

(151) अब हमें आइने चिढ़ाते हैं

                                             पहले चिढ़ते  थे आइने हमसे ,
                                             अब  हमें   आइने  चिढ़ाते  हैं  /
                                             वक्त जब साथ न हो तो अक्सर ,
                                             लोग , मौसम से बदल जाते हैं /

                                            सुर्खरू  थे ,   हमारे  भी  लबों  पे  लाली  थी ,
                                            हमारे जिश्म की हालत भी खासी माली थी ,
                                            अब वो रौनक कहाँ , दिलवर कहाँ , दिलदार कहाँ ,
                                            सामने पड़ते हैं , कतरा के निकल जाते हैं  /
                                            अब हमें आइने चिढ़ाते हैं /

                                           वक्त अपना था तो , खुद में गुरूर  थे  हम  भी ,
                                            न जाने कितनी ही , आँखों के नूर थे हम भी ,
                                            जो बजाते थे , तालियाँ हमारी बातों पर ,
                                            अब हमें देखकर , वो तालियाँ बजाते हैं /
                                            अब हमें आइने चिढ़ाते हैं /

                                           नूर हर शै का , वक्त  आने पे ढल जाता है ,
                                           वक्त के साथ  , ज़माना भी बदल जाता है ,
                                            खुश्क डालों  पे , परिंदे भी कहाँ टिकते हैं ?
                                            खंडहरों में चिराग ,  कब जलाए जाते  हैं ?
                                            अब हमें आइने चिढ़ाते हैं/

                                                                           - एस. एन. शुक्ल 

Thursday, April 19, 2012

(150) निभा लेते हैं /

दिल के जख्मों को तबस्सुम से छुपा लेते हैं  /
ज़िंदगी  जीते  हैं  ,  कैसे  भी  निभा  लेते  हैं /

टूटते  ख़्वाब  ,  तो  होता है  दर्द  हमको  भी  ,
हम तो किरचों को भी , पलकों पे उठा लेते हैं /

हम मगर वो भी नहीं , हाँ में हाँ मिलाते रहें ,
हर एक दर पे , जो सिर अपना झुका लेते हैं  /

तपिश के  डर  से , छाँव खोजते होंगे कोई ,
हम तपिश हो भी तो , शोलों को हवा देते हैं /

सरे - कोहसार  से ,  लाते उतार हैं  दरिया  , 
ठान लें गर ,  तो समंदर को सुखा देते  हैं  /

लोग डरते हैं , हवाओं के जोर से ,  पर हम 
आँधियाँ  आयें तो ,  दीवार गिरा  देते  हैं  /

                              - एस. एन. शुक्ल

 

Friday, April 13, 2012

(149) लौटि चलौ गाँउ ककुआ

हियाँ लागै न मनवा हमार ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
दिनु  बीतति  मनौ  पहारु ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /

डगमगु  चालु हियाँ , बात गिटपिटिया ,
कान फोरू शोरु मचे , चलें फिटफिटिया ,
हुआं शान्ति औ सुख की बयारि ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
हियाँ  लागै  न  मनवा  हमार ,  लौटि चलौ गाँउ  ककुआ /

पानिहू बिकाल हियाँ , काँच के गिलसवा ,
सोनवा के भाऊ भवा ,  ऊख  केर रसवा , 
हुआं मुफ़त मां लुटब बहार , लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
हियाँ लागै न मनवा हमार  , लौटि चलौ गाँउ ककुआ /

दुधवा के नाम पई बिकाल हियाँ पनिया ,
गोदिया के लाल पलें पूपसी की कनिया ,
हुआं दूध- दही की भरमार  ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
हियाँ लागै न मनवा हमार , लौटि चलौ गाँउ ककुआ /

छोरिहू  शहर  केरी , मेम  कै मेमनिया ,
बिटिया देहाति मानउ देबी महरनिया ,
हुआं सरगु  लगे  घरु- बारू , लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
हियाँ लागै न मनवा हमार ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /

                                         - एस. एन. शुक्ल