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Editor "LAUHSTAMBH" Published form NCR.

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Wednesday, June 27, 2012

(155) सभी बेपर्द कर डालो

  शकर कैसे भला छोड़ेगी पीछा , और क्यों छोड़े ,
  तुम्हीं थे जिसने कैथे और जामुन काट डाले हैं  /

 तुम्हीं कहते ज़हर फैला है चारों ओर नफ़रत का ,
 तुम्हीं  ने  आस्तीनों  में , विषैले  नाग  पाले  हैं  /

  लबारों और मक्कारों को , कितनी बार परखोगे ,
  ये तन से खूब उजले हैं , मगर अंदर  से काले हैं /

  वो छत्तीस लाख के सन्डास में , पेशाब करते हैं ,
  यहाँ छब्बीस रुपये रोज की आमद भी लाले हैं  /

  ज़बानें  लपलपाते  भेड़िये  हैं ,  ये  दरिंदे   हैं ,
  ये आदमखोर हैं , मज़लूम ही इनके निवाले हैं /

  उठाओ आँधियाँ , अब और रस्ता भी नहीं कोई ,
  सभी बेपर्द कर डालो , जो शैतानों की चाले हैं  /

                                     - एस . एन . शुक्ल 

Sunday, June 24, 2012

(154) वक्त का मारा समझता है

           वक्त का मारा समझता है


कोई नादां , कोई दाना , कोई प्यारा  समझता है ,
कोई भटका हुआ कहता है , आवारा समझता है  /

मेहरबां वक्त हो जिस पर , वो क्या समझे , वो क्या जाने ,
है  कैसा  वक्त  होता  ,  वक्त  का  मारा  समझता  है  /

नज़र का फेर है , जिस आँख पर जैसा लगा चश्मा  ,
उजाले  को  अंधेरा , चाँद  को  तारा  समझता  है  /

ये आदत  में  नहीं  है , इसलिए  निकले  नहीं  आँसू  ,
मगर कितनी तपिश है , दिल का अंगारा समझता है /

वो कहते हैं , कि  उनको नीद ही आती नहीं शब् भर ,
है मतलब नीद का क्या , यह थका - हारा समझता है /

जिसे होता है मतलब , सिर्फ अपनी खुदपरस्ती से ,
वो हर इन्सान को -  इन्सां नहीं , चारा समझता है  /

मुबारक हो तुम्हें दुनिया तुम्हारी , तंग दिल वालों ,
ये बंजारा तो ,  अपना  ही जहां  सारा समझता है  /

                                     - एस.एन. शुक्ल 

Sunday, June 17, 2012

(153) उगालदान है यारों





 ये ऐसा मुल्क है , हर शख्श जुल्म सहकर भी ,
ज़ुबान   होते   हुए  ,  बेजुबान   है   यारों   /

मस्जिदों , मंदिरों , गिरिजाघरों , गुरुद्वारों में ,
सभी की अपनी , मजहबी दुकान  है यारों  /

आदमी ही यहाँ , बिकता - खरीदा जाता है ,
ये अपने मुल्क का , सियासतान है यारों  /

इतने फिरके , कि इन्हें गिन नहीं सकता कोई ,
और  दावा  ये ,  एकता  की  शान  हैं  यारों  /

भीड़ है , मेले हैं , रेले हैं , रैलियाँ हैं मगर ,
ढूँढता हूँ  ,  कहाँ  हिन्दोस्तान  है  यारों  /

ये सौ करोड़ से ज्यादा हैं , मगर भेड़ों से ,
इसलिए ! हुक्मरान , बेईमान हैं यारों  /

कहीं भी कुछ भी करो , गालियाँ दो , उगलो ज़हर ,
मुल्क  है   या कि  ये  ,  उगालदान  है  यारों  /

                                -एस.एन. शुक्ल
किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से लगभग डेढ़ माह तक स्रजन बाधित रहा , पुनः आप मित्रों का स्नेह पाने के लिए उपस्थित हूँ / आशा है हमारे मित्र हमें क्षमा करेंगे /

Tuesday, May 29, 2012

रवि शंकर उपाध्याय

                         1

कौन  जश्न मनाये भारत की आजादी का,
गरीब मातम मना रहा है अपनी बर्बादी का/

रोंकता नहीं है कोई दंगे फसाद की आंधी को,
सुख चैन लुटता जा रहा है भारत की आबादी का/

