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Sunday, December 4, 2011

(124) दामन तेरा मैला न था /

                        पहले तो  तूने  कभी  , ऐसा ज़हर उगला न था  /
                         इस तरह , दुश्मन पे भी तेरा लहू उबला न था /

                        जब खडा था तू   !  अजीजों के लिए , खंजर लिए  ,
                        क्या न कांपा था कलेजा , दिल तेरा मचला न था ?

                        यूँ शहर में आज , सन्नाटे का आलम किसलिए  ,
                        क्या इधर से आज कोई  आदमी निकला न था  ?

                        आज  तेरे भी   ज़ेहन में ,  उठ रहा  होगा   सवाल  ,
                        क्यों उधर को चल दिए , जब रास्ता अगला न था ?

                       तुम तो दुश्मन पे भी , दुश्मन सी नज़र रखते न थे ,
                       बस इसी से , आज तक -  दामन तेरा मैला न था  /

64 comments:

अनुपमा पाठक said...

आदमी का आदमी होना नहीं आसान...
कहीं गुम हो गया है इंसान!

प्रेम सरोवर said...

सुन्दर प्रस्तुति |मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वगत है । कृपया निमंत्रण स्वीकार करें । धन्यवाद ।

दिगम्बर नासवा said...

तुम तो दुश्मन पे भी , दुश्मन सी नज़र रखते न थे बस इसी से , आज तक - दामन तेरा मैला न था ...

बहुत खूब शुक्ल जी ... कमाल की गज़ल और लाजवाब शेर ... सुभान अल्ला ...

S.N SHUKLA said...

Anupama pathak ji,
Prem Sarover ji,
Digamber Naswa ji,
आप मित्रों की शुभकामनाओं का आभार, आगे भी मिलता रहे यह स्नेह , यही अपेक्षा है .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज तेरे भी ज़ेहन में , उठ रहा होगा सवाल ,
क्यों उधर को चल दिए , जब रास्ता अगला न था ?

बहुत सुन्दर ...

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी दमदार प्रस्तुति।

S.N SHUKLA said...

प्रवीण पाण्डेय जी,
संगीता जी,
आप मित्रों का बहुत- बहुत आभार और अभिनन्दन, आपसे सदैव उत्साहवर्धन मिला है . अनमोल है आपका स्नेह.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
शुक्ला जी आप कभी हमारे ब्लॉग उच्चारण पर नहीं आते हो!

Udaya said...

दुश्मनी दुश्मन ही बढ़ाती है यहाँ
दुश्मन को आदमी समझेगा जो
वही शायद सुकून पायेगा यहाँ

शुक्ल जी वाह! दमन को मैला होने से बचाना ही तो इंसानियत है!

Udaya said...

दुश्मनी दुश्मन ही बढ़ाती है यहाँ
दुश्मन को आदमी समझेगा जो
वही शायद सुकून पायेगा यहाँ

शुक्ल जी वाह! दमन को मैला होने से बचाना ही तो इंसानियत है!

S.N SHUKLA said...

डॉक्टर रूपचंद शास्त्री जी,
उदय जी,
आप शुभचिंतकों की सराहना मिली, कृतज्ञ हूँ.

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार है..धन्यवाद ।

Reena Maurya said...

ati sundar rachana hai...

chetankavi said...

"
आदमी ही आदमी का हो गया है दुश्मन जहाँ
जंगल के जानवर से, अब डर नहीं लगता हमे!"

शुक्ला जी, बहुत ही प्यारी रचना है जो सच को प्रदर्शित करती है! नमन आपकी लेखनी को!

S.N SHUKLA said...

Maheshwari kaneri ji,
Reena Maurya ji,
Chetan kavi ji,
आप मित्रों के स्नेहाशीष का कृतज्ञ हूँ , यह अनुकम्पा मिलाती रहे.

vidya said...

बहुत बढ़िया....बहुत अच्छी गज़ल...

अनुपमा त्रिपाठी... said...

क्यों उधर को चल दिए , जब रास्ता अगला न था ?

सार्थक प्रश्न करती हुई सशक्त ..रचना ...!!

Anonymous said...

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S.N SHUKLA said...

अनुपमा जी ,
विद्या जी,
ब्लॉग पर आपके आगमन का अभिनन्दन और हार्दिक आभार आपके स्नेह का .

रजनीश तिवारी said...

