About Me

My photo
Greater Noida/ Sitapur, uttar pradesh, India
Editor "LAUHSTAMBH" Published form NCR.

हमारे मित्रगण

विजेट आपके ब्लॉग पर

Wednesday, May 25, 2011

(23) वीरवर कर्ण

रण वीरगती को प्राप्त कर चुके, थे अब तक योद्धा अनंत
भट भीष्म पितामह,  गुरु द्रोण, दोनों का था हो चुका अंत
कुरु सैन्य नियंत्रण और युद्ध, उसके निर्देशों पर निर्भर
सेनापतित्व का भार आज, था कर्ण वीर के कन्धों पर
-------
पैदल से पैदल, गज से  गज, थे भिड़े हुए योद्धा समान  
अश्वारोही सैनिकों   मध्य भी, मचा हुआ था घमासान
रथी, महारथी योद्धा स्यंदन पर , चढ़कर  थे कर रहे युद्ध
नभ से सुरगण इस अप्रतिम रण को देख   रहे थे मंत्रमुग्ध
---------
अर्जुन-राधेय सुभट दोनों, थे एक दुसरे के समक्ष
आयुध-आयुध टकराते थे, पर निबल न था एक भी पक्ष
रक्ताभ नेत्र चपला सी गति, दोनों की भृकुटी तनी हुई 
शरवृष्टि अनवरत थी ऐसी, मानों नभ बदली घनी हुई
---------
थे व्यर्थ हो रहे दिन भर से , दोनों पर दोनों के प्रहार
पर नहीं निकलता दीख रहा था, उनके रण का कोई सार
गिर रहे धरा थे टूट-टूट, दोनों के आयुध टकरा कर 
दोनों थे पीड़ित रोम-रोम, पर नहीं प्रदर्शन था मुख पर
---------
रण मध्य किन्तु फिर भी दोनों , थे नहीं शस्त्र रखने वाले
क्रोधित वनराज सदृश दोनों, भट जूझ रहे थे मतवाले
अवसान दिवस का था समीप, दिनकर आभा थी मलिन श्रांत
लड़ते लड़ते रण मध्य इधर, कौन्तेय-कर्ण थे श्रमित क्लांत
--------- 
क्रोधित रविसुत ने तरकश से, चाहा निकालना तभी  तीर 
फुंकार उठा विषधर भुजंग, जो उसमें बैठा था अधीर 
आश्चर्यचकित रह गया कर्ण, सोचा मन-यह कैसी माया
मेरे तूणीर मध्य कैसे, यह विषधर तक्षक घुस आया?
---------
बोला सक्रोध मेरे तरकश में, बैठा क्या कर रहा दुष्ट
व्यवधान बन रहा है रण में, क्यों मुझे और कर रहा रुष्ट,
मैं जान रहा तू शत्रु दूत, चाहता मुझे तू डस लेना
पर कीट पतंगों का वध कर,चाहता न मैं अपयश लेना
---------
बोला तक्षक हे अंगराज मैं शत्रु नहीं हितकामी हूँ
इस समर भूमि में आया बस बन कर तेरा अनुगामी हूँ
हे वीर शत्रु जो तेरा है, वह ही वैरी मेरा भी है
जो लक्ष्य जन्म से मेरा है वह लक्ष्य आज तेरा भी है
---------
जग के भुजंगों का स्वामी हूँ मैं अश्वसेन कहलाता हूँ
अर्जुन का शत्रु जन्म से हूँ, पर पहुँच न उस तक पाता हूँ
बस तेरे ही शर हैं समर्थ, उसके श्यन्दन तक जाने में
हो सकते तुम्हीं सहायक हो,मुझको उस तक पहुचाने में
---------
निज शर पर कर आरूढ़ वीर, बस उस तक जाने दे मुझको
अर्जुन को अंतिम निद्रा में अविलम्ब सुलाने दे मुझको
जीवन भर का संचित निज विष, जब उस पर वमन करूँगा मैं
फिर विजय तुम्हारी निश्चित है, क्षण में ही प्राण हरूँगा मैं
---------
बोला राधेय अरे विषधर, तू समझ न मुझको पाया है
है सर्प जन्म से मनुज शत्रु, नर मित्र कभी कहाया है
फिर कैसे तुने सोच लिया यह, तेरा मित्र बनूंगा मैं
अर्जुन से भट से विजय हेतु, तेरी सहायता लूँगा मैं ?
---------
संघर्ष, शत्रुता नहीं सदा, यह मात्र इसी जीवन भर है 
जय और पराजय, लाभ-हानि , सब कुछ विधना पर निर्भर है 
अर्जुन है मेरा शत्रु किन्तु नर है वह कोई नाग नहीं 
पर मैं उससे जय पाने में, दे सकता तुझको भाग नहीं 
---------
हे अश्वसेन अपने मन  से तज दे ऐसा कुत्सित विचार
करने दे सकता कभी सिंह, क्या औरों को अपना शिकार?
तेरी सहायता से निश्चित जय पाउँगा है मुझे भान
पर ऐसी जय पा शेष रहेगा कर्ण वीर का कहाँ मान
---------
जा चला मनुज के दुष्ट शत्रु, सहयोग न मुझसे पायेगा
जीते जी ऐसा घृणित कर्म राधेय नहीं कर पायेगा  