जान की की कीमत कुछ भी नहीं है जालिमों के पास,
ऐसे ही क़त्ल किया था भारत की शहजादी का/

चेहरे पर कुछ और दिल में कुछ और है,
जनता को बस लूट रहे हैं, कपड़ा पहनकर खादी का/

ऐश-ओ-आराम से रहने वालों कभी देखो आकर,
है आज गरीब नंगा और भूंखा भारत की वादी का/

एस देश में देश द्रोहियों की कमी नहीं है रवी,
सबके चेहरें छुपे हैं नाम बदनाम है आतंकवादी का/


                              2

खून से खिलती है होली  आज हिन्दुस्तान में,
खून से छपकर है निकला अखबार हिन्दुस्तान में/

खून का प्यासा है खंजर जल रही हैं बस्तियां,
बच्चा बच्चा सो रहा है आज हिन्दुस्तान में/

बह रहा है नालियों में आज लोंगों का लहू,
खून पानी बन गया है आज़ाद हिन्दुस्तान में/

ऐ जालिमों हर खून करने से पहले सोच लो,
एक दिन तुम सबका होगा, खून हिन्दुस्तान में/

मैं रवि का नूर हूँ, ये सोचकर हैरान हूँ/
मर चुकी इंसानियत आज़ाद हिन्दुस्तान में/


                                                           रवि शंकर उपाध्याय 

Thursday, May 24, 2012

आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को ........


आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को,
​मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको/

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊबकर,
​मर गयी फुलिया बेचारी थी कुएँ में डूबकर/

है सधी सिर पर बिनौली कंडीयों की टोकरी,
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी/

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा,
मैं इसे कहता हूँ सरयू पार की मोनालिसा/

कैसी यह भयभीत है हिरनी सी घबरायी हुयी,
लग रही जैसे कली बेला कि कुम्भालाई हुयी/

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसे मौन है,
जानते हो इसकी खामोशी का कारण कौन है/

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को,
सो रही बूढी ओसारे में बिछाए खात को/

डूबती सूरज कि किरनें खेलती थीं रेत पर,
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से/

आ रही थी वह चली खोयी हुयी जज्बात में,
क्या पता उसको कि कोई भेंडिया है घात में/

होनी से बेखबर कृष्णा, बेखबर राहों में थी,
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाँहों में थी/

चीख निकली भी तो होंठो में ही घुटकर रह गयी,
छटपटाई पहले फिर ढीली पडी फिर ढह गयी/

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया,
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया/

और उस दिन ये हवेली हंस रही थी मौज में,
होश में आयी तो कृष्णा थी पिता की गोद में/

जुड़ गयी थी भीड़ जिसमें जोर था शैलाब था,
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था/

badh ke mangal ne kahaa , kaakaa too kaise maun hai .
poochh to betee se aakhir vo darindaa kaun hai .

कोई भी हो संघर्ष से हम पाँव मोडेंगे नहीं,
कच्चा खा जायेंगे जिन्दा उनको छोड़ेंगे नहीं/

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें,
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुंह काला करें/

बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से,
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से/

पड़ गयी इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में,
वे एकट्ठे हो गए थे सरपंच के दालान में/

द्रष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर,
देखिये सुखराज सिंह बोले हैं खैनी ठोंककर/

क्या कहें सरपंच भाई क्या जमाना आ गया,
कल तलक जो पांव के नीचे था रुतबा पा गया/

कहती है सरकार की आपस में मिलझूल कर रहो,
सूअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो/

देखिये ना यह जो कृष्णा है चमारों के यहाँ,
पढ़ गया है सीप का मोती गंवारों के यहाँ/

जैसे बरसाती नदी अल्हड नशे में चूर है,
हाँथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है/

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ,
फिर कोई बांहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ/

आज सरजू पर अपने श्याम से टकरा गयी,
जाने-अनजाने में लज्जत जिन्दगी की पा गयी/

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गयी,
वरना वह मरदूद बातों को कहने से रही/

