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Tuesday, November 29, 2011

(122) मंजिल तलाशते रहे ....

मंजिल तलाशते रहे , परछाइयों के साथ  /
उगते रहे बबूल भी  ,  अमराइयों के साथ  /

सीने पे  ज़ख्म  खा के भी ,  खामोश  है कोई ,
अब गम मना रहे हैं वो , शहनाइयों के साथ  /

तब छाँव की तलाश में , दर- दर भटक रहे ,
जब शायबान उड़ गए  , पुरवाइयों के साथ  /

चाहत की बात का न तकाजा वो अब रहा  ,
हैं ख्वाहिशें दफ़न यहाँ , गहराइयों के साथ /

ताजिस्त वस्ल- ए - यार मयस्सर न हो सका ,
यह ज़िंदगी गुजर गई ,  तनहाइयों  के  साथ  /

Sunday, November 27, 2011

(121) दास्तां बदलो

अन्धेरा घिर न आये दोस्तों, बुझती शमां बदलो /
चमन गुलज़ार कर पाए न , ऐसा बागवाँ बदलो  /

 दिलों  में जल रही है आग ,   कैसी कसमसाहट  है,
ज़माना , चाहता कुछ कर गुजरना है , समां बदलो /

न ज्यादा आजमाने की , ज़रुरत रह गई  इनको ,
गुज़र जाएँ न लमहे , वक़्त रहते राजदां  बदलो  /

तसल्ली कब  तलक होगी भला झूठे दिलासों से ,
अगर बरसें न ये बादल , तो सारा आसमां बदलो /

दिया तब पीठ पर खंजर, इन्हें जब भी मिला मौक़ा ,
लुटेरे  काफिले  का   साथ  छोडो  , कारवां बदलो  /

ये इस्पाती घड़े हैं  , जुर्म से भर जायेंगे , फिर भी  ,
न टूटेंगे  ,  इन्हें तोड़ो  ,   पुरानी  दास्तां   बदलो  /


                                             - S. N. Shukla

Tuesday, November 22, 2011

(120) जिस्म इन्सान के गोलियाँ बन गए-----

जिस्म इन्सान के गोलियाँ बन गए , और बदलती रहीं पालियाँ उम्र भर /
गुल, गुलिस्तान के आह भरते रहे  , कसमसाती  रहीं  डालियाँ  उम्र भर /

अपने खाली कटोरे सिसकते रहे,  उनकी मेजों पे चम्मच खनकते रहे ,
बाग़ वे सब्ज हमको दिखाते रहे  , हम बजाते रहे तालियाँ  उम्र  भर  /

देने वाले निवालों को मोहताज़ हैं , माँगने वाले सर पर रखे ताज हैं ,
हम गुनहगार जैसे भुगतते रहे  ,  वे  उठाते  रहे  उँगलियाँ उम्र भर  /

मेरे घर खोदकर बन गयीं  कोठियाँ, आदमी से बड़ी हो गयीं रोटियाँ ,
हम बचाते रहे टूटता संग- ए - दर , वे गिराते रहे बिजलियाँ उम्र भर /

कितना ढाएँगे वे जुल्म और कब तलक, एक दिन वे भी तो ख़ाक में जायेंगे ,
जो जला वह बुझा , जो फरा सो झरा , सोच सहते  रहे  गालियाँ  उम्र भर  /

जिस्म इंसान के गोलियाँ बन गए  , और बदलती रहीं पालियाँ उम्र भर /
                
                                                                        -S.N.Shukla

Wednesday, November 16, 2011

(119) तम भरी बदली टलेगी /

प्रकृति का है नियम परिवर्तन , अगर यह सत्य तो फिर ,
जो फरा   वह है झरा भी ,   सत्य है   यह तथ्य तो फिर ,
किसलिए मन में निराशा, भय , हताशा, खेद, सम्भ्रम,
जटिलता की   यह घड़ी भी  , क्या सदा यूँ  ही चलेगी  ?

मनुज के कृत कर्म से ,  माना समय   बलवान होता ,
किन्तु यह भी सत्य है  , हर उदय का अवसान होता ,
देव गति के सामने  ,  होती विवशता  हर किसी की ,
अवशता की अग्नि भी , उर में भला कब तक जलेगी ?

