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Sunday, January 22, 2012

(134) डरा कर इनसे /

हुक्मरां अब भी हैं बेदर्द ,  डरा कर इनसे /
ये किसी के नहीं हमदर्द ,  डरा कर इनसे /

गोलियाँ इनको चलाने से  भी गुरेज नहीं ,
भूखे- नंगों पे लाठियों से भी परहेज नहीं ,
ज़ुल्म की हद से गुजरते हैं अपनी शेखी में ,
वास्ते  इनके  कोई  कायदे - बंधेज  नहीं ,
ये  निगाहें  हैं बड़ी सर्द ,  डरा  कर  इनसे /
हुक्मरां अब भी हैं बेदर्द ,  डरा कर इनसे /


सड़क पे इनको उतरते हुए  डर लगता है,
भीड़  के  बीच गुजरते  हुए  डर लगता  है,
ये हैं संगीनों के साये में भी दहशत से भरे,
घर से बाहर भी निकलते हुए डर लगता है ,
और कहते हैं  खुद को मर्द , डरा कर इनसे  /
हुक्मरां अब  भी हैं  बेदर्द ,  डरा कर  इनसे /


आम इनसान को जाहिल ही  समझते  हैं  ये ,
सारी दुनिया की अकल खुद में समझते हैं ये ,
मुखालफ़त क्या , मशविरा भी गवारा न इन्हें ,
अलहदा  सबसे नस्ल  खुद की  समझते हैं ये ,
इनको दुनिया का नहीं दर्द , डरा कर इनसे  /
हुक्मरां  अब  भी  हैं बेदर्द ,  डरा कर  इनसे /

कुर्सियों के लिए , कुत्तों की  तरह लड़ते हैं ,
कुर्सियाँ पा के  मगर , शेर सा  अकड़ते  हैं ,
चलाते तब हैं ये जंगल का कायदा - क़ानून ,
बाप का माल समझ , खुद का ही घर भरते हैं ,
हमाम  में  हैं  ये  बेपर्द , डरा  कर  इनसे /
हुक्मरां अब भी हैं बेदर्द ,  डरा कर इनसे /
                            - एस. एन. शुक्ल 

44 comments:

Rajesh Kumari said...

shaandar likha hai aur bilkul sach likha hai.

अनुपमा त्रिपाठी... said...

..आज के हालात बयां करती ग़ज़ल .....बहुत बढ़िया ...

vidya said...

असुंदर सच...
सुन्दर रचना....
सादर..

प्रवीण पाण्डेय said...

जब आहें जली हैं,
दूरी भली है..

नीरज गोस्वामी said...

शुक्ला जी कमाल की रचना है आपकी...सच्चाई को बखूबी बयां किया है आपने हर पंक्ति में...बधाई स्वीकारें

नीरज

अनामिका की सदायें ...... said...

aapke pas shabd bhandaar aseemit hai...hatprabh hoti hu...ye soch kar apki rachnao ko padhte hue.

RITU said...

राजनीती ही राजनीती चारों ओर..
kalamdaan.blogspot.com

रचना दीक्षित said...

सच ही कहा है.लाजवाब!!!

Aditya said...

//घर से बाहर भी निकलते हुए भी डर लगता है,
और कहते हैं ख़ुद को मर्द, डरा कर इनसे..

mazaa aa gaya sir.. kamaal ekdum :)

S.N SHUKLA said...

Rajesh kumari ji,
Anupama ji,
आपके प्रशंसा भरे शब्दों से मुझे सृजन की प्रेरणा मिलाती है, आभार.

S.N SHUKLA said...

Vidya ji,

आपका स्नेह मिला , कृतज्ञ हूँ.

S.N SHUKLA said...

Pravin pandey ji,
Neeraj Goswami ji,

आपकी उदारमना सराहना का बहुत- बहुत आभार.

S.N SHUKLA said...

Anamika ji,

शायद कुछ ज्यादा ही प्रशंसा कर दी आपने , आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

Ritu ji,

आपके ब्लॉग पर आगमन और सकारात्मक समर्थन का आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

Rachana Dixit ji,
Aditya ji,

आपके सकारात्मक समर्थन का आभारी हूँ.

mahendra verma said...

हुक्मरानों से अब डर के सिवा मिलता ही क्या है।
अच्छी रचना।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

रोशनाई नहीं, तेज़ाब से लिखा नगमा है ये.. परमात्मा आपके कलम की आग बरकरार रखे!!