जानते है आप मंगल एक ही मक्कार है,
हरखू उसकी शह पे थाणे जाने को तैयार है/

कल सुबह गर्दन अगर नपती है बेटे-बाप की,
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी/

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया,
हाँथ मूंछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था/

छडिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था,
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था/

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुरजोर था,
भोर होते ही वहां का द्रश्य बिलकुल और था/

सर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाँथ में,
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में/

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने,
जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आये सामने/

निकला मंगल झोपडी का पल्ला खोलकर,
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़कर/

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया,
सुन पडा वो माल फिर चोरी का तुने क्या किया/

कैसी चोरी माल कैसा उसने जैसे ही कहा,
एक लाठी फिर पडी बस होश फिर जाता रहा/

होश खोकर वह पडा था झोपडी के द्वार पर,
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर/

मेरा मुंह क्या देखते हो इसके मुंह में थूक दो,
आग लाओ और इसकी झोपडी को फूंक दो/

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी,
बेसहारा निर्बलों की झोपडी जलने लगी/

दूधमुहाँ बच्चा और बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था,
वह अभागा दीं हिंसक भीड़ के घेरे में था/

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे,
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे/

कह दो एन कुत्तों के पिल्लों से की इतराएँ नहीं,
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाएँ नहीं/

यह दरोगा जी थे मुंह से शब्द झरते फूल से,
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रुल से/

फिर दहाड़े इनको डंडों से सुधारा जाएगा,
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा/

एक सिपाही ने कहा साईकिल इधर को मोड़ दें,
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें/

बोला थानेदार मुर्गे की तरह मत बाग़ दो,
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो/

ये समझते हैं की ठाकुर से उलझना खेल है,
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है/

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अक्सर यह सवाल,
कैसा है कहिये न सरजू पर की कृष्णा का हाल/

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को,
साद रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को/

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को,
प्रांत के मंत्री गडों को केंद्र की सरकार को/

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ, आयें मेरे गाँव में,
तट पे नदियों के घनी अमराएयों की छाँव में/

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही है,
या अंहिंसा की जहां पर नथ उतारी जा रही है/

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए,
बेचती हैं जिस्म कितनी कृष्णा रोटी के लिए/

यह रचना सुप्रसिद्ध जनकवि अदम गोंडवी की है/ हमारी हार्दिक श्रृद्धांजलि




Sunday, May 6, 2012

(152) कुत्ते ही कुत्ते हैं ?

कुत्ते  ही  कुत्ते  हैं ,  कुत्तों  में  कुत्ते  हैं ,
कुत्तों के पिछलग्गू ,  कुत्तों के कुत्ते हैं 
कुत्तों सा भौंकते हैं , काटते हैं , नोचते हैं 
कुत्तों के  साथ - साथ  घूम  रहे  कुत्ते हैं  /

बंगलों में कुत्ते हैं , जंगलों में कुत्ते हैं ,
गोदियों में कुत्ते हैं , बगलों में कुत्ते हैं ,
आदमी का बच्चा है आया के भरोसे पर ,
मालकिन की गोदी में दुलराते कुत्ते हैं /
अक्सर ये बच्चे ही , बड़े हो - समर्थ होकर ,
अपने माँ - बाप को समझते हैं , कुत्ते हैं /
कुत्ते ही कुत्ते हैं---------------------

गाड़ियों  में  कुत्ते   हैं , सोफों  में  कुत्ते  हैं ,
बिस्तर पर , मसनद पर , साड़ियों में कुत्ते है,
रोटी का निवाला जहां मुश्किल आम आदमी को ,
मिल्ककेक  , बिस्किट , मलाई खाते कुत्ते है ,
कुत्तों की जिन्दगी से आदमी गया - बीता ,
मखमली  बिछौनों  में  इठलाते  कुत्ते  हैं  /
कुत्ते ही कुत्ते हैं----------------------

कुत्ते बुलडाग जैसे , पिद्दी से , बौने से ,
शेर जैसे , भालुओं से , कुत्ते खिलौने से,
दमवाले , पुछकटे, कबरे से , झबरे से ,
बिना बाल वाले तो शेरनी के छौने से ,
आवारा , घुरचट्टे, किनहे से , घिनहे से ,
गाँव , गली , नगर- नगर मंडराते कुत्ते हैं /
कुत्ते ही कुत्ते हैं---------------------

