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Friday, October 21, 2011

( 112 ) गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !
स्वर्ग धरती के, फिर वे कहे जायेंगे  / 

पाल्या फिर कही जायेगी यह धरा ,
और नदियाँ , कही जायेंगी फिर वरा,
पूजे जायेंगे तरु, गुल्म, पादप, लता ,
उर्वरा अपनी उगलेगी , सोना हरा ,
जब प्रकृति की यहीं शेष होगी कृपा ,
शहर, गावों की उस दिन , शरण आयेंगे /
एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

पत्थरों के नगर, जब उबायेंगे , तब ,
चैन खोजेंगे सब , नीम की छाँव में,
गाँव में ही बहेगी प्रकृति की पवन,
चहचहायेंगे पक्षी भी , बस गाँव में ,
लोग, पिकनिक के ही तब बहाने सही,
गाँव में, शान्ति की खोज में आयेंगे /
एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

आम्र की मंजरी की, मधुर गंध जब,
मिल वसंती बहारों को महकाएगी ,
बौर, पल्लव, लता ओट ले कोकिला ,
मधुमयी तान में , गीत जब गायेगी ,
तितलियाँ सप्त रंगों की इठलायेंगी ,
जब भ्रमर, पुष्प गुच्छों पे मंडराएंगे / 
एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

गाय- भैसें , यहीं शेष रह जायेंगी ,
दूध की आश्रिता होगी जब गाँव पर ,
 अन्न, फल, सब्जियाँ, गाँव उपजायेंगे ,
लहलहायेंगी फसलें, इसी ठाँव पर ,
आंका जाएगा , सच मूल्य तब गाँव का ,
ग्रामवासी , कहे देवता जायेंगे  /
एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

24 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

काश गाँव नगरों की नकल करना बन्द कर दें।

प्रवीण पाण्डेय said...

काश गाँव नगरों की नकल करना बन्द कर दें।

Anita said...

गाँव धीरे धीरे शहर में समाते जा रहे हैं...फिर भी किसी न किसी रूप में शहर का अस्तित्त्व गाँव पर टिका है... आपका सपना शीघ्र पूरा हो !

vidya said...

बहुत सार्थक रचना...जो भौतिकता की अंधी दौड में शामिल नहीं हैं उन्हें गाँव आज भी खीचता है...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

ASHA BISHT said...

ek din gaon, shahron ko lalchayenge. ati sundar..aisi ummid mujhe bhi hai,,
aap mere blog me aaye hardhik abhinandan....

Markand Dave said...

आदरणीय श्रीशुक्लासाहब,

बहुत बढ़िया रचना..!!

बहुत-बहुत बधाई स्वीकार करें ।

मार्कण्ड दवे।
http://mktvfilms.blogspot.com

chetankavi said...

मान्यवर

आज आपका ब्लॉग पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ! आज आपकी पहली ही रचना ने, दिल के तार झंकृत कर दिए! आपकी रचना अनमोल है! हम जो गाँव के जीवन को दुत्कार रहे हैं और शहरीकरण की और भाग रहे हैं, वो जीवन का अर्थ नहीं है! अर्थ तो वहां हैं जहाँ शांति है, हया है, अपनापन है और मानवीय प्रेम है! और वो सिर्फ गाँव में ही है!

chetankavi said...

मान्यवर

आज आपका ब्लॉग पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ! आज आपकी पहली ही रचना ने, दिल के तार झंकृत कर दिए! आपकी रचना अनमोल है! हम जो गाँव के जीवन को दुत्कार रहे हैं और शहरीकरण की और भाग रहे हैं, वो जीवन का अर्थ नहीं है! अर्थ तो वहां हैं जहाँ शांति है, हया है, अपनापन है और मानवीय प्रेम है! और वो सिर्फ गाँव में ही है!

chetankavi said...

मान्यवर

आपकी सभी रचनाओ को मैं अवश्य पढूंगा, क्यूंकि मुझे भी आपकी ही तरह से शब्दों से प्रेम है! धन्यवाद जो आपने अपना सामीप्य दिया!

Patali-The-Village said...

बहुत सार्थक रचना| धन्यवाद|

dheerendra11 said...

गाँव की बात निराली है शहर के लोग क्या समझेगे गाँव की सादगी को,सुंदर पोस्ट बधाई

दीपावली की शुभकामनाये...

मेरी दूसरा ब्लॉग dheerendra11 देखे..

amrendra "amar" said...

पत्थरों के नगर, जब उबायेंगे , तब ,चैन खोजेंगे सब , नीम की छाँव में,गाँव में ही बहेगी प्रकृति की पवन,चहचहायेंगे पक्षी भी , बस गाँव में ,लोग, पिकनिक के ही तब बहाने सही,गाँव में, शान्ति की खोज में आयेंगे /एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !
बहुत खुबसूरत..........ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी....

S.N SHUKLA said...

Pravin pandey ji,
Anita ji,
Vidya ji,

आप मित्रों से इसी स्नेह की हमेशा अपेक्षा है.

S.N SHUKLA said...

Roopchandra Shastri ji,

रचना को आपकी अनुशंसा मिली,आभारी हूँ,धन्यवाद.

S.N SHUKLA said...

Asha Bisht ji,
Makarand DAVE JI,
Chetan ji,

आपके ब्लॉग पर आगमन और समर्थन का बहुत- बहुत आभार.

S.N SHUKLA said...

Dhirendra ji,
Amarendra ji,
patali the village

रचना को आपकी अनुशंसा मिली,आभारी हूँ,धन्यवाद.

हरकीरत ' हीर' said...

पाल्या फिर कही जायेगी यह धरा ,और नदियाँ , कही जायेंगी फिर वरा,पूजे जायेंगे तरु, गुल्म, पादप, लता ,उर्वरा अपनी उगलेगी , सोना हरा ,जब प्रकृति की यहीं शेष होगी कृपा ,शहर, गावों की उस दिन , शरण आयेंगे

सुंदर ख्याल .....!!

चन्दन..... said...

सच शहर एक दिन गाँव देख कर ललचाएगा|
और इस अंधानुकरण विकास में मुंह कि खायेगा|
बहुत हि अच्छी रचना|

Nityanand Gayen said...

बहुत कुछ सीखने को मिलेगा आपसे ............

Nityanand said...

बहुत कुछ सीखने को मिलेगा आपसे ............

mahendra verma said...

इस सुंदर गीत में व्यक्त की गई कामना फलीभूत हो।
बहुत बढि़या रचना।

S.N SHUKLA said...

Harkeerat heer ji,
Chandan ji,
आपके स्नेह और शुभकामनाओं का आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

Nityanand ji,
Mahendra verma ji,

आप मित्रों का स्नेह मिला, बहुत- बहुत आभार .