
एक चलने , दूसरा सुनने,
तीसरा देखने में असमर्थ !
तीसरा देखने में असमर्थ !
इतना रद-ओ-बदल है .
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इस देश में एक विधायिका है,
जहाँ आये दिन, एक-दूसरे की टांग खिची जाती है
इसकी फसल
विभिन्न विचारधारा के दलों द्वारा सिंची जाती है
यहाँ प्रायः सरकार लंगड़ी (अल्प मत ) बनती है,
इसीलिए बैसाखी देने वालों की रबड़ी छनती है
यह भारतीय लोकतंत्र का राज है,
की सरकर दूसरों के सहारे की मोहताज है .
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इस देश में एक कार्यपालिका भी है
जो कामचोर कर्मचारियों और नौकरशाहों की चेरी है .
फलस्वरूप
हर कार्यपालन में होती अनावश्यक देरी है .
यह सुनती कम है, सदा अपने मन की करती है,
और देश की व्यवस्था का
अभिन्न अंग होने का दम भरती है .
इन्हीं के बलबूते देश का सारा प्रशासनिक कामकाज है,
यहाँ जननायकों का नहीं नौकरशाहों का राज है .
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इस देश में न्यायपालिका भी है,
जो संवैधानिक स्तर पर पूर्णतः स्वतन्त्र है
किन्तु न्याय प्रक्रिया में ,
न कहीं स्वा है और न कहीं तंत्र है .
भारतीय न्यायव्यवस्था
अधिवक्ताओं की तर्कों पर पलती है,
न्याय की देवी भी
अब लक्ष्मी के वहां पर चलती है .
यह देखती कम है सुनती ज्यादा है ,
इसीलिय हर तीसरा आदमी-
अपराध करने पर आमादा है .
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इस देश में अभी जनता भी है,
जो गूंगी और मतदाता के रूप में जानी जाती है .
इसकी कीमत-
केवल चुनाव के समय ही पहचानी जाती है .
इसे हर पाँच वर्ष बाद
आश्वासन रुपी फल मिलता है,
और इसके भोलेपन को
हर खददरधारी छलता है .
यहाँ चाटुकारों, दलालों, जमाखोरों
और नौकरशाहों की चाँदी है,
यह बात अलग है कि-
देश में जनतंत्र है, पूरी आज़ादी है .
यह गूंगों , बहरों ,अंधों और लंगड़ों का देश है ,
और देश के नाम पर-
ज़मीन जंगल तथा लक्ष्यहीन भीड़ शेष है .
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