दीपिका रानी said...

प्रासंगिक कविता। बस एक बात कहना चाहूंगी। हुक्मरानों में सिर्फ मर्द ही नहीं हैं.. इसलिए 'और कहते हैं खुद को मर्द' थोड़ा सा खटका। बाकी कविता बहुत सुंदर है।

sushila said...

क्या तंज किया है आपने इन हुक्मरानों पर! सच है ये संगीन के साये में भी डरते हैं।
बहुत ही सुंदर और सार्थक रचना!

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' said...

खूबसूरत-लाजवाब प्रस्तुति के लिए आपको हार्दिक बधाई


जय जय सुभाष !

NISHA MAHARANA said...

सम-सामयिक प्रस्तुति बहुत अच्छी है।

S.N SHUKLA said...

Mahendra verma ji,
Salil verma ji,

आपका स्नेहाशीष मिला आभार.

S.N SHUKLA said...

Deepika ji,
आपके ब्लॉग पर शुभागमन और समर्थन का आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

Sushila ji,
Nagesh pandey ji,

आपका स्नेह पाकर सार्थक हुयी रचना.

S.N SHUKLA said...

Sanjay ji,
Nisha ji,

आभार आपकी सार्थक प्रतिक्रया का.

Kashish Shukla said...

शुक्ल जी, वर्तमान परिवेश के सच को प्रस्तुत करती हुई, इस अद्भुत रचना के लिए बधाइयाँ।

Rosanne Cash (एक अमेरिकेन गायक, संगीतकार, एवं लेखक ) ने कहा है -

“The key to change... is to let go of fear.”


पर अपने डर को स्वीकार करे बिना उसका सामना कर पाने की परिकल्पना व्यर्थ है ।

dheerendra said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति,भावपूर्ण आज के हालात की अच्छी रचना,..

WELCOME TO NEW POST --26 जनवरी आया है....

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए.....

dinesh aggarwal said...

सुन्दर, सार्थक एवं सटीक भाव.....
कृपया इसे भी पढ़े-
क्या यही गणतंत्र है

अनुपमा त्रिपाठी... said...

आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 28/1/2012 को। कृपया पधारें और अपने अनमोल विचार ज़रूर दें।

आशु said...

This is real..thanks for giving it a voice with your words...This is voice of so many suppressed and depressed individuals..like a Mirror to our Society

सदा said...

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया ।

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।


सादर

रश्मि प्रभा... said...

कुत्ते से शेर तक की यात्रा बड़ी हास्यास्पद होती है ... अच्छी रचना

देवेन्द्र पाण्डेय said...

रंगीन ब्लॉग संगीन कविता..दोनो आकर्षित करते हैं।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कुर्सियों के लिए , कुत्तों की तरह लड़ते हैं ,
कुर्सियाँ पा के मगर , शेर सा अकड़ते हैं ,
चलाते तब हैं ये जंगल का कायदा - क़ानून ,
बाप का माल समझ , खुद का ही घर भरते हैं ,

खरी खरी कहती सार्थक रचना

sumant said...

Atyant Satya aur Marmik

S.N SHUKLA said...

Kashish Shukla ji,
Dheerendra ji,
आभार आप मित्रों का उत्साहवर्धन के लिए.

S.N SHUKLA said...

Dinesh Agrawal ji,

आपके ब्लॉग पर पधारने और समर्थन का ह्रदय से आभारी हूँ..

S.N SHUKLA said...

Anupama ji,
Ashu ji,
Sada ji,

आपसे इसी स्नेह की अपेक्षा थी,धन्यवाद.
स्नेह मिला, आभार.

S.N SHUKLA said...

Yashawant Mathur ji,
Rashmi prabha ji,
Devendra pandey ji,

स्नेह मिला, आभार.

S.N SHUKLA said...

Sangita ji,

आपका स्नेहिल समर्थन पाकर सार्थक हुयी रचना,आभार.

S.N SHUKLA said...

Sumant ji,
ब्लॉग पर पधारने और समर्थन का आभारी हूँ..

***Punam*** said...

काबिल-ए-तारीफ....

S.N SHUKLA said...

Poonam ji,

आभारी हूँ आपके स्नेहिल समर्थन का.