फल प्रकृति आधीन है , पर कर्म पर अधिकार तेरा ,
नियति भी झुकती उन्हीं से, तोड़ते जो विषम घेरा  ,
शुष्क पौधों को निराता - सींचता   यह सोच माली ,
कर्म कृषि अपने समय पर , एक दिन निश्चय फलेगी/

दैन्यता , असहायता का ,  दंश भी सह लो ह्रदय पर ,
ध्यान रखना, क्रोध या अविवेक मत छाये विनय पर ,
शील, साहस ने सदा ही , विजय पायी है समय से  ,
सूर्य  फिर होगा प्रभामय , तम भरी बदली टलेगी  /

Friday, November 11, 2011

(118) फिर अन्धेरा दौर

भूलना कर्तव्य को , अधिकार की बातें हमेशा ,
इस समूचे देश में , हर वर्ग का बस एक पेशा ,
दंभ का कुहरा , विनय की चाँदनी पर छा गया है ,
फिर अँधेरा दौर कैसा  ,  इस धरा पर आ गया है ?

कर रहा छल- छद्म , जैसे हर नगर में आज फेरा ,
बन रहे  अपने , पराये ,   स्वार्थ का हर और डेरा ,
स्वान का सा धर्म , अब मानव मानों को भा गया है ,
फिर अँधेरा दौर  कैसा  ,  इस धरा पर आ गया है ?

आधुनिकता की  डगर में ,  टूटते रिश्ते पुराने ,
पालकों तक के हुए अब , आज सब चेहरे अजाने ,
अंधड़ों में फँस यहाँ ,  हर आदमी छितरा गया है ,
फिर अँधेरा दौर कैसा  ,  इस धरा पर आ गया है ?

पागलों से घूमते हम , शस्त्र अपनों पर उठाये ,
क्या अमिय का अर्थ , जब विषकुम्भ निज उर में छिपाए?
दुष्टता का दैत्य  !  मानवता ह्रदय की खा गया है ,
फिर अँधेरा दौर कैसा  ,  इस धरा पर आ गया है ?

                                              - S. N. Shukla

Monday, November 7, 2011

(117) हथियार संभालो

आज अहिंसा  नहीं जवानों  ,  हाथों में हथियार  संभालो /
लुटता देश और तुम चुप हो , खुद अपनी पतवार संभालो / 


रिरियाते - मिमियाते से स्वर, और याचना की मुद्राएँ  ,
दैन्य, दासता , जाति - धर्म की , ये ओछी-थोथी सीमाएँ,
तोड़ो, छोड़ो झूठे बंधन ,  सबल बनो , अधिकार संभालो /
लुटता देश और तुम चुप हो , खुद अपनी पतवार संभालो /


दाता, दीन- हीन फिरते हैं ,   याचक हैं महलों के वासी ,
मूर्खराज का वंदन करती , प्रतिभा बन चरणों की दासी ,
आगे और अनीति नहीं अब , विषपायी तलवार संभालो /
लुटता देश और तुम चुप हो , खुद अपनी पतवार संभालो /


कन्धों पर चढ़कर औरों के , पार करो मत गहरे जल को ,
जीवन की   गंभीर भंवर में  , कंधे  साथ न  देंगे कल को ,
बनो सफल तैराक स्वयं , औरों को भी उस पार निकालो /
लुटता देश और तुम चुप हो , खुद अपनी पतवार संभालो /












                                                              S.N.Shukla

Friday, November 4, 2011

(116 ) गज़ब वो शिल्पकार है /

ये सस्य- श्यामला धरा, ये नीलिमा लिए गगन, 
ये तारकों भरी निशा , सुबह की मद भरी पवन,
ये शीत, ताप,  मेह ,   अंधकार में ,   प्रकाश में ,
ये हिम ,   नदी प्रवाह और शुभ्र   जलप्रपात में,
ये सूर्य- चन्द्र रश्मियों में ,जिसका साहकार है/
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /

हरी- भरी ये वादियाँ,   पहाड़ ये   तने - तने ,
ये लहलहाते खेत और बाग़- वन घने - घने ,
वो जिसने रत्न   हैं   धरा के गर्भ में छुपा धरे ,
वो जिसके हर प्रयत्न हैं , मनुष्य बुद्धि से परे ,
जलधि तरंग को ,  उछालता जो बार- बार है  /
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /

असीम वारि राशि से, भरे हुए समुद्र ये ,
समुद्र के विशालकाय और जंतु छुद्र ये  ,
ये व्योम, वायु ,अग्नि,वारि , भूमि पंचतत्व से,
रचाया प्राणिमात्र को ,   विधान से, ममत्व से ,
किया उसी ने,  जीवनीय शक्ति का संचार है /
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /

रचे उसी   ने  जीव  और जंतु   हर प्रजाति के ,
रचे उसी ने अन्न , फल व पुष्प भाँति- भाँति के ,
रचा उसी ने धूप- छाँव , मेघ की फुहार को ,
रचा उसी ने वायु को, वसंत की बहार  को ,
किया उसी ने रंग, गंध , स्वाद का प्रसार है /
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /

Tuesday, November 1, 2011

(115) नारी की नियति विवशता है /

वह पिता और पति, पुत्रों क्या , जन - जन के द्वारा त्रस्ता है /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

था छला अहिल्या को जिसने, वह देवराज कहलाता है,
जननी हंता उस परशुराम का , सारा जग यश गाता है,
सोलह हजार रानी वाला ,  भगवान कहाया जाता है ,
पत्नी का दाँव लगाने वाला , धर्मराज पद पाता है ,
केवल नारी के ही जीवन में, यह कैसी परवशता है ?
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

हर युग में नारी का शोषण, इतिहास गवाही देता है ,
त्रेता , द्वापर में भी उसका , चीत्कार सुनायी देता है  ,
उस शेषनाग अवतारी ने , काटे नारी के  नाक- कान ,
रावण सा पंडित , ज्ञानी , छल से पर नारी हर लेता है ,
कापुरुष तलक बनकर भुजंग, बस नारी को ही डसता है /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

सीता की अग्नि परीक्षा ली ,  फिर भी न राम ने अपनाया ,
अम्बा को भीष्म महाबल से , क्यों भरी सभा से हर लाया ?
क्या द्रुपद सुता थी वस्तु , कि जिसको पाँच भाइयों ने बाँटा ?
पुरुषार्थ , विवश अबला पर ही , क्यों दुस्साशन ने अजमाया ?
अवसाद, घृणा या तिरस्कार से ही नारी का रिश्ता है /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

था पुरुष प्रधान समाज आदि से, नारी भोग्या कहलाई ,
बहुपत्नी नर कर लेता था, नारी कब बहुपति कर पायी ?
पति चिता मध्य पत्नी जलती थी, पति पर नहीं बाध्यता थी ,
नर रहा सदा ही मूल्यवान , नारी का जीवन सस्ता है  /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

वस्तु की भाँति बिकती थीं वे, ग्रंथों में इसका लेखा है ,
धन, धरा और नारी के कारण , ही युद्धों को  देखा है  ,
बालिका जन्मते ही ,  उसका वध कर देते थे राजपूत  ,
घर की चहारदीवारी ही, उसकी बस सीमा रेखा है ,
पर दया - धर्म , ममता , मृदुता , तब भी नारी में बसता है /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

सडकों, गलियों में छेड़छाड़ , भीड़ों में शीलहीन फिकरे ,
क्या राजनीति, क्या लोकरीति , नारी चरित्र के ही जिकरे ,
क्यों नारी के ही हिस्से में, ह्त्या, अपहरण , बलात्कार ,
ज्यों चील झपटती चूहों पर, ज्यों कबूतरों पर हों शिकरे ,
नारी भ्रूणों की ह्त्या कर , नर फिरता बना फरिस्ता है  /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /




Saturday, October 29, 2011

(114) तो क्या ?

अँधेरे चारों तरफ फिर वही, जो पहले थे,
एक गर रात , रोशनी में नहाई  तो क्या ?

जश्न की रात, रात भर हुई  आतिशबाजी ,
दिवाली एक रोज के लिए , आई तो क्या ?

उनसे पूछो , कि जिनके घर नहीं जले चूल्हे ,
शब किन्हीं की रही , प्यालों में समाई तो क्या ?

नकारखाने  में , तूती   के  मायने क्या हैं ,
कहीं आवाज भी, पड़ी जो सुनाई  तो क्या ?

साल में एक नहीं, तीन सौ पैंसठ दिन हैं ,
बलात एक दिन , रौनक कहीं आई तो क्या ?

रोशनी वो जो , हर बशर पे एक सा बरसे,
अधूरी रोशनी , फिर आई न आई तो क्या ?

                           - एस. एन.शुक्ल 

Sunday, October 23, 2011

(113) धरा ज्योतिर्मय बनाएं!