Tuesday, May 24, 2011

(22) आंकड़ों में देश

चीथड़ों में जिन्दगी हो या कि भूखे पेट हों पर
आंकड़ों में देश यह खुशहाल रहता है हमेशा.
                         झूठ की बुनियाद पर तीमार होती हैं इमारत 
                         यह सियासत में यहाँ का हाल रहता है हमेशा.
साल भर में भी नहीं फाइल सरकती इंच भर भी
दफ्तरों का काम कछुआ चाल रहता है हमेशा.
                        प्यार की भाषा समझ  आती नहीं सरकार को भी
                        पर दबंगों के लिए तर माल रहता है हमेशा.
वायदों बातों के लच्छेदार भाषण रोज लेकिन
सच ये डाली पर चढ़ा बेताल रहता है हमेशा.
                      झूठ मक्कारी जिन्हें आती वही खुशहाल हैं बस
                      सत्य बेचारा यहं बदहाल रहता है हमेशा.

(21) राजनीति

हमारे राजनीतिबाजों ने ऐसा कुछ किया है
की राजनीति की नीति को सांगोपांग जिया है
सुनते हैं की लड़ाओ और राज करो अंग्रेजों  की नीति थी
शायद उस समय राजनीति की यही रीति थी
किन्तु वे जाते हुए अपने इस मूल मन्त्र को -
भारतीय राजनीति से जोड़  गए
अंग्रेज चले गए कितु अपने मानस पुत्रों को यहीं छोड़ गए.
यह भारतीय राजनीति का राज है
कि जो जितना विध्वंसक है वह उतना बड़ा राजनीतिबाज है. राजनीति

(20) जलना होगा

जग को यदि प्रकाश देना है
तो बाती बन जलना होगा
सस्य श्यामला धरती करने हित
हिम बनकर गलना होगा.
---------
राम, कृष्ण, नानक, सुभाष की
गाथाओं के पृष्ठ देख लो
देने या पाने दोनों में
कंटक पथ पर चलना होगा.

(19) कहना होगा

जल में रहकर मगरमच्छ के
हर नखरे को सहना होगा
बलशाली के बल से या फिर
भय से दबकर रहना होगा.
----------
युग-युग से सारी दुनिया की
प्यारे ये ही रीत रही है
हो प्रतिकूल समय तो
काका गदहे तक को कहना होगा.

(18) घर के पहरेदार सो गये

रक्षक ही भक्षक बन बैठे, जन सेवक बटमार हो गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
           उन्हें छोड़कर उनको पकड़ा
           उनको छोड़ा उनको पकड़ा
           किन्तु जिसे हमने अपनाया
           उसने ही गर्दन को जकड़ा
हर चुनाव में थोथे वादे , नारों से दीवार भर गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
         होली और दिवाली फीकी
         फीकी ईद और बैसाखी
         रक्षा सौदों बीच दलाली
         क्या मतलब रखती अब राखी
क्रिसमस भी छुट्टी तक सीमित, फीके सब त्यौहार हो गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
        अक्षम आयुध लेकर लड़ते
        सीमाओं पर लड़ने वाले
        खुद की पीठ ठोंकते शासक
        मरते रहते मरने वाले
कौन दवा अब करे रोग की, वैद्य स्वयं बीमार हो गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
       भय अब नहीं शत्रु से उतना
       जितना मित्र घात का भय है
       अविश्वास का घना अँधेरा
       निज प्रतिछाया पर संशय है
करें भरोसा कैसे किस पर, मतलब के व्यवहार हो गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
       भरी सभा में झूठ बोलते 
       हया हो गयी हवा हवाई 
       सावधान अब तो कुछ चेतो 
       ये सब मतलब के सौदाई
बड़े-बड़े नेता भी अब तो, लोलुप और लबार हो गये 
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.

