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Sunday, November 27, 2011

(121) दास्तां बदलो

अन्धेरा घिर न आये दोस्तों, बुझती शमां बदलो /
चमन गुलज़ार कर पाए न , ऐसा बागवाँ बदलो  /

 दिलों  में जल रही है आग ,   कैसी कसमसाहट  है,
ज़माना , चाहता कुछ कर गुजरना है , समां बदलो /

न ज्यादा आजमाने की , ज़रुरत रह गई  इनको ,
गुज़र जाएँ न लमहे , वक़्त रहते राजदां  बदलो  /

तसल्ली कब  तलक होगी भला झूठे दिलासों से ,
अगर बरसें न ये बादल , तो सारा आसमां बदलो /

दिया तब पीठ पर खंजर, इन्हें जब भी मिला मौक़ा ,
लुटेरे  काफिले  का   साथ  छोडो  , कारवां बदलो  /

ये इस्पाती घड़े हैं  , जुर्म से भर जायेंगे , फिर भी  ,
न टूटेंगे  ,  इन्हें तोड़ो  ,   पुरानी  दास्तां   बदलो  /


                                             - S. N. Shukla

22 comments:

अनुपमा त्रिपाठी... said...

gahan ...chintan se bhari .....suder rachna ...
abhar.

अनुपमा पाठक said...

बदल डालने का यह संकल्प फलीभूत हो!

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रेरणा जगाती कविता।

मनोज पटेल said...

बढ़िया...

S.N SHUKLA said...

Anupama Tripathi ji,
Anupama Pathak ji,
आपने सराहा, शब्दों को सार्थकता दी, बहुत- बहुत आभार.

S.N SHUKLA said...

Pravin pandey ji,
Manoj patel ji,

आप शुभचिंतकों के समर्थन का ह्रदय से आभारी हूँ, धन्यवाद .

sushila said...

बदलने का आहवान बहुत ही ओजस्वी स्वर में किया है आपने! एक सोच की शुरूआत है जो विचार और कर्म भी बनेगी ! आमीन !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

तसल्ली कब तलक होगी भला झूठे दिलासों से ,
अगर बरसें न ये बादल , तो सारा आसमां बदलो /

वाह , बहुत सुन्दर ..प्रेरणादायक रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!

ASHA BISHT said...

न ज्यादा आजमाने की , ज़रुरत रह गई इनको ,
गुज़र जाएँ न लमहे , वक़्त रहते राजदां बदलो /
behad khub.....

vidya said...

वाह...बहुत सुन्दर और सार्थक कविता...

Reena Maurya said...

ati sundar prastuti hai...

S.N SHUKLA said...

Sushila ji,
सराहना और शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद.

S.N SHUKLA said...

Sangita ji,

आपका स्नेहाशीष मिला , हार्दिक आभार.

S.N SHUKLA said...

Dr. Roopchandra Shastri ji,
Asha ji,
Vidya ji,

आपकी सराहना का आभार व्यक्त करता हूँ.

S.N SHUKLA said...

रीना मौर्या जी,
रचना को आपका स्नेह और समर्थन मिला , आभारी हूँ.

Anita said...

दिलों में जल रही है आग , कैसी कसमसाहट है,
ज़माना , चाहता कुछ कर गुजरना है , समां बदलो /
सचमुच आज परिवर्तन होना अवश्यम्भावी है...सुंदर प्रस्तुति !

mahendra verma said...

परिवर्तन का इशारा करती अच्छी ग़ज़ल।
बधाई, शुक्ल जी।

S.N SHUKLA said...

अनीता जी,
महेंद्र वर्मा जी,
आप दोनों शुभचिंतकों की शुभकामनाएं मिलीं, आभारी हूँ आपके स्नेह का .

अमरनाथ 'मधुर' said...

'ये इस्पाती घड़े हैं जुर्म से भर जायेंगे फिर भी
न टूटेंगे, इन्हें तोड़ो, पुरानी दास्ताँ बदलो |'

घड़े इस्पात के चाहे घड़े मजबूत कितने हों
गलेंगे मोम बन के तुम दिल में दहकती आग में बदलो |

Suman Dubey said...

shukal ji namskar, bdlaav ko preit karti gajal

S.N SHUKLA said...

अमरनाथ " मधुर " जी ,
सुमन दुबे जी,

आप शुभचिंतकों की शुभकामनाओं का आभारी हूँ , धन्यवाद .