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Saturday, September 29, 2012

(169) अलग फितरत से खुद को कर नहीं पाते

परिंदों के घरौंदों को , उजाड़ा था तुम्हीं ने कल ,
मगर अब कह रहे हो , डाल पर पक्षी नहीं गाते।

तुम्हीं थे जिसने वर्षों तक , न दी जुम्बिश भी पैरों को ,
शिकायत किसलिए , गर दो कदम अब चल नहीं पाते ?

वो पोखर , झील , नदियाँ , ताल सारे पाटकर तुमने ,
बगीचे  ,  पेड़  -  पौधे ,  बाग़  सारे  काटकर  तुमने   ,

खड़ी अट्टालिकाएं कीं , बनाए  महल - चौमहले  ,
मगर अब कह रहे , बाज़ार में भी फल नहीं आते।

ये कुदरत की , जो बेजा दिख रही तसवीर है सारी ,
तुम्हारी  ही  खुराफातों  की ,  ये  तासीर  है  सारी  , 

वही  तो  काटना  है  पड़  रहा  , बोते  रहे  जो  कुछ ,
मगर फिर भी ,अलग फितरत से खुद को कर नहीं पाते।

                                          - एस .एन .शुक्ल 

38 comments:

expression said...

बहुत खूब....
सार्थक रचना..

सादर
अनु

Ramakant Singh said...

शुक्ल जी आज का दिन मन आनंद से भर गया क्या बात कही है आपने ...किसी भी लाइन के एक भी शब्द व्यर्थ नहीं हैं . आपने दिल को शब्द दे दिए .

Ramakant Singh said...

आपसे मोबाईल पर चर्चा अनुसार संपर्क रमाकांत सिंह 0९८२७८८३५४१ अकलतरा छ ग
प्रकृति के संग खिलवाड़ को बहुत सुन्दर वर्णित किया है आपने .

मन्टू कुमार said...

वाह...!बहुत खूब..बहुत खूब..बहुत खूब...|
आपकी इस रचना ने हम सब के सामने एक सवाल ला खड़ा कर दिया है |
"यहाँ जो कुछ भी होता है,वो हमारी मर्जी से होता है..और उसे ना मानना भी हमारी मर्जी में शामिल है"

सादर |

शालिनी कौशिक said...

सच्चाई को शब्दों में बखूबी उतारा है आपने.सार्थक प्रस्तुति .आभार

Dheerendra singh Bhadauriya said...

वाह बहुत खूब ,,,,,शुक्ल जी,,

वो पोखर झील नदियाँ ताल सारे पाटकर तुमने ,
बगीचे पेड़ पौधे , बाग़ सारे काटकर तुमने
खड़ी अट्टालिकाएं कीं , बनाए महल चौमहले
मगर अब कह रहे,बाज़ार में भी फल नहीं आते।

RECENT POST : गीत,

Aditipoonam said...

सच है जो बोया है वही तो काटा जाएगा -बहुत खूबसूरत रचना-बहुत बढ़िया शुक्ल जी

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

उड़ता पंछी said...

sach ko byan karti hai ye poem.

swalon se bandhi meri post

KYUN???

http://udaari.blogspot.in

उड़ता पंछी said...

sach ko byan karti kavita


meri swalon se bandhi post

KYUN???

http://udaari.blogspot.in

India Darpan said...

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई

इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।

Shah Nawaz said...

Bahut hi behtreen Gazal... Jitni bhi tareef karu'n kam hai....

Vibha Rani Shrivastava said...

तुम्हारी ही खुराफातों की , ये तासीर है सारी ,
वही तो काटना है पड़ रहा , बोते रहे जो कुछ ,
मगर फिर भी ,अलग फितरत से खुद को कर नहीं पाते। ...
बोओगे बबूल .... आम कहाँ से खाओगे ....
सार्थक पोस्ट ~~~ एक अच्छी सीख देती रचना !!

Vaanbhatt said...

आदमी ही खुद अपना दुश्मन बना बैठा है...और किसी का दोष तो नहीं है...

काव्य संसार said...

बढ़िया रचना |
इस समूहिक ब्लॉग में पधारें और इस से जुड़ें |
काव्य का संसार

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही गहरी बातें,
काट जिये जो पेड़, कहाँ से सुख दे पायेंगे।

रविकर said...

बहुत खूब महोदय ।

उत्कृष्ट प्रस्तुति ।।



फितरत चालों की रही, सालों का है ऐब ।

शोहरत की खातिर खुली, षड्यंत्रों की लैब ।

षड्यंत्रों की लैब , करे नीलामी भारी ।

खाय दलाली ढेर, उजाड़े प्राकृत सारी ।

शुद्ध हवा फल फूल, धूप की बाकी हसरत ।

हरकत ऊल-जुलूल, बदल ले अपनी फितरत ।।

रविकर said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

Asha Saxena said...

ये कुदरत की जो बेजा दिख रही तस्वीर सारी
तुम्हारी ही खुराफातों की यह तासीर है साती "
बहुत भावपूर्ण रचना |
आशा

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बहुत अच्छी लगी यह नज़्म।

Onkar said...

वाह, सुन्दर शेर

रचना दीक्षित said...

वही तो काटना है पड़ रहा , बोते रहे जो कुछ ,
मगर फिर भी ,अलग फितरत से खुद को कर नहीं पाते।

फितरत तो सच ही बदलती नहीं. सुंदर प्रस्तुति के लिये बधाई.

रश्मि said...

बहुत खूब....प्रकृति के साथ हो रहे अन्‍याय को बड़ी खूबसूरती से कवि‍ता में ढाला है आपने....बधाई

यादें....ashok saluja . said...

तकलीफ़देह सच्चाई ....
शुभकामनायें!

S.N SHUKLA said...

Anu ji,
Ramakant Singh ji,
Mantu Kumar ji,

आपकी स्नेहिल शुभकामनाओं का बहुत- बहुत आभार.

S.N SHUKLA said...

Shalini ji,
Dheerendra ji,
Aditipoonam ji,

आप मित्रों से इसी स्नेह की अपेक्षा थी, धन्यवाद.

S.N SHUKLA said...

Roopachandr Shastri ji,

इस स्नेह का आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

Udata panchhi,
India darpan,


स्नेह मिला, आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

Shah Navaj ji,
Vibha ji,
Vanbhatt ji,


आपका समर्थन पाकर सार्थक हुआ सृजन, आभार.

S.N SHUKLA said...

Ravikar ji,
Asha Saxena ji,
Devendra pandey ji,


आपके उत्साहवर्धन का कृतज्ञ हूँ.

S.N SHUKLA said...

Onkar ji,
Rachana Dixit ji,


स्नेह मिला, आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

Rashmi ji,
आपके ब्लॉग पर आगमन और समर्थन का आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

Ashok Ahuja ji,

आपका समर्थन पाकर सार्थक हुआ सृजन, आभार.

Saras said...

कितनी सच्ची ..कितनी सुन्दर रचना......इसपर भी तो लोग नहीं चेत जाते ......अलग फितरत से खद को नहीं कर पाते

sangita said...

मन की गहराइयों को छूती उद्वेलित करती पोस्ट ,बधाई शानदार लेखन के लिए

S.N SHUKLA said...

Saras ji,

आभार आपके स्नेह का.

S.N SHUKLA said...

Sangita ji,
ब्लॉग पर आगमन का स्वागत और शुभकामनाओं का आभार.

सतीश सक्सेना said...

बढ़िया सन्देश , बधाई !