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Saturday, December 29, 2012

(174) झूठ बोलो

                   

         "झूठ बोलो"

                                  

सच ! सियासत क्या,अदालत में भी अब मजबूर है,
झूठ  बोलो,  झूठ  की  कीमत  बहुत  है  आजकल।

जो  शराफत  ढो  रहे  हैं , हर  तरह  से  तंग  हैं ,
बदगुमानों की कदर, इज्जत बहुत है आजकल।

छोड़िये ईमानदारी , छोड़िये रहम-ओ-करम,
लूट कर भरते रहो घर, मुल्क में ये ही धरम ,

हर तरफ  बदकार,  दंगाई ,  फसादी,  राहजन ,
इनपे ही सरकार की रहमत बहुत है आजकल। 

जुल्म, बेकारी,गरीबी, मुफलिसी के देश में,
हैं लुटेरों  की जमातें , साधुओं  के वेश  में ,

हर  हुकूमत  की बड़ी कुर्सी पे,  एक मक्कार है,
सिर झुकाओ, इनकी ही कीमत बहुत है आजकल।

                                                -एस .एन .शुक्ल 

Friday, December 7, 2012

(173) कौन करता है इबादत ?

कौन करता है इबादत , सब तिजारत कर रहे ,
ख्वाहिशें पसरी  हुई  हैं ,  हर  इबादतगाह  में।

भीड़ से ज्यादा  कहीं अब , मन्नतों  की  भीड़ है,
चर्च, गुरुद्वारों, शिवालों, मस्जिद-ओ-दरगाह में।

कितनी खुदगर्जी , कि सौदेबाजी भी भगवान से,
भीख   देते  , रहमतें  हैं   देखते   अल्लाह   में।

मजहबों   के   रहनुमा ,   धर्मोपदेशक ,  पादरी ,
सबके सब बगुला भगत, दौलत है सबकी चाह में।

धर्म भी धंधा हुआ , सब कुछ बिकाऊ है यहाँ ,
चलना मुश्किल हो रहा, पगडंडियों की राह में।

बेअकल ,  बेभाव  बिकते  रोज  इस   बाज़ार  में ,
फिर भी कितनी भीड़, हर दूकां पे ख्वाहम-ख्वाह में।

                                  - एस .एन .शुक्ल 

Sunday, December 2, 2012

(172) मुक्तक

                                                 मुक्तक
                                               (1)

 हवस  इनसान को  अंधा बना देती है ,  ये सच है।
 हवस  किरदार  को गंदा बना  देती है ,  ये सच है।
हवस  में आदमी , फिर आदमी रह ही कहाँ जाता ,
हवस , इज्जत को भी  धंधा बना देती है , ये सच है।
                                        (2)
अँधेरे हर  कदम  के   सामने ,  हर  ओर  खतरा  है।
समंदर है  ये  दुनिया  और  बस  इनसान कतरा  है।
वो किश्मत हो , कि दौलत हो कि इज्जत हो कि शोहरत हो,
बलंदी पर  बशर जब  भी पहुंचता  है , तो खतरा है।
                                 (3)
जवानी में , जमाने  की  किसे परवाह होती है।
वहाँ बस आग होती है, वहाँ बस आह होती  है।
बहुत कम लोग बच पाते हैं, इस तूफाँ के मंज़र से,
बहुत मुश्किल जवानी की, ये जालिम राह होती है।

                                   - एस . एन . शुक्ल 

Thursday, October 18, 2012

(171) कुछ शेर

                                     खुदा 

ज़न्नत  है  आसमान में , ये तो  पता नहीं ,
दोजख जमीन पर है , इसका इल्म है हमें।

जो आसमान पे है उस खुदा का खौफ क्या ,
खुद को खुदा समझने वाले आदमी से डर।

हमको लगता है, खुदा बन्दों से खुद खाता है खौफ ,
इसलिए  चाहे  जो हो , वह  सामने  आता  नहीं।