कुत्तों की श्रेणियां हैं , गाँव , गली ,शहर वाले ,
हड्डियों पर लड़ते , कुछ गद्दियों पर लड़ते हैं ,
दूम  को हिलाते हैं , चूमते हैं पावों को ,
अपने दरवाजों पर भौंकते , अकड़ते हैं ,
कुत्ता है जानवर , यदि खाता तो निभाता भी है ,
लेकिन कुछ खाकर भी गुर्राते कुत्ते हैं  /
कुत्ते ही कुत्ते हैं--------------------

कोठियों के , बंगलों के मुख्यद्वार फाटक पर -
धनिकों का दूर से ही दीखता है स्वाभिमान ,
बड़े - बड़े हर्फों में , बड़े ही करीने से -
प्रायः लिखा रहता है " कुत्तों से सावधान "
ऐसे आवासों को देख क्या नहीं लगता -
जैसे इन भवनों में , आदमी नहीं , कुत्ते हैं ?
कुत्ते ही कुत्ते हैं---------------------

कहते हैं , बहन के घर भाई कुत्ता है ,
और ससुराल में जमाई , तो कुत्ता है ,
बड़ा वाला कुत्ता जो बेटी का खाय बाप ,
भाई का अंश मारे भाई , तो कुत्ता है ,
सोचो फिर , जो सारा देश नोच खा रहे हैं -
दुनिया में उनसे भी बड़े कोई कुत्ते है ?
कुत्ते ही कुत्ते हैं---------------------

                         - एस. एन . शुक्ल 



 

Wednesday, May 2, 2012

(151) अब हमें आइने चिढ़ाते हैं

                                             पहले चिढ़ते  थे आइने हमसे ,
                                             अब  हमें   आइने  चिढ़ाते  हैं  /
                                             वक्त जब साथ न हो तो अक्सर ,
                                             लोग , मौसम से बदल जाते हैं /

                                            सुर्खरू  थे ,   हमारे  भी  लबों  पे  लाली  थी ,
                                            हमारे जिश्म की हालत भी खासी माली थी ,
                                            अब वो रौनक कहाँ , दिलवर कहाँ , दिलदार कहाँ ,
                                            सामने पड़ते हैं , कतरा के निकल जाते हैं  /
                                            अब हमें आइने चिढ़ाते हैं /

                                           वक्त अपना था तो , खुद में गुरूर  थे  हम  भी ,
                                            न जाने कितनी ही , आँखों के नूर थे हम भी ,
                                            जो बजाते थे , तालियाँ हमारी बातों पर ,
                                            अब हमें देखकर , वो तालियाँ बजाते हैं /
                                            अब हमें आइने चिढ़ाते हैं /

                                           नूर हर शै का , वक्त  आने पे ढल जाता है ,
                                           वक्त के साथ  , ज़माना भी बदल जाता है ,
                                            खुश्क डालों  पे , परिंदे भी कहाँ टिकते हैं ?
                                            खंडहरों में चिराग ,  कब जलाए जाते  हैं ?
                                            अब हमें आइने चिढ़ाते हैं/

                                                                           - एस. एन. शुक्ल 

Thursday, April 19, 2012

(150) निभा लेते हैं /

दिल के जख्मों को तबस्सुम से छुपा लेते हैं  /
ज़िंदगी  जीते  हैं  ,  कैसे  भी  निभा  लेते  हैं /

टूटते  ख़्वाब  ,  तो  होता है  दर्द  हमको  भी  ,
हम तो किरचों को भी , पलकों पे उठा लेते हैं /

हम मगर वो भी नहीं , हाँ में हाँ मिलाते रहें ,
हर एक दर पे , जो सिर अपना झुका लेते हैं  /

तपिश के  डर  से , छाँव खोजते होंगे कोई ,
हम तपिश हो भी तो , शोलों को हवा देते हैं /

सरे - कोहसार  से ,  लाते उतार हैं  दरिया  , 
ठान लें गर ,  तो समंदर को सुखा देते  हैं  /

लोग डरते हैं , हवाओं के जोर से ,  पर हम 
आँधियाँ  आयें तो ,  दीवार गिरा  देते  हैं  /

