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Sunday, July 24, 2011

(84) राजनीति और धर्म

धर्म, पूजा-पद्धति का नाम नहीं ,
धर्म,जीवन पद्धति है.
जिसके आदर्शों में-
दया है, करुणा है,
प्यार है, नैतिकता है,
सहयोग है, सदाचार है ,
अन्याय का प्रतिकार है.
और वे सब नियम-उपनियम भी -
जो मानवता  के लिए आदर्श माने जाते हैं.  
जो ऐसे धर्म को नशा मानते हैं,
उन्हें आप क्या मानते हैं?

और राजनीति के वे कथित पहरुए -
जो राजनीति में धर्म के विरोधी हैं ,
क्या परोक्ष वे-
अधर्म की राजनीति के पक्षधर नहीं हैं ?
मानस चौपाई की अर्धाली-
''राजनीति बिनु धन, बिनु धर्मा ''
अर्थात राजनीति में -
धन और धर्म दोनों आवश्यक हैं .
उन्हें धन याद है, धर्म नहीं 
इसीलिए देश में-
अधर्म की राजनीति फल रही है
जहाँ केवल अधर्मियों की ही चल रही है

6 comments:

Shikha Kaushik said...

ek ek bat sach hai .sarthak abhivyakti .aabhar

प्रवीण पाण्डेय said...

धर्म और राजनीति की अजीब सी खिचड़ी पक रही है देश में।

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

यस यन शुक्ल जी अभिवादन -सच कहा आप ने धर्म की व्याख्या ही लोग गलत कर इस से कन्नी काटते हैं ..
राजनीती बिनु धन बिनु धर्मं रामायण ---धन को छोड़ अपना धर्म भी याद रखें सब ..
सुन्दर विषय -सार्थक लेख
शुक्ल भ्रमर ५

S.N SHUKLA said...

शिखा जी,
प्रवीण पाण्डेय जी,
सुरेन्द्र शुक्ल जी,
रचना को आपका स्नेह और समर्थन प्राप्त हुआ , बहुत - बहुत आभार , धन्यवाद

Dr (Miss) Sharad Singh said...

सच की चर्चा करती महत्वपूर्ण रचना...

S.N SHUKLA said...

धन्यवाद डॉक्टर शरद जी , आप ने सच का समर्थन किया , बहुत- बहुत आभार