(17) तिल तिल कर के गलते देखा

भरी दोपहर तपती धरती
रवि किरणें ज्वाला बरसातीं
और हवा की भीषण गति में
रह रह कर लपटें बल खातीं
वस्त्रहीन शिशुओं को मैंने
देखा फुटपाथों पर जलते
फटे चीथड़े में माओं को
तिल तिल कर के गलते देखा. 

जल-थल सारे एक हो गए
मूसलधार बरसता पानी
झोपड़ियों में घुस घुटनों तक
वारि राशि करती मनमानी
छप छप कर कीचड पानी में
कीड़ों जैसा जीवन जीते
आश्रयहीन समूहों में भी
जनमानस को पलते देखा.

पौष माघ की कड़ी शीत में
गोदी में दुधमुहाँ दबाये
पाले कुहरे और ओस में
लघु वस्त्रों में लाज छुपाये
लाखों ललनाओं को मैंने
देखा भूख प्यास से व्याकुल
कृश शरीर निर्वसन देह में
वृद्ध जनों को ढलते देखा.

दैव तुम्हारी रचना में तो 
मानव सबसे श्रेष्ठ कहाता
कितु बिलाव स्वान मूषक के
जैसा भी वह भाग्य न पाता
रजत पीन्जरों में मूषक सुत
क्षीर बिलावों को मिलता  है
और सुन्दरी की गोदी में
स्वान पुत्र को पलते देखा.
तिल तिल कर के गलते देखा.

Monday, May 23, 2011

(16) जीवन

जीवन एक अबूझ पहेली
हर पग एक नई डगर है
हर मग पर उलझन अलबेली
जीवन एक अबूझ पहेली.

योग, घटाना, गुणा, भाग
या लघुत्तम, गुरुत्तम से सुलझाओ
नए सूत्र नित नई विधाएं
फिर-फिर जोड़ो और घटाओ
जोड़-जोड़ थक गयी जिंदगी
आखिर खाली हाँथ हथेली 
जीवन एक अबूझ पहेली.

अमरबेलि सी इसकी लड़ियाँ
अमरलता जैसी लतिकाएँ
ओर-छोर का पार न मिलता
चाहे जितना भी सुलझाएं
चक्रव्यूह की संरचना सी
हर क्षण यह करती अठखेली 
जीवन एक अबूझ पहेली.

गोद, पालना, किलकन, थिरकन 
बचपन, यौवन और बुढ़ापा 
जन्म, जवानी जरा, म्रत्यु तक 
मन से मिटा न पाए आपा
गठरी गांठ रहा मन बांधे
पाई ऐसी बुद्धि हठेली
जीवन एक अबूझ पहेली.

लम्बा सफ़र लक्ष्य अनजाना
प्रतिपल,प्रतिक्षण चलते जाना  
पथ समतल हो याकि विषम हो
सुख-दुःख हंसकर सहते जाना
छूट गए सब मेले पीछे
अंत समय रह गयी अकेली
जीवन एक अबूझ पहेली.


(15) कितना सुन्दर वह बचपन था

छोटे न बड़े का अंतर था, न उंच-नीच का भेदभाव
था लाभ- हानी का खेद नहीं, न सुख-दुःख का कोई प्रभाव
खेलना और खाना सोना बस केवल इतना जीवन था
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.

क्या अपने और पराये क्या, सारा संसार हमारा था
सबका प्रिय, सबका स्नेह पात्र, सबकी आँखों का तारा था
मेरी किलकारी क्रीडा से घर भी बन जाता उपवन था
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.

खेलना, झगड़ना या लड़ना, रूठना, मनाना ही बस था
पर हम सब के उस झगडे में भी एक अनूठा ही रस था
संवादहीनता का हो जाता कुछ पल बाद समापन था
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.

हम बढे और दूरियां बढीं, फिर भेद-भाव पनपा मन में
हम उच्च और वे दलित, नीच विष लगा दीखने चन्दन में
अब वे भी खिचे-खिंचे से थे, रह गया न वह अपनापन था  
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.