                              - एस. एन. शुक्ल

 

Friday, April 13, 2012

(149) लौटि चलौ गाँउ ककुआ

हियाँ लागै न मनवा हमार ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
दिनु  बीतति  मनौ  पहारु ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /

डगमगु  चालु हियाँ , बात गिटपिटिया ,
कान फोरू शोरु मचे , चलें फिटफिटिया ,
हुआं शान्ति औ सुख की बयारि ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
हियाँ  लागै  न  मनवा  हमार ,  लौटि चलौ गाँउ  ककुआ /

पानिहू बिकाल हियाँ , काँच के गिलसवा ,
सोनवा के भाऊ भवा ,  ऊख  केर रसवा , 
हुआं मुफ़त मां लुटब बहार , लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
हियाँ लागै न मनवा हमार  , लौटि चलौ गाँउ ककुआ /

दुधवा के नाम पई बिकाल हियाँ पनिया ,
गोदिया के लाल पलें पूपसी की कनिया ,
हुआं दूध- दही की भरमार  ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
हियाँ लागै न मनवा हमार , लौटि चलौ गाँउ ककुआ /

छोरिहू  शहर  केरी , मेम  कै मेमनिया ,
बिटिया देहाति मानउ देबी महरनिया ,
हुआं सरगु  लगे  घरु- बारू , लौटि चलौ गाँउ ककुआ /
हियाँ लागै न मनवा हमार ,  लौटि चलौ गाँउ ककुआ /

                                         - एस. एन. शुक्ल  

Sunday, April 8, 2012

(148) ज़रा - ज़रा सा बढ़ो

ज़रा - ज़रा सा  जगो  तुम, ज़रा सा हम भी जगें ,
नयी  शमाएँ     रोशनी   की  ,  जलाई     जाएँ /

धर्म-ओ- मज़हब  के फासलों की दीवारों को गिरा ,
राह - ए - मिल्लत  नयी  तामीर  कराई  जाएँ /

नफरतें बो के सियासत हमें लड़ाती रही ,
पढ़े - बढ़े  तो मगर दूरियाँ  बढाती  रही  ,

कौम इनसान की कौमों के नाम पर तकसीम ,
भट्ठियां  नफरतों  की ,  आओ बुझाई  जाएँ / 

ज़रा - ज़रा सा बढ़ो तुम , ज़रा सा हम भी बढ़ें ,
ये  दूरियाँ  तमाम ,  मिल  के  मिटाई  जाएँ /

                                    - एस. एन. शुक्ल

Thursday, April 5, 2012

(147) ज़िंदगी इम्तिहान है यारों

ज़िंदगी रोज नया  इम्तिहान  है  यारों /
कभी जमीं तो कभी आसमान है यारों /

कभी हंसाती , कभी बारहा रुलाती है  ,
ज़िंदगी रूह का अदना मकाम है यारों /

कभी ये बजती है सरगम में, सात सुर में कभी ,
मगर  कभी  ,  ये  बेसुरी  सी  तान  है  यारों  /

ज़िंदगी तल्खियों भरी हो , फिर भी जीना है ,
अज़ीज़   जान  से  ज्यादा  , ये जान है यारों  /

ज़िंदगी तेरे बिना , कोई नियामत भी नहीं  ,
ज़िंदगी है ,  तो ये  सारा  जहान  है  यारों  /

                                  - एस. एन. शुक्ल 

Sunday, April 1, 2012

(146) उपचार क्या है ?

सोचिये कर्त्तव्य क्या है , और फिर अधिकार क्या है /
सोचिये  अन्याय , अत्याचार का  परिहार  क्या  है /
बहुत वातावरण  दूषित  है ,  न कहने  से  चलेगा  ,
सोचिये इस व्याधि , बाधा वृत्त का उपचार क्या है ?