कौन  कहता  है  , खुदा   आदमी   ईजाद  है,
आदमी खुद ही खुदा बनाने लगा है आजकल। 

कौन करता है इबादत, सब तिजारत कर रहे ,
हर  इबादतगाह  में , हैं  ख्वाहिशें पसरी  हुई।

मन्नतों को जो इबादत का नाम देते हैं ,
वो सौदेबाज हैं , झूठी है इबादत उनकी।

           -एस .एन .शुक्ल 

Wednesday, October 10, 2012




















(170) वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।

तेल  बाती  से  परिपूर्ण  हूँ , मुग्ध  हूँ ,
प्रज्ज्वलन की मिली पर कला ही नहीं।
वे  दमकते  रहे ,  मैं  तमस  से  घिरा ,
वह  दिया  हूँ ,  कभी जो जला ही नहीं।

सैकड़ों सांझ ले आस जीता रहा ,
कोई स्पर्श दे , थपथपाये मुझे ,
मेरी बाती को भी, कोई निज ज्योति से ,
जोड़ , स्पन्दित कर जगाये मुझे ,
पर वो हतभाग्य हूँ मैं, कि जिसका कभी ,
कोई जादू किसी पर चला ही नहीं।
वे  दमकते  रहे ,  मैं  तमस  से  घिरा ,
वह  दिया  हूँ ,  कभी जो जला ही नहीं।

मैं छुआ जब गया , तो ललकने लगा,
नेह नैनों से बाहर छलकने लगा।
मैं भी मानिन्द उनकी प्रभा दूंगा अब ,
सोच मन , बालमन सा किलकने लगा।
पर वही ढाक के पात बस तीन से ,
वह विटप हूँ , कभी जो फला ही नहीं।
 वे  दमकते  रहे ,  मैं  तमस  से  घिरा ,
वह  दिया  हूँ ,  कभी जो जला ही नहीं।

दर्द इसका नहीं, मैं जला क्यों नहीं,
दर्द यह है , तमस से लड़ा क्यों नहीं,
जब अँधेरे रहे फ़ैल थे हर तरफ ,
तो उन्हें रोकने , मैं बढ़ा क्यों नहीं।
हिम सदृश शांत , विभ्रांत प्रश्तर बना,
उस तपन में भी किंचित गला क्यों नहीं।
 वे  दमकते  रहे ,  मैं  तमस  से  घिरा ,
वह  दिया  हूँ ,  कभी जो जला ही नहीं।
                           - एस .एन .शुक्ल 

Saturday, September 29, 2012

(169) अलग फितरत से खुद को कर नहीं पाते

परिंदों के घरौंदों को , उजाड़ा था तुम्हीं ने कल ,
मगर अब कह रहे हो , डाल पर पक्षी नहीं गाते।

तुम्हीं थे जिसने वर्षों तक , न दी जुम्बिश भी पैरों को ,
शिकायत किसलिए , गर दो कदम अब चल नहीं पाते ?

वो पोखर , झील , नदियाँ , ताल सारे पाटकर तुमने ,
बगीचे  ,  पेड़  -  पौधे ,  बाग़  सारे  काटकर  तुमने   ,

खड़ी अट्टालिकाएं कीं , बनाए  महल - चौमहले  ,
मगर अब कह रहे , बाज़ार में भी फल नहीं आते।

ये कुदरत की , जो बेजा दिख रही तसवीर है सारी ,
तुम्हारी  ही  खुराफातों  की ,  ये  तासीर  है  सारी  , 

वही  तो  काटना  है  पड़  रहा  , बोते  रहे  जो  कुछ ,
मगर फिर भी ,अलग फितरत से खुद को कर नहीं पाते।

                                          - एस .एन .शुक्ल 

Saturday, September 22, 2012

(168) नदी सागर से मिले है

उम्मीद की  दरिया में  कवँल  कैसे  खिले  है ,
लम्हों की खता की सज़ा , सदियों को मिले है।

मज़बूर बशर की कोई सुनता नहीं सदा ,
वह बेगुनाह होके भी , होठों को सिले है।

इनसान की फितरत में ही , इन्साफ कहाँ है,
जर, जोर, ज़बर हैं जहां , सब माफ़ वहाँ  है।

हर दौर गरीबों पे सितम , मस्त सितमगर ,
कब  मंद  हवा से  कोई ,  कोहसार  हिले है ?

