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Friday, December 2, 2011

(123 ) पहले इन्सान को इन्सान बनाया जाए

                                   फिर से बदलाव का एक दौर चलाया जाए  /
                                   पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                  चाँद - तारों पे  पहुँचने लगा इन्सान मगर  ,
                                  आसमानों में भी उड़ने लगा इन्सान मगर ,
                                  यार मतलब के सभी , झूठ के रिश्ते - नाते ,
                                  भूलता जा रहा  , इन्सान को इन्सान मगर ,
                                  फिर से इन्सानियत का पाठ पढ़ाया  जाए /
                                  पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                  पहले मुश्किल थी जिन्दगी , बहुत ही किल्लत थी ,
                                  पहले  रस्ते  न थे  ,  दूरी  थी  , मगर  मिल्लत थी ,
                                  पहले  गम  और खुशी  , गैर की  भी ,  अपनी  थी ,
                                  जिन्दगी तल्ख़ भले थी  ,  मगर- न ज़िल्लत  थी ,
                                  आज  के दौर ! किसे  अपना बताया जाए  /
                                  पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                  लूट हर  ओर  मची  है , नीयत  में खामी  है,
                                  आम इन्सान की किस्मत में ही नाकामी है,
                                  अक्लमंदों को यहाँ ,खुश्क रोटियाँ मुश्किल ,
                                  हरामखोर  !    बड़े  हैं ,     बड़ा   हरामी   है ,
                                  हर गुनहगार  को  औकात में लाया जाए /
                                  पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                                                    - S. N. Shukla

35 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

ये दृश्य हमारे विकास पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं।

अमरनाथ 'मधुर' said...

बहुत शानदार गीत है | बधाई |

S.N SHUKLA said...

प्रवीण पाण्डेय जी,
अमरनाथ मधुर जी,
आप मित्रों के स्नेह का आभारी हूँ, हमेशा देते रहें यह स्नेहाशीष .

रश्मि प्रभा... said...

insaan ko insaan banana bada mushkil hai...

अनुपमा त्रिपाठी... said...

gahan aur katu satya bhi ....

Anita said...

यथार्थवादी रचना !

vidya said...

बेहतरीन.....पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.
बधाई.

S.N SHUKLA said...

Rashmi prabha ji,
Anupamaa j,
आपके स्नेह और शुभकामनाओं का आभारी हूँ ,धन्यवाद.

S.N SHUKLA said...

Anita ji,
Vidya ji,

आपने सराहा, हम आभारी हैं.

"जाटदेवता" संदीप पवाँर said...

क्या जबरद्स्त बात कही है?

Reena Maurya said...

bahut hi vicharniy or bhavmayi rachana hai..

Maheshwari kaneri said...

बहुत गहन सोच लिए सुन्दर अभिव्यक्ति...

सतीश सक्सेना said...

आनंद आ गया इस सहज प्रवाह में....
शुभकामनायें स्वीकार करें !

S.N SHUKLA said...

Sandip panwar ji,
Reena Maurya ji,
Maheshwari kaneri ji,
आप शुभचिंतकों की शुभकामनाओं का आभारी हूँ,आगे भी देते रहें यह स्नेह.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

चमकते भारत की हकीकत खोल देते है यह दृश्य ....

अनामिका की सदायें ...... said...

sach kaha aapne ...lekin ye path bahut mushkil hai padhaana.

अनुपमा त्रिपाठी... said...

कल शनिवार ... 03/12/2011को आपकी कोई पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

S.N SHUKLA said...

डॉक्टर मोनिका शर्मा जी,
अनामिका जी,
अनुपमा जी,
आप सबके मधुर स्नेहाशीष का आभारी हूँ .

मनोज कुमार said...

आपकी इस मुहिम, पहले इंसन को इंसान बनाया जए, वाकेई बहुत ज़रूरी और सार्थक मुहिम है। यह हो जाए तो बाक़ी के सारे मसले हल होने शुरु हो जाएंगे।

Udaya said...

bahut sateek aur yatharth darshati kavita:)

नीरज गोस्वामी said...

वाह ..बेजोड़ भावाभिव्यक्ति...बधाई स्वीकारें

नीरज

S.N SHUKLA said...

मनोज कुमार जी,
उदय जी,
नीरज गोस्वामी जी,
आप मित्रों की शुभकामनाओं का बहुत- बहुत आभार , इस स्नेह और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद.

प्रेम सरोवर said...

सार्थक प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । आभार.।

प्रतिभा सक्सेना said...

'पहले इन्सान को इन्सान बनाया जाये ,
दास्ताँ बदलो ,
जिस्म इंसान के गोलियाँ बन गये'
उपरोक्त तीनों कवितायें पढ़ कर बहुत अच्छा लगा .
जिन विसंगतियों का उल्लेख आपने किया है ,वे हमें खोखला करे डाल रही हैं. मैंने पाया संपादक की सजग दृष्टि और कुशल अभिव्यक्ति ,जो जन -चेतना को उद्वेलित कर दे .
आपका अभिनन्दन !

Nityanand Gayen said...

सुंदर रचना , बधाई स्वीकारें

Nityanand Gayen said...

सुंदर रचना , बधाई स्वीकारें

S.N SHUKLA said...

प्रेम सरोवर जी ,
आपकी प्रसंशा का ह्रदय से आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

प्रतिभा सक्सेना जी,
आपकी द्रष्टि और मेरी कविताओं के आकलन ने चाहे कुछ भी समझा हो किन्तु मैं स्वयं को अभी भी एक विद्यार्थी ही मानता हूँ. आप ने मुझे जो मान दिया उसका कृतज्ञ हूँ, धन्यवाद.

S.N SHUKLA said...

नित्यानंद ज्ञान जी,
आपके स्नेहाशीष का बहुत- बहुत आभार.

रविंद्र "रवी" said...

पहले इन्सान को इन्सान बनाया जाए /
बहुत सही कहा है जी आपने. आजकल इंसान चिराग लिए ढूंढो तो भी नहीं मिलते.

mahendra verma said...

अजीब बात है कि इंसान कभी इंसान जैसा रहा ही नहीं।
प्रेरणा देता हुआ गीत।

S.N SHUKLA said...

रविन्द्र रवि जी,
महेंद्र वर्मा जी,
आप मित्रों ने सराहा , मेरा अपने शब्दों के प्रति विश्वास बढ़ा , देते रहें यह स्नेह.

दिगम्बर नासवा said...

सच कहा है ... जब तक आदमी आदमी बन के नहीं रहेगा ये दुनिया जीने लायक नहीं रह पायगी ...
गहरे पश्न उठा रही है रचना ...

Pranshu said...

इस रचना को पढ़ कर कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं

घरो पर नाम थे, नाम के आगे ओहदे थे
बहुत तलाश की, कोई आदमी न मिला.

S.N SHUKLA said...

Digambar Naswa ji,
Pranshu ji,

आपका स्नेह मिला, बहुत- बहुत आभार.