आदमी ही आदमी का दुश्मन क्यूँ है ... बहुत बढ़िया रचना

मनोज कुमार said...

हर शे’र लाजवाब। मन में जगह बनाती ग़ज़ल।

Anita said...

बहुत प्रभावशाली रचना..दुश्मन को दोस्त समझने की कला आ जाये तभी आदमीयत कायम रहेगी.

मंजुला said...

बहुत अच्छी रचना ....
" तुम तो दुश्मन पे भी , दुश्मन सी नज़र रखते न थे ,
बस इसी से , आज तक - दामन तेरा मैला न था /"
बहुत सुन्दर पन्तिया ,मेरे ब्लॉग तक आने व हौसला बढाने के लिए धन्यवाद

S.N SHUKLA said...

रजनीश तिवारी जी,
मनोज कुमार जी,
मेरे साथ आप मित्रों का हमेशा स्नेह रहा है, इस रचना को भी स्नेहाशीष प्रदान करने का आभार.

S.N SHUKLA said...

अनीता जी,
मंजुला जी,
ब्लॉग पर आप शुभचिंतकों का अभिनन्दन तथा शुभकामनाओं के लिए आभार.

veerubhai said...

अच्छी ही नहीं सशक्त रचना है भाई साहब .बधाई .

Anjana (Gudia) said...

आज तेरे भी ज़ेहन में , उठ रहा होगा सवाल ,
क्यों उधर को चल दिए , जब रास्ता अगला न था ?
bahut achche sawal uthati rachna… bahut khoob!

ZEAL said...

lovely creation..

S.N SHUKLA said...

Veerubhai ji,
Anjana(Gudia) ji,
zeal ji,
आप स्नेहीजनों और मित्रों का ब्लॉग पर अभिनन्दन तथा उत्साहवर्धन का आभार

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सच्चे ह्रदय से निकली एक सच्ची अभिव्यक्ति!!

सतीश सक्सेना said...

बस इसी से आज तक, दामन तेरा मैला न था ...

बहुत प्यारी रचना ...
शुभकामनायें !

vandana said...

आज तेरे भी ज़ेहन में , उठ रहा होगा सवाल ,
क्यों उधर को चल दिए , जब रास्ता अगला न था ?

अच्छे शेर

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

तुम तो दुश्मन पे भी , दुश्मन सी नज़र रखते न थे
बस इसी से , आज तक - दामन तेरा मैला न था ...
वाह शुक्ला जी,
बहुत ही खूबसूरत शेर कहे हैं आपने !
सारे शेर एक से बढ़कर एक !
मुबारक हो !

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

यूँ शहर में आज , सन्नाटे का आलम किसलिए , क्या इधर से आज कोई आदमी निकला न था ?
शुक्ल जी बहुत सुन्दर किस किस पंक्ति का उल्लेख किया जाए ..सुन्दर ...
अब "आदमी" और इंसानियत की इस जहां से कमी ही होती जा रही है ...काश लोग समझें ...
भ्रमर ५

Maharana Ganesh said...

Bohut hi umda ambivyakti..

डॉ. जेन्नी शबनम said...

sabhi sher behad umdaa, badhai.

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शुक्ला जी, बिल्कुल नि:शब्द कर दिया.हर पंक्ति चिंतन बन कर जेहन में समा गई.

हास्य-व्यंग्य का रंग गोपाल तिवारी के संग said...

Badhiya post. Behtarin rachna.

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S.N SHUKLA said...

Veerubhai,
Anjana ji,
ZEAL JI,
आप मित्रों का स्नेहाशीष मिला , आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

LALIT VERMA JI,
sATISH SAXENA JI,
vANDANA JI,

आप स्नेहियों की स्नेह वर्षा से नहा गया, आभार.

S.N SHUKLA said...

GYANCHAND GARMAGYA JI,
SURENDRASHUKLA JI,
MAHARANA GANESH JI,


आप के ब्लॉग पर आगमन और सकारात्मक टिप्पणियों का आभारी हूँ.

S.N SHUKLA said...

ZENNI SHABANAM JI,
JYOTI MISHRA JI,

आपके स्नेह की वर्षा से अभिभूत हूँ, हमेशा प्रतीक्षा रहेगी इस स्नेह की.

S.N SHUKLA said...

ARUN NIGAM JI,
GOPAL TIWARI JI,

आप के ब्लॉग पर आगमन और सकारात्मक टिप्पणियों का आभारी हूँ.

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