रोशनी का पर्व ! आओ हम सभी मिलकर मनाएं /
प्रेम की बाती  पिरोकर  , बुझ रहे दीपक  जलाएं /

शान्ति का सन्देश ले , हर वर्ष आती दीपमाला ,
पर तिमिर घटता नहीं, मन में नहीं होता उजाला ,
इस तिमिर को तेल- घृत दीपक, मिटा सकते नहीं हैं,
मनुजता के दीप, फिर बंधुत्व के घृत से सजाएं  /
रोशनी का पर्व ! आओ हम सभी मिलकर मनाएं /

व्योम से आकर धरा पर, खिल रहे हैं आज तारे ,
साथ मिलकर   एकता का ,  दे रहे सन्देश सारे  ,
सोचिये!क्या कह रहे ये,क्या समय की माँग इस क्षण,
कह रहे, मानव मनों की आपसी कटुता मिटायें /
रोशनी का पर्व ! आओ हम सभी मिलकर मनाएं /

तैरते ये दीप जल पर, शान्ति की लय छेड़ते हैं ,
सौम्यता, सौहार्द से , वातावरण को जोड़ते हैं ,
सीख लें इनसे , सुह्र्द्ता , सौम्यता की,सरलता की ,
मित्रता के पुष्प , जीवन वाटिका में फिर खिलाएं /
रोशनी का पर्व ! आओ हम सभी मिलकर मनाएं /

कुटिलता के गर्त से , हर व्यक्ति का चेहरा सना है,
कलुष का साम्राज्य है, संताप का कुहरा घना है ,
इस कुहासे को मिटाना ही, सभी का लक्ष्य हो अब ,
यूँ प्रज्वल्लित करें दीपक,धरा ज्योतिर्मय बनाएं!
रोशनी का पर्व ! आओ हम सभी मिलकर मनाएं /

                                -S. N. SHUKLA

Friday, October 21, 2011

( 112 ) गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !
स्वर्ग धरती के, फिर वे कहे जायेंगे  / 

पाल्या फिर कही जायेगी यह धरा ,
और नदियाँ , कही जायेंगी फिर वरा,
पूजे जायेंगे तरु, गुल्म, पादप, लता ,
उर्वरा अपनी उगलेगी , सोना हरा ,
जब प्रकृति की यहीं शेष होगी कृपा ,
शहर, गावों की उस दिन , शरण आयेंगे /
एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

पत्थरों के नगर, जब उबायेंगे , तब ,
चैन खोजेंगे सब , नीम की छाँव में,
गाँव में ही बहेगी प्रकृति की पवन,
चहचहायेंगे पक्षी भी , बस गाँव में ,
लोग, पिकनिक के ही तब बहाने सही,
गाँव में, शान्ति की खोज में आयेंगे /
एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

आम्र की मंजरी की, मधुर गंध जब,
मिल वसंती बहारों को महकाएगी ,
बौर, पल्लव, लता ओट ले कोकिला ,
मधुमयी तान में , गीत जब गायेगी ,
तितलियाँ सप्त रंगों की इठलायेंगी ,
जब भ्रमर, पुष्प गुच्छों पे मंडराएंगे / 
एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

गाय- भैसें , यहीं शेष रह जायेंगी ,
दूध की आश्रिता होगी जब गाँव पर ,
 अन्न, फल, सब्जियाँ, गाँव उपजायेंगे ,
लहलहायेंगी फसलें, इसी ठाँव पर ,
आंका जाएगा , सच मूल्य तब गाँव का ,
ग्रामवासी , कहे देवता जायेंगे  /
एक दिन गाँव , नगरों को ललचायेंगे !

Wednesday, October 19, 2011

( 111 ) इस बार दिवाली में

 दिए जलाए जाते हैं , हर बार दिवाली पर   /
 ईर्ष्या- द्वेष जलाएंगे , इस बार दिवाली पर  /

मिलकर बांटेंगे आपस में, प्यार दिवाली पर ,
ढह जायेगी , नफ़रत की दीवार दिवाली पर /

भीतर-बाहर, घर-आँगन में   उजियारा होगा ,
जब दीपक दमकेंगे ,हर घर- द्वार दिवाली पर /

घर-घर में लक्ष्मी-गणेश का, आराधन होगा ,
और सजेंगे हर घर ,  बंदनवार दिवाली पर /

महानिशा !  के  अंधकार  को ,  दूर भगायेंगे ,
खुशियों की फिर से होगी , बौछार दिवाली पर /

