तेल बाती से परिपूर्ण हूँ , मुग्ध हूँ ,
प्रज्ज्वलन की मिली पर कला ही नहीं।
वे दमकते रहे , मैं तमस से घिरा ,
वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।
सैकड़ों सांझ ले आस जीता रहा ,
कोई स्पर्श दे , थपथपाये मुझे ,
मेरी बाती को भी, कोई निज ज्योति से ,
जोड़ , स्पन्दित कर जगाये मुझे ,
पर वो हतभाग्य हूँ मैं, कि जिसका कभी ,
कोई जादू किसी पर चला ही नहीं।
वे दमकते रहे , मैं तमस से घिरा ,
वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।
मैं छुआ जब गया , तो ललकने लगा,
नेह नैनों से बाहर छलकने लगा।
मैं भी मानिन्द उनकी प्रभा दूंगा अब ,
सोच मन , बालमन सा किलकने लगा।
पर वही ढाक के पात बस तीन से ,
वह विटप हूँ , कभी जो फला ही नहीं।
वे दमकते रहे , मैं तमस से घिरा ,
वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।
दर्द इसका नहीं, मैं जला क्यों नहीं,
दर्द यह है , तमस से लड़ा क्यों नहीं,
जब अँधेरे रहे फ़ैल थे हर तरफ ,
तो उन्हें रोकने , मैं बढ़ा क्यों नहीं।
हिम सदृश शांत , विभ्रांत प्रश्तर बना,
उस तपन में भी किंचित गला क्यों नहीं।
वे दमकते रहे , मैं तमस से घिरा ,
वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।
- एस .एन .शुक्ल
प्रज्ज्वलन की मिली पर कला ही नहीं।
वे दमकते रहे , मैं तमस से घिरा ,
वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।
सैकड़ों सांझ ले आस जीता रहा ,
कोई स्पर्श दे , थपथपाये मुझे ,
मेरी बाती को भी, कोई निज ज्योति से ,
जोड़ , स्पन्दित कर जगाये मुझे ,
पर वो हतभाग्य हूँ मैं, कि जिसका कभी ,
कोई जादू किसी पर चला ही नहीं।
वे दमकते रहे , मैं तमस से घिरा ,
वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।
मैं छुआ जब गया , तो ललकने लगा,
नेह नैनों से बाहर छलकने लगा।
मैं भी मानिन्द उनकी प्रभा दूंगा अब ,
सोच मन , बालमन सा किलकने लगा।
पर वही ढाक के पात बस तीन से ,
वह विटप हूँ , कभी जो फला ही नहीं।
वे दमकते रहे , मैं तमस से घिरा ,
वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।
दर्द इसका नहीं, मैं जला क्यों नहीं,
दर्द यह है , तमस से लड़ा क्यों नहीं,
जब अँधेरे रहे फ़ैल थे हर तरफ ,
तो उन्हें रोकने , मैं बढ़ा क्यों नहीं।
हिम सदृश शांत , विभ्रांत प्रश्तर बना,
उस तपन में भी किंचित गला क्यों नहीं।
वे दमकते रहे , मैं तमस से घिरा ,
वह दिया हूँ , कभी जो जला ही नहीं।
- एस .एन .शुक्ल