मात्र आलोचक बने रहने से  कुछ होना नहीं  है /
याद रखना , और अब आगे विवश रोना नहीं है /
बस लुटेरों से सजग रहना व लड़ना वृत्त बनाओ ,
देश पर संकट हो तो , मुह ढाँपकर सोना नहीं है /

मात्र  अपने  ही लिए  जीना , नहीं जीना  है यारों /
चैन भारत का ,  दरिंदों  ने बहुत  छीना है  यारों  /
इसलिए अन्याय के प्रतिकार का संकल्प लो फिर ,
गरल का अब एक कतरा , भी नहीं पीना है यारों /

तुम बदल सकते हो सारा देश क्या , यह विश्व सारा /
भारती  के  लाल  जागो , विश्व  को  तुम  से सहारा /
जगदगुरु भारत, की संतति हो , स्वयं की शक्ति जानो ,
हे भगीरथ ! पलट दो ,  बहती हुई विपरीत धारा  /
                                       - एस. एन . शुक्ल 

Tuesday, March 27, 2012

(145) हिन्दोस्तान अपना है /

कहीं हो आग ,  जलायेगी उसकी फितरत  है,
कभी किसी का जले घर, मकान अपना  है  /

जो मरा हिन्दू, मुसलमाँ , ईसाई , सिख वो नहीं,
ज़रा  सा  गौर से  देखो , वो  कोई  अपना  है  /

मुल्क को बाँट सियासत में, कौम-ओ- फिरकों में ,
किसी  सुकून की  ख्वाहिश , ये महज  सपना है  /

नफरतें बोना- उगाना , ये बात ठीक नहीं ,
ओ नेकबख्त , ये सारा ज़हान अपना है  /

अपनी हरकत से झुके सिर न सरज़मीं का कहीं ,
ये देश अपना है , शान - ओ - गुमान  अपना है  /

वो लूट कैसी , कहीं भी , किसी के साथ सही  ,
जो लुट रहा है , वो हिन्दोस्तान  अपना है  /

                                  - एस. एन. शुक्ल 

Thursday, March 22, 2012

(144) निभाता रहा हूँ मैं /

हंसकर हर एक गम को भुलाता रहा हूँ मैं  /
ऐ  ज़िंदगी ! तुझे  यूँ   निभाता  रहा हूँ  मैं  /

औरों को न हो मेरे किसी दर्द का एहसास ,
यह सोच , अपने ज़ख्म छुपाता रहा हूँ मैं  /

खुशियाँ भी बाटने में हिचकते हैं जबकि लोग,
तब  दर्द   दूसरों   का  ,  बटाता  रहा  हूँ  मैं  /

लोगों को गिले हैं , कि मैंने कुछ नहीं किया ,
कन्धों पे  हिमाला को , उठाता  रहा हूँ  मैं  /

खुशियों के पल भले ही कम हों , उनको याद कर ,
अपना  हर  एक  दर्द  ,  भुलाता  रहा हूँ  मैं  /

खंजर  मेरे सीने  में , धँसे  हैं अज़ीज़  के ,
जब दुश्मनों से खुद को, बचाता रहा हूँ मैं /

अनजाने दे सका न कोई एक भी खरोच ,
साँपों को खुद ही दूध पिलाता रहा हूँ मैं  /

                                - एस. एन. शुक्ल 

 

Friday, March 16, 2012

(143) मुक्तक -2

                                           (१)
असंभव बच निकलना हो , तो डटकर सामना करिए /
समय प्रतिकूल हो तो भी , विजय की  कामना करिए /
ये  बाधाएं ,  विषमताएं ,    परीक्षाएं   हैं  जीवन  की ,
इन्हें उत्तीर्ण  करने  के लिए , श्रम - साधना  करिए /
                                         (२)
बहुत  से  लोग , अक्सर  डूब जाते हैं किनारे पर ,
वो हैं , वे लोग , जो  रहते  हैं औरों  के सहारे पर  ,
जो करते हैं भरोसा  खुद  का , जो  खुद्दार होते हैं ,
बदल जातीं परिस्थितियाँ भी हैं , उनके इशारे पर /
                                      (३)
जरूरी है कि  गैरों  में भी ,  कोई  आत्मजन  खोजें ,
जहाँ मूर्खों का जमघट हो , वहाँ भी ज्ञान-धन खोजें ,
नहीं होता  कोई  अपना ,  कोई  दुश्मन  नहीं होता ,
कहाँ , क्या चूक खुद से हो रही, अपना भी मन खोजें /
                                    (४)
सफलता का कभी मापक , जुटाना धन नहीं होता ,
वही है दीन सबसे , स्वच्छ जिसका मन नहीं  होता ,
धरा, धन, धाम,संसाधन , यहाँ अब तो वहाँ कल हैं ,
कभी धन से  सुयश  या  कीर्ति स्थापन नहीं होता  /
                                   (५)
जरूरी धन मगर उतना , जो मद से  भर  न दे मन को ,
सुलभ उतने हों  संसाधन ,  जरूरी  हैं  जो  जीवन  को ,
अगर धन है प्रचुर , लेकिन नहीं सुख - शान्ति जीवन की ,
तो उससे सौ गुना ,  खुशहाल समझो  दीन - निर्धन को /
                                               - एस.एन.शुक्ल
 