सोच रहा हूँ , शायद उस दिन तुम भी आओगे ,
अपनी भी होंगी , फिर आँखें चार दिवाली पर  /


Monday, October 17, 2011

(110) आओ भुला दें गले मिलकर

माँ भारती की वेदना पर,   मिल विचारें फिर सभी /
आओ भुला दें गले मिलकर, आपसी कटुता अभी / 

हम हिन्दु , मुस्लिम, सिख, ईसाई नहीं,इंसान हैं,
हम एक थे, हम एक हैं ,  हम एकता  की शान हैं ,
फिर किसलिए यूँ लड़ रहे हैं ,   श्वान के जैसे सभी /
आओ भुला दें गले मिलकर, आपसी कटुता अभी / 

हम शत्रुओं की चाल में फंस , स्वयं टकराते रहे ,
अपना वतन ,  खुद दूसरों के हाथ   लुटवाते रहे ,
गत भूल जाओ , किन्तु आगत तो बना सकते अभी /
आओ भुला दें गले  मिलकर,   आपसी कटुता अभी / 

क्या मेह वर्षा से   कभी,  गिरिखंड टूटे हैं भला ?
इतिहास साक्षी है , जलाने जो हमें आया, जला .
अरि को मिटा देंगे , मगर हम मिट नहीं सकते कभी /
आओ भुला दें गले  मिलकर,   आपसी कटुता अभी / 

हम थे जगदगुरु, आज हैं , कल भी वही कहलायेंगे ,
जो चाहते   मेरा अहित , वे स्वयं ही   मिट जायेंगे ,
पर हम सभी में ऐक्य हो, बस मात्र यह संभव तभी /
आओ भुला दें गले मिलकर,  आपसी कटुता अभी / 

Friday, October 14, 2011

(109) सजना है हमें " करवा चौथ पर्व पर "

सजना के लिए, सजना  है हमें /

      प्रिय की हर बात पर,
      उनकी मुसकान पर,
      उनके  हर  गीत पर,
      उनकी  हर तान पर,
घुंघरुओं की तरह ,बजाना है हमें /
सजना के लिए ,  सजना  है हमें /

   आज वृत्त यह, सुहागन का पति के लिए,
   शास्त्र मत से - सुह्रद्ता, सुगति के लिए ,
    कामना ! दीर्घ हो आयु ,  पति प्रेम की ,
   पति के अनुराग, पति की सुमति के लिए ,
चाँद से भी अधिक, छजना है हमें /
सजना के  लिए ,  सजना  है हमें /    

    चाँद को देखकर ,   वृत्त को खोलूँगी मैं, 
    प्रिय से हर बात में, मधु को घोलूँगी मैं,
    चौथ करवा,   प्रिया वृत्त- पिया के लिए ,
    आज नव नेह पट, फिर से खोलूँगी मैं ,        
नव वधू की तरह, लजना है हमें /
सजना के लिए, सजना  है हमें /

    स्त्रियोचित प्रकृति ,गर्विता, मानिनी ,
    पति ह्रदय की रहूँ , मैं सदा स्वामिनी ,
    प्रेम के रंग  , जीवन में  धीमे न हों  ,
    मैं रहूँ भामिनी,उनकी अनुगामिनी  ,
दर्प को, दंभ को , तजना है हमें  /
सजना के लिए, सजना  है हमें /

Wednesday, October 12, 2011

(108) कभी तो रात जायेगी

कभी तो आयेगी  सुबह ,  कभी तो रात  जायेगी /
प्रकाश की किरण कभी तो,फिर से मुस्कुरायेगी  /

ये अन्धकार की निशा ,
मनोविकार की  निशा ,
विशाल भार सी निशा ,
दुरत पहाड़ सी  निशा  ,
हटेगी मार्ग  से कभी, कभी  तो   बीत जायेगी /
कभी तो आयेगी सुबह , कभी तो रात जायेगी /

दमक उठेगी हर गली ,
लगेगी   रोशनी भली ,
खिलेगी फिर कुसुम कली ,
पवन बहेगी मनचली ,
चहक उठेगी  कोकिला , हवा भी  गुनगुनायेगी /
कभी तो आयेगी सुबह , कभी तो रात जायेगी /

खुलेगी एक नयी डगर,
लगेगा गाँव भी  नगर ,
हर एक उदास होंठ पर,
खुशी की आयेगी लहर ,
हर एक खुशी भरा प्रहर , नियति तेरा बनायेगी /
कभी तो आयेगी सुबह , कभी तो रात जायेगी /