सोचो बच्चे हैं श्रेष्ठ, याकि अब हम वयस्क हो अच्छे हैं 
हम घृणा, स्वार्थ, तिकड़म में रत, वे कितने सीधे-सच्चे हैं 
अब सीमाओं में बंधे हुए, तब सारा ही जग आँगन था 
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.


(14) वह मुझसे प्यार करता है

वह जब भी साथ होता है, तो अक्सर ही झगड़ता है 
कभी किस बात को लेकर, कभी बेबात लड़ता है 
झगड़ना, रूठना, लड़ना भी चाहत की निशानी है 
मैं उससे प्यार करता हूँ वह मुझसे प्यार करता है

वह हँसता है तो लगता है की नदियाँ खिलखिलाती हैं
तबस्सुम ले के उसकी फूल-कलियाँ मुस्कुराती हैं
दिवाली का उजाला है, है उसमें रंग होली का
वह सावन की फुहारों सा मुझे सरसार करता है

कुछ ऐसी वख्त की मजबूरियां हैं, मिल नहीं पाता
मुसलसल रात-दिन चलता हूँ पर मंजिल नहीं पाता
मैं थकता हूँ तो उसकी याद की थपकी सुलाती है
वह मेरे दिल में रहता है, वह दिल के साथ रहता है

मैं वह भंवरा न जो हर फूल-पत्ती देख ललचाता
हर एक तितली के पंखों पर हमारा दिल नहीं आता
बिठा लूँ उस जगह कैसे किसी भी ऐरे-गैरे को
जहन पर मेरे दिल की दुनिया का सरताज रहता है ?

(13) दो ख़त

उसने मुझको इस जीवन में
कितनी ही बार लिखे ख़त हैं
पर मैं जो अब तक समझ सका
तो दो ही मुझे दिखे ख़त हैं.

पहले कुछ ख़त जिनमें केवल
था प्यार- प्यार कुछ और नहीं
पर उसके बाद लिखे जितने
शिकवे इतने कुछ ठौर नहीं.

तीतर के आगे था तीतर
तीतर के पीछे था तीतर
आगे तीतर, पीछे तीतर
तो आगे-पीछे था तीतर.

जैसे इस सहज पहेली में
वे सारे ही तीतर दो थे
बस उसी तरह उसके सारे
वे ख़त मिलकर के भी दो थे.

(12) तेरे दृगों का नीर रानी

पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी
और उससे भी अधिक तेरे दृगों का नीर रानी .

आज तक हमको मिले विश्वास के पथ पर अँधेरे
मित्र बन छलते रहे हमको सदा मग के लुटेरे
पर बदल सकता नहीं अपनी प्रकृति मैं भी विवश हूँ
हो भले ताने खड़ा सिर पर समय शमसीर रानी
पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी .

मैं हिमालय का समूचा भर सिर पर ढो रहा हूँ
बांस जैसा था तना लेकिन धनुष अब हो रहा हूँ
घाव हो यदि एक तो उसको दिखाऊँ भी तुम्हें मैं
इस ह्रदय में बिंधे हैं अगणित विषैले तीर रानी
पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी.

कौन लाया कौन लेकर जायेगा वैभव यहाँ से
सब यहीं रह जाय खली हाँथ जाते सब जहाँ से
इसलिए जो है उसी में खुश रहो , खुशियाँ लुटाओ
बांटता कोई किसी का दुःख नहीं यह बात जानी
पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी .

पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी
और उससे भी अधिक तेरे दृगों का नीर रानी .




Monday, April 25, 2011

(11) निष्काम कर्म

था कहा  कृष्ण ने कर्म वश्य प्राणी नर जीवन पाता है
निष्काम कर्म का वाक्य स्वंय फिर प्रश्न मात्र रह जाता है
निष्काम भाव से करे कर्म तो लक्ष्य कहाँ रह जायेगा
क्या लक्ष्यहीन मानव जीवन में कभी सफल हो पायेगा?

कामना जब तलक  है मन में जीवन गतिमान तभी तक है
जब तक उद्देश्यपूर्ण गति है, जीवन वरदान तभी तक है
उद्देश्यहीन नर इस जग में, पग-पग ठुकराया जायेगा
फिर निरुद्देश्य, निस्पृह, निरीह कैसे कोई  रह पायेगा?