Tuesday, March 6, 2012

(142) रंगों के पर्व रंगारंग कर दे

रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /
खुशी से अंग हर प्रत्यंग भर दे /
उमंगों के बाहें निर्झर धरा पर  ,
आज तू तर- बतर हर अंग कर दे /
रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /

रंगों का अर्थ ही  होता  है  खुशियाँ ,
रंगों के मध्य ही बसती हैं खुशियाँ ,
ये खुशियाँ जायँ बन सच्चाइयाँ अब ,
तू अपने रंग में वह रंग भर दे /
रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /

बजाती तू मिलन का साज होली ,
तू है, पर्वों के सिर का ताज  होली ,
दूरियाँ जायँ मिट मानव मनों की ,
तू कुछ इस बार ऐसा  ढंग कर दे /
रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /

तू आती और बस जाती चली है ,
खिलाती प्रेम की आकर कली है ,
ठहर जा , आके तू  इस बार शुभगे ,
होलिके ! रूढ़ियों को भंग कर दे /
रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /
                  -  एस. एन. शुक्ल 





Friday, March 2, 2012

(141) प्यासा रहा हूँ मैं /

नदी की धार में  बहते  हुए ,  प्यासा  रहा  हूँ  मैं ,
कभी पूरी न हो पाई , वो  अभिलाषा  रहा हूँ  मैं ,
मैं सारी जिन्दगी ऐसे जिया, जैसे खुली पुस्तक ,
समझ पाया जिसे कोई न , वह भाषा रहा हूँ मैं  /

मैं कतरा हूँ,  समंदर की  निगहबानी में रहता  हूँ ,
मैं लहरों में, तरंगों में ,  उछलता  और  बहता  हूँ  ,
मैं इस दुनिया से बाहर, दूसरी दुनिया से डरता था ,
उसी का फल, मैं सारी ज्यादती चुपचाप सहता हूँ /

ये माना , आज कतरे से , समंदर हो चुका हूँ मैं ,
मगर होकर समंदर भी, स्वयं को खो चुका हूँ मैं ,
समंदर रोज बढ़ता जा रहा है इसलिए,  क्योंकर ,
बहाता आँसुओं की धार ,  इतना रो चुका हूँ  मैं  /

जो खुद  के  वास्ते जीते  हैं , जो  खुदगर्ज़ होते  हैं ,
वे  अपने  हाथ  अपनी  जिन्दगी में , खार बोते  हैं ,
मैं अपनी आपबीती से , महज इतना समझ पाया ,
वे अक्सर ठोकरें खाते हैं,  अक्सर अश्क  पीते  हैं  /

                                        - एस. एन. शुक्ल 

Friday, February 24, 2012

(140) हे भरत, भारत उठो !

तुम भागीरथ हो जो लाये,  देव सरिता को धरा पर ,
भीष्म ! गंगा पुत्र हो तुम , मृत्यु भी जिसके रही कर ,
तुम वही, जिसने जलधि को अंजुली में भर पीया था ,
और तुम हनुमंत हो , भयभीत जिससे था दिवाकर /

तुम भरत हो , सिंह के जबड़ों में गिनते दाँत हो तुम ,
शेष के अवतार,  हे सौमित्र  !  रघुपति भ्रात हो तुम , 
कृष्ण हो तुम,  तर्जनी पर तुम उठा लेते हो गिरिवर ,
शिवि हो तुम , पर प्राण रक्षा , दान करते गात हो तुम /