कुदरत का भी उसूल ये, कमजोर झुके है ,
सागर नहीं मिलते , नदी सागर से मिले है।

                        - एस .एन . शुक्ल 

Thursday, September 13, 2012

(167) हिन्दी हमारी मातृभाषा है

ज्यों गंगा संग विविध नदियाँ , सरस्वति है , कालिंदी है  /
त्यों अपनी अन्य सखियों संग , बड़ी बहना सी हिन्दी है  /
इसी में  कृष्ण  का  शैशव ,  इसी  में  राम  का  वैभव ,
ये भारत भाल चन्दन  है , ये  भारत  माँ की  बिंदी है  /

यहाँ   उर्दू  है  ,  बंगाली  ,  मराठी  और  गुज़राती ,
तमिल, तेलगू , असमिया और मलयालम मेरी थाती /
गुरुमुखी , कोंकड़ी , कन्नड़ हैं, उड़िया , डोंगरी भी हैं  ,
हमें हरियाणवी , मैथिलि , मिजो भी ,मणिपुरी भाती /

सगी बहनें ये हिन्दी की , वो  माँ है  तो ये मासी  हैं  ,
कहा जाता  है  भाषाएँ  ये , संस्कृत  की  नवासी हैं  ,
न होती माँ से मासी कम , मिले समवेत अपनापन ,
हमें है गर्व खुद पर , क्योंकि हम बहु भाषाभासी हैं  /


महक तुलसी की हिन्दी में , यही कबीरा की बानी है ,
ये है  रसखान  का  अनुनय  , यहीं  मीरा  दीवानी है  ,
शिवा की  बावनी  भूषण , रचाते  हैं  यहाँ  विधि से ,
ये है जगनिक का आल्हाखण्ड , वीरों की कहानी है  /

महादेवी का निर्झर स्नेह , तो फक्कड़ निराला है  ,
यहाँ बच्चन की मधुशाला में, हाला और प्याला है ,
बिहारी , सूर , जयशंकर , घनानंद और रहिमन हैं ,
यहीं नागर के नटवर हैं , तो रतनाकर की माला है  /

जायसी , पन्त , केशव, देव , दिनकर और पदमाकर ,
गिनाएं नाम कितने , व्योम है , धरती है , यह सागर  ,
ये हिन्दी ! हिंद का गौरव , करोड़ों जन की आशा है  ,
न  भाषा मात्र  यह  ,  हिन्दी  हमारी  मातृभाषा  है /

                                 - एस एन  शुक्ल 

Wednesday, September 12, 2012

(166) दीवाना बना डाला

      
हकीकत को तेरी इक जिद ने अफसाना बना डाला /
तेरी  मासूमियत  ने , मुझको   दीवाना  बना डाला /

ये दुनिया भी तेरी ही हमनवा , दुश्मन हमारी है ,
तुझे रोशन शमा  ,तो मुझको परवाना बना डाला /

तू समझे या न समझे , अपने दिल को तेरी फुरकत में ,
हमेशा  के  लिए  मैंने  ,  सनमखाना  बना  डाला /

तेरी ही याद की वर्जिश , सुबह से शब् तलक हर दम ,
ये दिल अब दिल कहाँ है,  दिल को जिमखाना बना डाला /

मैं फाकेमस्त हूँ  , मुझको ज़मीं ज़र की ज़रुरत क्या ,
तेरी  उल्फत  की  दौलत  ने  ही  , शाहाना बना डाला /

                                        -  एस.एन.शुक्ल  

Sunday, September 2, 2012

( 165 ) जीने का बहाना हो तुम

            जीने का बहाना हो तुम


जागती रातों में , सपनों का खजाना हो  तुम  /
कैसे बतलाएं , कि  जीने  का बहाना हो तुम  /

अब तो हर साँस में , धड़कन में तुम्हारी ही रिदम ,
तुम  मेरी  नज़्म , रुबाई  हो ,  तराना  हो  तुम  /