गुरु, पिता, सखा, जननी, भगिनी, पत्नी, सुत हो या प्राणी मात्र
किसके प्रति  कैसे रखें  भाव, कर्तव्य  सिखाते हमें शास्त्र  
हो धर्म, अर्थ  या काम, मोक्ष  प्राणी जब उस  पथ  जायेगा
कामनाहीन  रहकर  कैसे फिर लक्ष्य वेध  कर  पायेगा?

उस कंस नाश में जननि, जनक मुक्ति का ध्येय ही छाया था
फिर सगी  बुआ के  पुत्रों  हित  कृष्ण  ने युद्ध  रचवाया  था
पूतना, बकासुर वध, कालीदह  में भी  थे कुछ निहित स्वार्थ  
निष्काम  कर्मयोगी  कैसे फिर कहा कृष्ण को  जायेगा?  

(10) हथियार गहेंगे

मौन रहे अब भी यदि तो फिर बढ़ते अत्याचार रहेंगे.
सहनशीलता  की सीमा है आखिर कब तक भार सहेंगे .

कहीं हवाला, कहीं घोटाला, कहीं तहलका डाट काम है
किसको कौन किस तरह पकडे चोरों में तीसरा नाम है
दफ्तर, अफसर, मंत्री सब का पैसा ही बस लक्ष्य रह गया
विभ्रम, विवश, विवेकशून्य हम कब तक इनका साथ गहेंगे .

सैन्यायुध खरीद में भी अब शासन करता गोलमाल है
देश लुटेरों के हाथों में चोरों का बिछ रहा जाल है
कौन करे  प्रतिवाद किसी का, चोर-चोर मौसेरे  भाई
यही लुटेरे कल चोरी, रिश्वत अपना अधिकार कहेंगे

हर चुनाव में गलती अपनी दोष दूसरों को देते हैं
स्वार्थ विवश या फिर दबाववश बाहुबली को चुन लेते हैं
छूट  लूट की जब दी हमने तो फिर जग से रोना कैसा
आखिर कब तक शोषित पीड़ित बेबश और लाचार रहेंगे .

जाति, धर्म की सीमाओं से देश न बाटें नेक राय है
दल की निष्ठा छोड़ चुने हम व्यक्ति यही अंतिम उपाय है
आज न चेते तो निश्चित  है भावी  पीढ़ी की बरबादी
युवा रक्त लेगा उबाल तो कलम  छोड़ हथियार गहेंगे .

Sunday, April 24, 2011

(9) कैसे मान लें हम

इस अमा की रात को वरदान कैसे मान लें हम.
है प्रगति पथ राष्ट्र का अभियान कैसे मान लें हम .

स्वार्थ, लिप्सा, कुटिलता, कुविचार हर मन में भरा है
अराजकता, अनृत, छल, अन्याय से पूरित धरा है
स्वहित पोषण ही जहाँ पर नीति शासक वर्ग की  हो
उस स्वशासन  को भला वरदान कैसे मान लें हम .

हम प्रगति पथ अग्रसर हैं देश में नित घोषणायें
किन्तु अब तक बेअसर है नीतियाँ सब योजनायें
योजना या घोषणा का  षष्ठमांश कृतित्व दुष्कर
चढ़ सकेंगे प्रगति के सोपान कैसे मान ले हम .

वेश, भूषा, तत्त्व, दर्शन, धर्म आयातित  जहाँ पर
और अपना धर्म, भाषा, वेश ही शापित जहाँ पर
अनुकरण  होता जहाँ पर दूसरों की सभ्यता का
राष्ट्र का होगा वहां  पर उत्थान कैसे मान लें हम .

नीति सिखलाते हमें अब हैं उजालों के लुटेरे
बस इसी से नीति पथ , सनमार्ग पर बादल घनेरे
दम्भ, हिंसा, द्वेष, ईष्र्या से प्रदूषित  आज जन मन
इस निशा में उदय होगा  भानु कैसे मान लें हम .

(8) नेकी का फल

ठसाठस भरी हुई नगर बस-
गोद में दुधमुहा शिशु दबाए खड़ी नवयौवना  को देखा-
त्यों ही -
मेरे मन में सहानुभूति  की चिंगारी फूटी
मैंने अपनी सीट से उठते हुए कहा-
बहन जी बैठ जाइये .
बच्चा भीड़ में परेशान हो जायेगा-
खड़े होने का कष्ट मत उठाइए.
उसने मुझे भस्म कर देने वाली नजरों से-
घूरते हुए कहा -
बदतमीज़ी करते हो शर्म नहीं आती ?
क्या तुम्हारी माँ बहने बस में नहीं जातीं ?
हम इस अप्रत्याशित स्तिथि पर परेशान थे .
तब तक देखा -
हमारे सीट पर एक और भद्र पुरुष विराजमान थे .
पड़ोस की सीटों पर बैठे लोग -
मेरी दयनीय स्तिथि पर मुस्कुरा  रहे थे .
और हम-
अपनी सीट खुद छोड़ कर पछता रहे थे.