अगर न मन निराश हो ,
अगर  चुकी न आश हो ,
ह्रदय से   हार मान मत,
न मन   तेरा उदास  हो ,
तो फिर सुबह तेरे लिए ,   नया पयाम लायेगी /
कभी तो आयेगी सुबह , कभी तो रात जायेगी /

Monday, October 10, 2011

(107) चरित्र निर्माण प्रथम हो


तब  होगा  निर्माण राष्ट्र  का ,जब चरित्र  निर्माण प्रथम हो /
जाति- धर्म से ऊपर उठकर, प्रतिभा का सम्मान प्रथम हो /

आओ ! मातृभूमि की सेवा का , मिलकर संकल्प करें हम ,
अपनी भाषा- भूषा के प्रति , फिर आदर का भाव भरें हम ,
उत्कर्शों के शिखर चढ़ें पर, संस्कृति का उत्थान प्रथम हो /
तब होगा निर्माण राष्ट्र का ,जब  चरित्र  निर्माण  प्रथम हो  /

पराधीनता  के  बंधन से ,  मुक्त हुए  छह  दशक  हो गए ,
पर गाँधी, सुभाष के सपने , स्वार्थ सिन्धु के बीच खो गए ,
उन सपनों को सच करने का , घर- घर में अभियान प्रथम हो /
तब होगा  निर्माण  राष्ट्र  का, जब  चरित्र   निर्माण  प्रथम  हो /

लोकतंत्र  के  सोपानों  पर, वर्ग  -  वर्ण  जैसी सीमाएं ,
बाधाओं के अग्निकुंड में, अब भी जलती हैं प्रतिभाएं ,
आवाहन तब करें देश का, जन- जन का आह्वान प्रथम हो /
तब होगा निर्माण  राष्ट्र  का, जब चरित्र  निर्माण  प्रथम हो  /

स्वार्थ  साधना  में जनमानस ,  संवेदना  भुला  बैठा  है ,
निज प्रभुता के मद से गर्वित , मनुज स्वयम में ही ऐंठा है,
चढ़ें प्रगति सोपान स्वयम, पर औरों का भी ध्यान प्रथम हो /
तब होगा  निर्माण  राष्ट्र  का, जब चरित्र  निर्माण  प्रथम हो  /

Friday, October 7, 2011

(106) नफ़रत न घोलिये /


अहले खुदा   की  राह में  ,  नफ़रत  न  घोलिये /
एहसास-ए-रंज -ओ-गम , न तराजू से तोलिये /

खुद !  काँच के मकान में , बैठे हुए हैं जब,
औरों के लिए , हाथ में पत्थर न तोलिये /

गीता हो, बाइबिल हो या गुरुग्रंथ हो , कुरान ,
सबके  उसूल  एक  ,  ज़रा  वर्क  खोलिए /

कौमों की सियासत में मुल्क झोंकने वालों ,
ये लफ्ज़ हैं हरजाई , संभलकर के बोलिए  /

वे ज़ख्म पुराने ही , अभी तक नहीं भरे ,
मरहम न दे सकें , तो उन्हें यूँ न खोलिए / 

Wednesday, October 5, 2011

(105) बुझने न पायें

रोशनी के चंद   दीपक ही सही , बुझने न पायें /
चित्र धूमिल ही सही सौहार्द के, मिटने न पायें /

जो मशालें ले  तमस से लड़ रहे , उनको सराहो ,
और जो उनकी हिमायत में खड़े, उनको सराहो ,
दर्द जो औरों का खुद में पालते , वे कम बहुत हैं,
शक्ति दो उनको समर्थन की, रहें जलतीं शमाएँ /
रोशनी के चंद दीपक   ही सही ,  बुझने न पायें /

मानता  हूँ  !  शक्तिशाली हैं ,  उजालों के लुटेरे ,
मानता,  सच को ढके हैं , झूठ के बादल घनेरे ,
फिर उठाओ आंधियाँ, इन बादलों को ठोकरें दो ,
सत, असत पर, न्याय को अन्याय पर विजयी बनाएं /
रोशनी  के   चंद दीपक  ही सही ,   बुझने  न  पायें /