मेरे  गुलशन  में , खिलाये हैं  फूल तुमने ही ,
रंग- ओ - खुशबू से , सजाये हैं फूल तुमने ही ,

इस इनायत का , तहे दिल से हूँ मैं शुक्र -ए - गुज़ार ,
तुम  मेरी  जीश्त हो , जीनत  मेरी, ज़ाना  हो  तुम  /

तुमसे होती है शुरू दुनिया मेरी , तुम पे ख़तम ,
हमारे  वास्ते !  यह  सारा  ज़माना  हो  तुम  /

                                 - एस .एन .शुक्ल 

Sunday, August 26, 2012

(164) जब तक रहो , जलो

जीवन ऐसे जियो , कि जैसे दीपक जीता है  /
तब भी लड़ता , तेल पात्र जब होता रीता है  /

भरा पात्र हो ,  दीपशिखा  तब रहती तनी खड़ी  ,
कीट - पतंगों की भी , उस पर रहती लगी झड़ी  /

झप - झप करते आते वे , लेकिन जब टकराते ,
कहाँ तेज  सह  पाते ,  पंख  जलाते , मर जाते  /

पवन वेग  भी ,  उसे बुझाने  का  प्रयत्न  करता  ,
पर दीपक आख़िरी साँस तक , उससे भी लड़ता /

तैल पात्र जब रीत रहा होता , तब  भी  दीपक  ,
अंतिम बूँद निचुड़ने तक लड़ता रहता अनथक /

यह तो निश्चित है , ऊर्जा के शेष न रहने पर  ,
जाना होगा सबको तजकर , यह शरीर नश्वर  /

पर जो जीवन रहते , दीपक जैसा जलते  हैं ,
वे अपने प्रकाश से , जग आलोकित करते हैं /

इसीलिये कहता हूँ , बस दीपक की भाँति जलो ,
शेष रहो , न रहो जग में , पर जब तक रहो जलो /

                                   - एस . एन . शुक्ल 

Friday, August 17, 2012

(163) ये दुनिया दीवानी होगी

जड़ी शीशे में जो तस्वीर पुरानी होगी  /
नयी तामीर तुझे खुद से करानी  होगी  /

आइना  सिर्फ  दिखाता  है  बाहरी  सूरत  ,
क्या वो तस्वीर , किसी रूह की मानी होगी ?

शराब सी ये ज़िंदगी है , बहकना न कहीं  ,
आग में आग  और पानी में पानी होगी  /

ज़िंदगी रोज नए रंग बदलती है खुद  ,
ज़िंदगी है , तो नयी रोज कहानी होगी /

गुमान कर न अपने हुस्न , रंग -ओ -खुशबू का ,
ये  जो  तसवीर  नयी  है  ,  तो  पुरानी  होगी  /

कुछ ऐसा कर के गुज़र , लोग वाह - वाह कहें  ,
तुम्हारे  नाम  की  , ये  दुनिया  दीवानी  होगी /

                              - एस . एन . शुक्ल 

Sunday, August 12, 2012

(162) मुकद्दर का गिला क्या


राहे -गुनाह चल के , बता  तुझको  मिला क्या  ,
छलनी में गाय दुह के ,मुकद्दर का गिला क्या ?

इंसान  होके  कर  रहा , इंसानियत  का  खूं  ,
अन्दर के तेरे आदमी का , दिल न हिला क्या ?

जितना है , उससे और भी ज्यादा की आरजू ,
इंसान  की  हवस की ,  यहाँ  कोई  हद नहीं ,

इस  चंद - रोजा  ज़िंदगी  के  वास्ते  फरेब ,
दुनिया का किया तूने फतह , कोई किला क्या ?

हर दिल  में  है  निशातो - मसर्रत  की  तश्नगी ,
ता ना -ए- खुदसरी से , कोई गुल भी खिला क्या ?