नेकी का फल

(7) कुएं में ही भाँग है

अपने विवाहित मित्रों की दृष्टि में-
मैं आवारा हूँ.
क्योंकि तीस वसंत देखने के बाद भी
अभी  तक क्वांरा  हूँ .
अब तुम्हें क्या बताऊँ
अजब सूरते हाल है
इस महंगाई में एक पेट लेकर तो जीना  मुहाल है .
खैर मैंने अपना साहस बटोर
और मित्रों की हिकारत का जवाब देने के लिए
वैवाहिक विज्ञापन का मसौदा कुछ इस तरह जोड़ा .
तीस वर्षीय लम्बे, छरहरे, गौरवर्ण, स्नातकोत्तर  युवक को -
एक अदद पत्नी की तलाश है .
प्रतिउत्तर के ढेरों खतों को पढ़-
अब मेरा मन बिलकुल  निराश है.
लगभग हर उम्मीदवार  की -
दहेज में  कार और रंगीन टीवी की मांग है.
अब आप ही सुझाएँ - मैं क्या करूँ
यहाँ तो कुएं में ही भाँग है.


Monday, March 28, 2011

(6) मैं हूँ अजेय

अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मै हूँ अजेय.
हर बाधा से गलबहियां कीं, पर किंचित छोड़ा नहीं ध्येय .

झंझावातों में लिया जन्म, शैतानों से लड़ कर आया
आंधी ने लोरी दी मुझको, तूफां ने छूकर दुलराया
सूरज की तपती गोदी में, मैं हंसा और किलकारी ली
मैं दावानल, मैं शेषनाग, मैं रामानुज, मैं सुमित्रेय
अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मैं हूँ अजेय .

कुछ बड़ा हुआ चलना सीखा, घर आँगन से बाहर आया
हर ओर स्वार्थ, लिप्सा प्रपंच में, सारा जग लिपटा पाया
हर पग पर ठोकर और शूल ने, बढ़ मेरी अगवानी की
मैंने गाये वे  गीत सदा, जो जनमानस  को थे अगेय
अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मैं हूँ अजेय.

बचपन से आगे यौवन में, थीं विकट समस्याएं अनंत
लहराते सागर सा पथ था, न ओर-छोर, न आदि-अंत
पथ हीन बियाबानों में भी, मैने जीवन को नवगति दी
रचना, उत्पत्ति, सिद्ध करना, पाइथागोरस की ज्यों प्रमेय
अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मैं हूँ अजेय.

मैंने पाषणों को तोला, पर्वत शिखरों को कुचल दिया
दुर्गम पथ पर आगे बढ़कर, शूलों को कर से मसल दिया
तपती रेती के ढेरों से, फिर मैंने भी मनमानी की
विष प्याला मैंने अपनाया, तजकर पियूष सा मधुर पेय
अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मैं हूँ अजेय.

उस बया और उस चींटी को, उस मकड़ी को, उस पानी को
उस कालिदास, उस तुलसी को, उस गाँधी, झाँसी रानी को 
अपना आदर्श मानकर मैंने, जीवन भर कुर्बानी दी
मैंने उनको प्रेरक माना, जो औरों के हित रहे हेय
अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मैं हूँ अजेय.

मैं डिगा कर्म पथ से न कभी, अपने मन पर यह नहीं भार
अस्सी घावों की क्या गणना, मैंने तो अगणित सहे वार
मैं आत्मतुष्ट हूँ इससे क्या, यदि जग ने कदर न जानी थी
प्रासाद, कनक, कंचन तो क्या, मैंने पाया जो था अदेय

अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मैं हूँ अजेय.

मैं टूट गया पर झुका नहीं, सौ बार गिरा पर रुका नहीं
जीवन को माना युद्ध एक, बस विजय प्राप्ति ही रही टेक
गिरना, उठना, उठकर लड़ना, बस अपनी यही कहानी थी
कर्तव्य चाप पर मैंने भी, संधाना हर शर को सध्येय
अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मैं हूँ अजेय.