देश के  स्वाधीन   होते  हुए भी  , ग़मगीन  हो  तुम ,
सोचिये ! मतदान के अतिरिक्त कितना दीन हो तुम ,
लोक के  इस  तंत्र  पर ,   काबिज़  लुटेरे   हो चुके हैं ,
मुक्ति का  उसकी करें   सदुपाय , आओ मन बनाएं /
रोशनी के   चंद दीपक  ही सही ,  बुझने   न  पायें /

इस प्रजा के तंत्र में , तुम स्वयं अधिपति हो स्वयं के ,
इसलिए  !  अन्याय को ललकार दो प्रतिकार बन के ,
जो   तुम्हारे   ही दिए  टुकड़ों पे पल   ,  गुर्रा  रहे  हैं ,
दो उन्हें  दुत्कार   , उनके    हौसले   बढ़ने न पायें /
रोशनी के  चंद   दीपक  ही सही ,   बुझने न  पायें /


Saturday, October 1, 2011

(104) चौंसठ वर्ष व्यतीत हो गए

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और यशस्वी प्रधानमंत्री रहे स्व. लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए स्वाधीन भारत के बारे में उनके द्वारा देखे गए स्वप्न स्वतः स्मृति पटल पर उभर आते हैं / आज के भारत जैसा भारत तो नहीं चाहा था उन्ह्नोने ---------------


बलिदानी गाथाओं के स्वर , अनचाहा संगीत हो गए /
आज हमारी आज़ादी को , चौंसठ वर्ष व्यतीत हो गए /

तब सोचा था ,त्याग-तपस्या का प्रतिफल कुछ नया मिलेगा ,
आज़ादी  के   गगनांगन   में , देश - प्रेम   का   सूर्य   उगेगा ,
बापू  के  सपनों  के  भारत  में ,  फिर  होगा  नया   उजाला ,
त्रेता युग आयेगा  फिर  से ,  हर चेहरे  पर कमल  खिलेगा  ,
रामराज्य के स्वर्णिम सपने , ज्यों बालू की भीत हो गए /
आज हमारी  आज़ादी को , चौंसठ वर्ष  व्यतीत  हो गए /

जनसेवक का बाना पहने ,  सरकारों  में घुसे  लुटेरे ,
न्याय व्यवस्था पंगु हो गयी ,पहले से बढ़ गए अँधेरे ,
वर्ग,जाति की दीवारों से ,  नेताओं ने सबको बांटा ,
बाहुबली - अपराधकर्मियों ने डाले शासन पर घेरे ,
शत्रु हुए अपने , अपनों के , हम खुद से भयभीत हो गए /
आज हमारी आज़ादी को , चौंसठ  वर्ष  व्यतीत हो गए /

किससे करें शिकायत किसकी , घर को   घरवालों ने लूटा ,
स्वार्थ साधनारत जनसेवक , जन सुख-दुःख से नाता टूटा ,
मत बिकते, मतदाता बिकते , बिकते पद , बिकती सरकारें ,
धनबल, जनबल से भय खाकर , सच्चा भी बन जाता झूठा ,
अर्धशतक में ही भारत के , गृह फिर से विपरीत हो गए  /
आज हमारी आज़ादी को , चौंसठ वर्ष व्यतीत हो गए /

जाति - धर्म की बलिवेदी पर , औसत सौ  प्रतिदिन हत्याएं ,
लूट , डकैती ,व्यभिचारों की,  हर दिन अगणित नयी कथाएं ,
तथाकथित जनप्रतिनिधि- प्रहरी , आग लगाकर हाथ सेकते ,
अनाचार,  अन्याय ,  अराजकता , अनीति   लाघीं  सीमाएं ,
शान्ति, प्रेम ,सहयोग ,सुह्र्दता , परदेशी की प्रीती हो गए /
आज  हमारी आज़ादी को ,  चौंसठ  वर्ष  व्यतीत  हो गए /

Wednesday, September 28, 2011

(103) कौन किसके लिए जिया

तुमने जो भी सिला दिया यारों ,
हमने शिकवा कहाँ किया यारों ?

मर तो सकता है किसी पर कोई ,
कौन किसके लिए जिया यारों ?

दो कदम साथ चले भी तो बहुत ,
कद्रदानी का शुक्रिया यारों /

जख्म देना जहाँ की फितरत है ,
जिसने जो भी दिया , लिया यारों /

अब तो रूख्सत के वक़्त माफ़ करो ,
छोड़ दो मुझको , तखलिया यारों /

कौन किसके लिए ---जिया यारों //