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Wednesday, January 11, 2012

(131) मंजिलों को तलाशा किये /

मन में पाले भरम, उसका होगा करम ,
बस  भटकते  रहे ,  एक आशा  लिए /
रिश्ते- नातों के फैले  बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /

ठोकरें ही मिलीं, हम जिधर भी गए ,
फिर भी हर बार  रस्ते तलाशे नए ,
खाइयों को रहे  पाटते   उम्र  भर,
उम्र भर संग खुद ही तराशा किये /
रिश्ते- नातों के फैले बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /

वह सितमगर है तो मैं भी  गमख्वार  हूँ ,
क्या करूँ , अपनी  आदत  से  लाचार हूँ ,
उसकी नफ़रत को , चाहत में दूंगा बदल,
क्या जिए , गर जिए मन निराशा लिए /
रिश्ते- नातों  के  फैले  बियाबान  में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा   किये /

टूट जाऊँ मगर  झुक  न  पाऊँगा  मैं,
अपनी आदत है यह , रुक न पाऊँगा मैं,
बंदगी तब तलक, जब तलक ज़िंदगी ,
फ़ायदा  बेवजह  क्या  तमाशा  किये ?
रिश्ते- नातों के फैले बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /
                  -  एस. एन . शुक्ल 










44 comments:

Kewal Joshi said...

वाह !! 'मंजिलें' तलाशने वालों को ही मिलती हैं.

vidya said...

बहुत बढ़िया...
जिंदगी की तरफ आपका नजरिया भी और ये अभिव्यक्ति भी..
सादर.

Pradeep said...

शुक्ल जी नमस्ते ..
जीवटता और आशाओं को शब्दों में खूब पिरोया है आपने ..
मकर सक्रांति पर्व की अग्रिम शुभकामनाएं .... प्रदीप

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

अच्छी कविता.. निराशा के भावों के बीच उनसे लड़ने का सन्देश भी देती है!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

यूँ ही हौसला रहे .. चलना ही जिंदगी है .. अच्छी प्रस्तुति

Aditya said...

//ठोकरें ही मिली, हम जिधर भी गए,
फिर भी हर बार, रास्ते तलाशे नए,

//टूट जाऊं मग८अर झुक ना पाऊंगा मैं,
अपनी आदत है यह, रुक ना पाऊंगा मैं,

क्या बात है सर, मज़ा आ गया.. लाजवाब रचना..

कभी वक़्त मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी आईयेगा.. आशा करता हूं आपको पसंद आएगा..
palchhin-aditya.blogsopt.com

सम्वेदना के स्वर said...

जब उसके अस्तित्व पर बह्रोसा है तो इतनी निराशा क्यों!! कविता बहुत अच्छी है!!

प्रवीण पाण्डेय said...

मंजिलों ने सीख ली क्यूं, लुकने छिपने की अदा

अनामिका की सदायें ...... said...

sunder prastuti.

मनोज कुमार said...

खुशी से बढ़कर पौष्टिक खुराक और कोई नहीं है। दूसरों को खुशी देना सबसे बड़ा पुण्‍य का काम है।

Anita said...

टूट जाऊँ मगर झुक न पाऊँगा मैं,
अपनी आदत है यह , रुक न पाऊँगा मैं,
बंदगी तब तलक, जब तलक ज़िंदगी ,
फ़ायदा बेवजह क्या तमाशा किये ?
रिश्ते- नातों के फैले बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /

बन्दगी की पहली शर्त है झुकना... और झुकना जो सीख गया मंजिल सामने ही है..बहुत सुंदर कविता!

S.N SHUKLA said...

Kewal joshi ji,
Vidya ji,
Pradeep ji,

आभारी हूँ आपके ब्लॉग पर आगमन और आशीर्वाद प्रदान करने के लिए.

S.N SHUKLA said...

Lalit verma ji,
Sangita ji,

आप शुभचिंतकों का उत्साहवर्धन ही मेरा मार्गदर्शक है.

S.N SHUKLA said...

Aditya ji,
Alok ji,
आपकी शुभकामनाओं का बहुत- बहुत आभार, धन्यवाद.

S.N SHUKLA said...

Pravin pandey ji,
Anamika ji,
Manoj ji,

आप मित्रों कास्नेह मिला, कृतार्थ हुयी रचना.

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर
क्या कहने

kshama said...