कोई माने या न माने, लेकिन मैं अविजित योद्धा हूँ 
संघर्ष मार्ग का अनुयायी, मैं अप्रतिम, अभय पुरोधा हूँ
उन मूल्यों, उन आदर्शों पर, मैंने बलिदान जवानी की
अपनी उस त्याग, तपस्या का, औरों को देता रहा श्रेय
अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मैं हूँ अजेय.

बनवास और अज्ञातवास, मेरे जीवन में भी आये 
जाने कितने शकुनी मामा, दुर्योधन मुझसे टकराए
लाक्षागृह  और महाभारत की, मैंने भी अगवानी की 
हर बाधा को हंसकर झेला, मैं हूँ इस युग का कौन्तेय 
अब तक न जीत पाया कोई, मेरे मन को मैं हूँ अजेय.  

Wednesday, March 23, 2011

(5) मैं भयभीत नहीं हूँ कल से

मैंने कल को देखा था कल 
मैं भयभीत नहीं हूँ कल से 
किंचित नहीं मुझे चिता है 
कल के आने वाले पल से .

कल के पीछे भाग रहा जो 
उसने अपना आज गंवाया 
मृग मरीचिका  की आशा में 
दौड़ रहा पर पकड न पाया .

आँख खुली था आज सामने 
कल न कभी आया, आएगा 
आज निकल जायेगा कर  से 
हाथ  मसल कर पछतायेगा .

आज हमारे हांथों में है 
आओ इसको सुखद बनायें 
खुशहाली लायें जीवन में 
श्रम से, बल से और अकल से.

मैंने कल को देखा था कल 
मैं भयभीत नहीं हूँ कल से 


Sunday, March 6, 2011

(4) यह कैसा गणतंत्र

भारतीय गणतंत्र के तीनों अंग, गांधीजी के तीन बंदरों का दल है
एक चलने , दूसरा सुनने,
 तीसरा देखने में असमर्थ !
 इतना रद-ओ-बदल है .
--------
इस देश में एक विधायिका है,
जहाँ आये दिन, एक-दूसरे की टांग खिची जाती है
इसकी फसल
विभिन्न विचारधारा के दलों द्वारा सिंची  जाती है
यहाँ प्रायः सरकार लंगड़ी (अल्प मत ) बनती है,
इसीलिए बैसाखी देने वालों की रबड़ी छनती है
यह भारतीय लोकतंत्र का राज है,
की सरकर दूसरों के सहारे की मोहताज है . 
-------
इस देश में एक कार्यपालिका भी है
जो कामचोर कर्मचारियों और नौकरशाहों की चेरी है . 
फलस्वरूप
हर कार्यपालन में होती अनावश्यक देरी है . 
यह सुनती कम है, सदा अपने मन की करती है,
और देश की व्यवस्था  का
अभिन्न अंग होने का दम भरती है .
इन्हीं  के बलबूते देश का सारा प्रशासनिक कामकाज  है,
यहाँ जननायकों का नहीं नौकरशाहों का राज है .
---------
इस देश में न्यायपालिका भी है,
जो संवैधानिक स्तर पर पूर्णतः स्वतन्त्र है
किन्तु न्याय प्रक्रिया में ,
न कहीं स्वा है और न कहीं तंत्र है .
भारतीय न्यायव्यवस्था
अधिवक्ताओं की तर्कों पर पलती   है,
न्याय की देवी भी
अब लक्ष्मी के वहां पर चलती है . 
यह देखती कम है सुनती ज्यादा है ,
इसीलिय हर तीसरा आदमी-
 अपराध करने पर आमादा है .
---------
इस देश में अभी जनता भी है,
जो गूंगी और मतदाता के रूप में जानी जाती है .
इसकी कीमत-
केवल चुनाव के समय ही पहचानी जाती है .
इसे हर पाँच वर्ष बाद 
आश्वासन रुपी फल मिलता है,
और इसके भोलेपन को
हर खददरधारी छलता है .
यहाँ चाटुकारों, दलालों, जमाखोरों
और नौकरशाहों की चाँदी है,
यह बात अलग है कि-
देश में जनतंत्र है, पूरी आज़ादी है .
यह गूंगों , बहरों ,अंधों और लंगड़ों का देश है ,
और देश के नाम पर-
ज़मीन जंगल तथा लक्ष्यहीन भीड़ शेष है .