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Wednesday, June 1, 2011

(53) जब न होंगी बेटियां

ख्वाहिशें औलाद की , पर चाहिए बेटा उन्हें
गर्भ में ही मार दी जातीं बिचारी बेटियां .
वजह यह , मुफलिस खरीदें महंगे दूल्हे किस तरह
अब भी बिन पैसे के रह जातीं कुंवारी बेटियां 

एक घर में चार बेटे हों भी तो ,टंटा रहे 
मायका -ससुराल दो-दो घर निभाती  बेटियां 
चाहिए बेटों को दौलत ,जर ,जमीनें ,जायदाद 
 प्यार के दो बोल को भी तरस जातीं बेटियां 

शारदा ,लक्ष्मी ,भवानी देवियों के देश में
 इतनी बेकद्री  की बस आंसू बहाती बेटियां
घर, शहर, सरकार तक एक अजब सा सौतेलापन
किन्तु फिर भी स्नेह का सागर लुटातीं बेटियां . 

बाप, बेटी का ,बहुत कम होता है दुश्मन मगर
जान की दुश्मन वही ,जो खुद कभी थीं बेटियां
होश में आओ दरिंदों ,बेटियों के कातिलों
बहू लाओगे कहाँ से ,जब न होंगी बेटियां .

5 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बाप, बेटी का ,बहुत कम होता है दुश्मन मगर
जान की दुश्मन वही ,जो खुद कभी थीं बेटियां

विचारणीय ... जागरूक करती रचना

मनोज कुमार said...

विचारणीय प्रश्न रखती है हमारे सामने यह कविता।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


चुने हुए चिट्ठे ..आपके लिए नज़राना

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

होश में आओ दरिंदों ,बेटियों के कातिलों
बहू लाओगे कहाँ से ,जब न होंगी बेटियां .

Bahut Sunder saarthak rachna..... Vicharniy bhi arthpoorn bhi...

S.N SHUKLA said...

manoj ji,sangeeta ji tatha monika ji
aap sab longo ka ek saath aabhar, dhanyawad. S.N.Shukla