Wah! Kya baat hai!

ana said...

bahut hi sundar post....shubhakamnaye

Maheshwari kaneri said...

वाह: बहुत सुन्दर मंजिल हिम्मत वालो को ही मिलती है...

Jitendra Gupta said...

टूट जाऊँ मगर झुक न पाऊँगा मैं,
अपनी आदत है यह , रुक न पाऊँगा मैं,
बंदगी तब तलक, जब तलक ज़िंदगी ,
फ़ायदा बेवजह क्या तमाशा किये ?
bahut hi sundar aur utkrist rachana;;;

Jitendra Gupta said...

टूट जाऊँ मगर झुक न पाऊँगा मैं,
अपनी आदत है यह , रुक न पाऊँगा मैं,
बंदगी तब तलक, जब तलक ज़िंदगी ,
फ़ायदा बेवजह क्या तमाशा किये ?
bahut hi sundar aur utkrist rachana;;;

Jitendra Gupta said...

टूट जाऊँ मगर झुक न पाऊँगा मैं,
अपनी आदत है यह , रुक न पाऊँगा मैं,
बंदगी तब तलक, जब तलक ज़िंदगी ,
फ़ायदा बेवजह क्या तमाशा किये ?
bahut hi sundar aur utkrist rachana;;;

Jitendra Gupta said...

टूट जाऊँ मगर झुक न पाऊँगा मैं,
अपनी आदत है यह , रुक न पाऊँगा मैं,
बंदगी तब तलक, जब तलक ज़िंदगी ,
फ़ायदा बेवजह क्या तमाशा किये ?
bahut hi sundar aur utkrist rachana;;;

Sikta said...

बस !चलते ही जाना है ,रुकना नहीं है.

डॉ. जेन्नी शबनम said...

bahut sundar abhivyakti, shubhkaamnaayen.

काव्य संसार said...

वह सितमगर है तो मैं भी गमख्वार हूँ ,
क्या करूँ , अपनी आदत से लाचार हूँ ,
उसकी नफ़रत को , चाहत में दूंगा बदल,

बहुत खूब लिखा है महाशय आपने | आभार |

डा. श्याम गुप्त said...

बहुत सुन्दर कहा--

’अनुबन्धों के जग में अब क्या,
सम्बन्धों की बात करें’

S.N SHUKLA said...

Mahendra shrivastav ji,
K. Shama ji,
aap shubhachintakon kaa sneh milaa, bahut- bahut aabhaar.

S.N SHUKLA said...

Ana ji,
Maheshwari kaneri ji,

आपका रचना को आशीर्वाद मिला, यह अनुकम्पा सदैव बनी रहे.

S.N SHUKLA said...

जीतेन्द्र गुप्ता जी
एक ही रचना पर आपकी कई प्रतिक्रियाएं मिलीं, किन शब्दों में आभार व्यक्त करें , यह स्नेह सदैव मिलता रहे.

S.N SHUKLA said...

sIKTA JI,
स्नेह मिला , बहुत - बहुत आभार.

S.N SHUKLA said...

Pradeep ji,
SHYAM GUPTA JI,

आपका रचना को आशीर्वाद मिला, यह अनुकम्पा सदैव बनी रहे.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर रचना!
मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएँ!

sunil raj nair said...

आपकी कविता पढ़ी अच्छी लगी, मकर संक्राति की शुभकामनाओ के साथ .आभार .

S.N SHUKLA said...

SHASTRI JI,
NAIR JI,
Apakee shubhakaamanayen mileen, bahut- bahut aabhar.

Manoj said...

bahut sundar

Manoj said...

bahut sundar

S.N SHUKLA said...

MANOJ JI,

आपका स्नेहाशीष मिला, आभार, धन्यवाद.

RAMESH SHARMA said...

बहुत ही मोहम और रोचक शैली है आपकी

RAMESH SHARMA said...

बहुत ही मोहम और रोचक शैली है आपकी

RAMESH SHARMA said...

बहुत ही मोहम और रोचक शैली है आपकी

RAMESH SHARMA said...

बहुत ही मोहम और रोचक शैली है आपकी

RAMESH SHARMA said...

बहुत ही मोहम और रोचक शैली है आपकी

S.N SHUKLA said...

Ramesh sharma ji,
आपके स्नेह और शुभकामनाओं का बहुत- बहुत आभार .