                                        - एस . एन .शुक्ल

निशातो -मसर्रत = हर्ष और आनंद
तश्नगी = प्यास
ता ना - ए - खुदसरी = उद्दंडता 

Thursday, August 9, 2012

(161) आदमी से डर

जो आसमान पे है उस खुदा का खौफ क्या ,
खुद को खुदा समझने वाले आदमी से डर  /

गैरों में कमी खोज रहा , खुद से बेखबर ,
नासेह तू नहीं है , खुद अपनी कमी से डर /

दोजख - बहिश्त दोनों , तखैयुल की चीज हैं ,
तू जिस जमी की गोद में है , उस जमी से  डर /

हिटलर , मुसोलिनी -ओ - सिकंदर चले गए ,
शाह -ए - जहान तू भी नहीं , परचमी से डर /

मत कर गुरूर ऐसा ज़माल -ओ -ज़लाल पर ,
किसका गुमां रहा है , इसलिए हमीं से डर /
                               - एस . एन . शुक्ल

नासेह = उपदेशक
तखैयुल = कल्पना
परचमी = पताका फहराना
हमी = अहंकार 

Wednesday, August 1, 2012

(160) बशर नाकामियों को जब मुकद्दर मान लेता है

जो मेहनत और हिकमत को ,  इबादत मान लेता है  /
उसे मिलता है वह सब कुछ , जो चाहत ठान लेता है  /

तवंगर  भी  कदमबोशी  को  तब  मज़बूर  होता  है  ,
वो फाकेमस्त ! जिस दम अपनी ताकत जान लेता है /

बदल जाती हैं हाथों  की  लकीरें , और  किश्मत भी ,
बशर जब जीतने की जिद , को मन में ठान लेता है /

मचलता दिल , मगर फिर भी वो बच्चा जिद नहीं करता ,
जो  अपने  बाप  की ,  माली  हकीकत  जान  लेता  है  /

ठहर जाती हैं सारी सलवटें मौजों की बस उस दम ,
समंदर जिस समय , सोने को चादर तान लेता है  /

खुदा भी चाहकर , उसके लिए कुछ कर नहीं सकता ,
बशर  नाकामियों  को  जब  मुकद्दर  मान  लेता  है  /

                                  - एस. एन. शुक्ल 

Tuesday, July 31, 2012

प्रिय महोदय
                                    "श्रम साधना "स्मारिका के सफल प्रकाशन के बाद
                                                      हम ला रहे हैं .....
 स्वाधीनता के पैंसठ वर्ष और भारतीय संसद के छः दशकों की गति -प्रगति , उत्कर्ष -पराभव, गुण -दोष , लाभ -हानि और सुधार के उपायों पर आधारित सम्पूर्ण विवेचन, विश्लेषण   अर्थात ...

                                               " दस्तावेज "

जिसमें स्वतन्त्रता संग्राम के वीर शहीदों की स्मृति एवं संघर्ष गाथाओं , विजय के सोल्लास और विभाजन की पीड़ा के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र की यात्रा कथा , उपलब्धियों , विसंगतियों ,राजनैतिक दुरागृह , विरोधाभाष , दागियों -बागियों का राजनीति में बढ़ता वर्चस्व , अवसरवादी दांव - पेच तथा गठजोड़ के  दुष्परिणामों , व्यवस्थागत दोषों , लोकतंत्र के सजग प्रहरियों के सदप्रयासों , ज्वलंत मुद्दों तथा समस्याओं के निराकरण एवं सुधारात्मक उपायों सहित वह समस्त विषय सामग्री समाहित करने का प्रयास किया जाएगा , जिसकी कि इस प्रकार के दस्तावेज में अपेक्षा की जा सकती है /
     इस दस्तावेज में देश भर के चर्तित राजनेताओं ,ख्यातिनामा लेखकों, विद्वानों के लेख आमंत्रित किये गए है / स्मारिका का आकार ए -फोर  (11गुणे 9 इंच ) होगा तथा प्रष्टों की संख्या 600 के आस-पास  / इस अप्रतिम, अभिनव अभियान के साझीदार आप भी हो सकते हैं  / विषयानुकूल लेख, रचनाएँ भेजें तथा साथ में प्रकाशन अनुमति , अपना पूरा पता एवं चित्र भी / विषय सामग्री केवल हिन्दी , उर्दू  अंगरेजी भाषा में ही स्वीकार की जायेगी / लेख हमें हर हालत में 10 सितम्बर 2012 तक प्राप्त हो जाने चाहिए ताकि उन्हें यथोचित स्थान दिया जा सके /
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Thursday, July 26, 2012