तुम हो प्रलयंकर , विनाशक सृष्टि रखते दृष्टि हो तुम ,
तुम हो विश्वामित्र , रच सकते नयी फिर सृष्टि हो तुम,
तुम हलाहल पान कर सकते हो ,  सारे विश्व भर का ,
और कर सकते अमिय की, सृष्टि हित में वृष्टि हो तुम /

तुम हो पाणिनि , विश्व गणना के दिए सिद्धांत तुमने ,
और जग को ,  उच्च  आदर्शक  दिए  दृष्टांत  तुमने ,
तुम महात्मा बुद्ध हो , चाणक्य हो , चार्वाक हो तुम ,
नीति क्या, अनरीति समझाया ये आद्योपांत तुमने /

मार्गदर्शक विश्व के तुम थे, विभव- वैभव को जानो ,
क्यों विवश से हो खड़े ,  फिर शब्दवेधी  तीर तानो ,
हे जगद्गुरु ! विश्व  को  नेतृत्व  तेरा  चाहिए  फिर ,
हे भरत , भारत उठो , सामर्थ्य अपनी शक्ति जानो /
                                       - एस.एन शुक्ल

Sunday, February 19, 2012

{139} रुबाइयाँ

                                             (१)
                     खुद अपने आप से कैंची  को कतरते देखा ,
                     आग को बहते हुए ,  आब को जमते  देखा ,
                      अक्ल की बातें जो समझाते रहे दुनिया को ,
                      गैरत- ए- गार में  उनको भी उतरते  देखा /

                                            (२)
                      हमने  काँटों  को सरे आम  सिसकते  देखा ,
                      संग- ए- दिल छोड़िये पत्थर को पिघलते देखा,
                      वो जो दुनिया को हँसाते थे अपनी बातों से ,
                      उनको तनहाइयों में छुप के सुबकते देखा /

                                            (३)
                     खुदा  की  राह  , गुनाहों को  उभरते  देखा ,
                     रंग गिरगिट सा, आदमी को बदलते देखा ,
                      लोग कहते हैं कि अल्लाह से डरिए लेकिन ,
                      मैंने  इन्सान को, इन्सान से डरते देखा /

                                            (४)
                    बुतों को पुजते , आदमी को तड़पते देखा ,
                    गुनाह फलते , बेगुनाह  को फँसते  देखा ,
                    अज़ीब हाल है , इन्सान की इस दुनिया का ,
                     बादलों को भी  , समंदर  में बरसते देखा /

                                         (५)
                   ज़लाल-ओ-जलवा , हर किसी का उतरते देखा,
                    सरे-कोहसार  को  भी ,  टूट  के  गिरते देखा ,
                   ज़मीन पर हैं जो, उनकी भला बिसात कहाँ,
                    मैंने हर शाम, आफ़ताब  को ढलते  देखा /
              
                                              - एस. एन. शुक्ल


                             

Wednesday, February 15, 2012

(138) इन्सान कहाँ है ?

हिन्दू , ईसाई , सिख है , मुसलमान  यहाँ  है,
मैं  खोजता   रहा  हूँ  कि   इन्सान  कहाँ  है ?

मज़हब हैं , जातियाँ हैं, जातियों में जातियाँ,
इन जातियों में  आपकी  पहचान  कहाँ है ?

मंदिर  में वो कुछ और है , मस्जिद में कोई और ,
गुरुद्वारे ,  चर्च  और  है  ,  भगवान  कहाँ  है ?

पत्थर  तो  पुज  रहे हैं , आदमी  तड़प  रहा ,
इन्सान की इस कौम  का  ईमान  कहाँ  है ?

लीडर  बहुत  हैं , और बहुत  से  सियासी  दल,
हर चूल्हा अलग हांडी अलग किश्म के चावल,

बाजीगरों का खेल , सबकी अपनी डुगडुगी ,
इस डुगडुगी  में  एकता  की  तान  कहाँ है ?

सूबे के नाम पर, कहीं मज़हब के नाम पर ,
रुतबे,  रसूख  और  सियासत के नाम पर ,

नफ़रत की क्यारियाँ हैं , क्यारियों में नफरतें ,
वो देश पे  मिटने की ,  आन- बान कहाँ  है ?
                                - एस.एन . शुक्ल