(159) राह बनाते रहिये

               राह बनाते रहिये


या ढलें वक़्त के सांचों में, हवा संग बहिये  /
या लड़ें वक़्त से  , इतिहास  रचाते  रहिये  /

या चलें देख किसी और के पैरों के निशाँ  ,
या निशाँ वक़्त के , सीने पे बनाते रहिये  /

या जियें खुद के लिए , खुद की परस्ती के लिए ,
या  जियें  सबके  लिए  ,  प्यार  लुटाते  रहिये  /

या रहें तन के खड़े , खुश्क पहाड़ों की तरह  ,
या बहें बर्फ सा गल ,  प्यास बुझाते रहिये  /


हर कोई  तुमको  सराहे , ये  ज़रूरी  तो  नहीं  ,
सबकी सुनिए भी , मगर अपनी चलाते रहिये /

फैसला सोच-समझकर लें , न पछताना फिर ,
जियें गुमनाम ,  या कि  नाम कमाते रहिये  /

                             
या रहें रोते मुकद्दर को , हाथ रख सिर पे  ,
या चलें  राह  नयी ,  राह  बनाते  रहिये  /
     
                            - एस . एन . शुक्ल

Sunday, July 22, 2012

(158) ज़रूरी तो नहीं

              

पकड़ के बाहँ चलूँ मैं , ये ज़रूरी  तो नहीं  /
पुरानी  राह चलूँ  मैं ,  ये ज़रूरी  तो नहीं  /

तुम्हें जो ठीक लगे , शौक से करते रहिये ,
वही गुनाह करूँ  मैं , ये ज़रूरी  तो नहीं  /

जो गुनहगार हैं , उनको सज़ा मिले तो मिले ,
बे-वजह आह  भरूँ  मैं , ये  ज़रूरी  तो नहीं  /

बहुत से लोग , सिर झुका के चल रहे हैं यहाँ ,
उनका हमराह बनूँ  मैं , ये  ज़रूरी तो नहीं  /

ये है मुमकिन , कि नयी राह में हों पेच-ओ-ख़म ,
खुद को  गुमराह  कहूँ  मैं ,  ये ज़रूरी तो  नहीं  /

ज़िंदगी मेरी है  , अपनी तरह जिया हूँ  मैं  ,
सबकी परवाह  करूँ मैं , ये ज़रूरी तो नहीं  /

                              - एस .एन .शुक्ल


Friday, July 13, 2012

(157) अज़नबी से शहर


               अज़नबी से शहर

इस चकाचौंध में , मतलबी हर नज़र  /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

धर्म-ओ -मजहब वहां , जातियां हैं मगर ,
रिश्ते - नातों की भी , थातियाँ  हैं  मगर ,
पर शहर में किसे , कौन , कब  पूछता  ,
मरने - जीने से  भी , लोग  हैं  बेखबर   /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

दौड़ती  -  भागती   जिन्दगी  है  यहाँ ,
रात-ओ-दिन जागती जिन्दगी है यहाँ ,
काम है ,  दाम है ,  काम ही काम है  ,
काम में मुब्तिला शख्स आठों पहर  /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

ये शहर क्या है , बस  एक  बाज़ार है ,
रिश्ते- नातों में भी दिखता व्यापार है ,
कौन, कब, कैसे , किसकी गिरह काट ले ,
हर कोई खोजता है यहाँ  माल-ओ- जर  /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

कितने सम्पन्न , साधन भरे हों नगर ,
आश्रिता आज भी उनकी है गावों पर ,
गाँव   संसाधनों  से  परे  ही  सही ,
किन्तु फिर भी हैं वे अन्नदाता के घर /
गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /

                            - एस . एन . शुक्ल