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Tuesday, March 6, 2012

(142) रंगों के पर्व रंगारंग कर दे

रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /
खुशी से अंग हर प्रत्यंग भर दे /
उमंगों के बाहें निर्झर धरा पर  ,
आज तू तर- बतर हर अंग कर दे /
रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /

रंगों का अर्थ ही  होता  है  खुशियाँ ,
रंगों के मध्य ही बसती हैं खुशियाँ ,
ये खुशियाँ जायँ बन सच्चाइयाँ अब ,
तू अपने रंग में वह रंग भर दे /
रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /

बजाती तू मिलन का साज होली ,
तू है, पर्वों के सिर का ताज  होली ,
दूरियाँ जायँ मिट मानव मनों की ,
तू कुछ इस बार ऐसा  ढंग कर दे /
रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /

तू आती और बस जाती चली है ,
खिलाती प्रेम की आकर कली है ,
ठहर जा , आके तू  इस बार शुभगे ,
होलिके ! रूढ़ियों को भंग कर दे /
रंगों  के  पर्व  रंगारंग   कर   दे /
                  -  एस. एन. शुक्ल 





Friday, March 2, 2012

(141) प्यासा रहा हूँ मैं /

नदी की धार में  बहते  हुए ,  प्यासा  रहा  हूँ  मैं ,
कभी पूरी न हो पाई , वो  अभिलाषा  रहा हूँ  मैं ,
मैं सारी जिन्दगी ऐसे जिया, जैसे खुली पुस्तक ,
समझ पाया जिसे कोई न , वह भाषा रहा हूँ मैं  /

मैं कतरा हूँ,  समंदर की  निगहबानी में रहता  हूँ ,
मैं लहरों में, तरंगों में ,  उछलता  और  बहता  हूँ  ,
मैं इस दुनिया से बाहर, दूसरी दुनिया से डरता था ,
उसी का फल, मैं सारी ज्यादती चुपचाप सहता हूँ /

ये माना , आज कतरे से , समंदर हो चुका हूँ मैं ,
मगर होकर समंदर भी, स्वयं को खो चुका हूँ मैं ,
समंदर रोज बढ़ता जा रहा है इसलिए,  क्योंकर ,
बहाता आँसुओं की धार ,  इतना रो चुका हूँ  मैं  /

जो खुद  के  वास्ते जीते  हैं , जो  खुदगर्ज़ होते  हैं ,
वे  अपने  हाथ  अपनी  जिन्दगी में , खार बोते  हैं ,
मैं अपनी आपबीती से , महज इतना समझ पाया ,
वे अक्सर ठोकरें खाते हैं,  अक्सर अश्क  पीते  हैं  /

                                        - एस. एन. शुक्ल 

Friday, February 24, 2012

(140) हे भरत, भारत उठो !

तुम भागीरथ हो जो लाये,  देव सरिता को धरा पर ,
भीष्म ! गंगा पुत्र हो तुम , मृत्यु भी जिसके रही कर ,
तुम वही, जिसने जलधि को अंजुली में भर पीया था ,
और तुम हनुमंत हो , भयभीत जिससे था दिवाकर /

तुम भरत हो , सिंह के जबड़ों में गिनते दाँत हो तुम ,
शेष के अवतार,  हे सौमित्र  !  रघुपति भ्रात हो तुम , 
कृष्ण हो तुम,  तर्जनी पर तुम उठा लेते हो गिरिवर ,
शिवि हो तुम , पर प्राण रक्षा , दान करते गात हो तुम /

तुम हो प्रलयंकर , विनाशक सृष्टि रखते दृष्टि हो तुम ,
तुम हो विश्वामित्र , रच सकते नयी फिर सृष्टि हो तुम,
तुम हलाहल पान कर सकते हो ,  सारे विश्व भर का ,
और कर सकते अमिय की, सृष्टि हित में वृष्टि हो तुम /

तुम हो पाणिनि , विश्व गणना के दिए सिद्धांत तुमने ,
और जग को ,  उच्च  आदर्शक  दिए  दृष्टांत  तुमने ,
तुम महात्मा बुद्ध हो , चाणक्य हो , चार्वाक हो तुम ,
नीति क्या, अनरीति समझाया ये आद्योपांत तुमने /

मार्गदर्शक विश्व के तुम थे, विभव- वैभव को जानो ,
क्यों विवश से हो खड़े ,  फिर शब्दवेधी  तीर तानो ,
हे जगद्गुरु ! विश्व  को  नेतृत्व  तेरा  चाहिए  फिर ,
हे भरत , भारत उठो , सामर्थ्य अपनी शक्ति जानो /
                                       - एस.एन शुक्ल

Sunday, February 19, 2012

{139} रुबाइयाँ

                                             (१)
                     खुद अपने आप से कैंची  को कतरते देखा ,
                     आग को बहते हुए ,  आब को जमते  देखा ,
                      अक्ल की बातें जो समझाते रहे दुनिया को ,
                      गैरत- ए- गार में  उनको भी उतरते  देखा /

                                            (२)
                      हमने  काँटों  को सरे आम  सिसकते  देखा ,
                      संग- ए- दिल छोड़िये पत्थर को पिघलते देखा,
                      वो जो दुनिया को हँसाते थे अपनी बातों से ,
                      उनको तनहाइयों में छुप के सुबकते देखा /

                                            (३)
                     खुदा  की  राह  , गुनाहों को  उभरते  देखा ,
                     रंग गिरगिट सा, आदमी को बदलते देखा ,
                      लोग कहते हैं कि अल्लाह से डरिए लेकिन ,
                      मैंने  इन्सान को, इन्सान से डरते देखा /

                                            (४)
                    बुतों को पुजते , आदमी को तड़पते देखा ,
                    गुनाह फलते , बेगुनाह  को फँसते  देखा ,
                    अज़ीब हाल है , इन्सान की इस दुनिया का ,
                     बादलों को भी  , समंदर  में बरसते देखा /

                                         (५)
                   ज़लाल-ओ-जलवा , हर किसी का उतरते देखा,
                    सरे-कोहसार  को  भी ,  टूट  के  गिरते देखा ,
                   ज़मीन पर हैं जो, उनकी भला बिसात कहाँ,
                    मैंने हर शाम, आफ़ताब  को ढलते  देखा /
              
                                              - एस. एन. शुक्ल


                             

Wednesday, February 15, 2012

(138) इन्सान कहाँ है ?

हिन्दू , ईसाई , सिख है , मुसलमान  यहाँ  है,
मैं  खोजता   रहा  हूँ  कि   इन्सान  कहाँ  है ?

मज़हब हैं , जातियाँ हैं, जातियों में जातियाँ,
इन जातियों में  आपकी  पहचान  कहाँ है ?

मंदिर  में वो कुछ और है , मस्जिद में कोई और ,
गुरुद्वारे ,  चर्च  और  है  ,  भगवान  कहाँ  है ?

पत्थर  तो  पुज  रहे हैं , आदमी  तड़प  रहा ,
इन्सान की इस कौम  का  ईमान  कहाँ  है ?

लीडर  बहुत  हैं , और बहुत  से  सियासी  दल,
हर चूल्हा अलग हांडी अलग किश्म के चावल,

बाजीगरों का खेल , सबकी अपनी डुगडुगी ,
इस डुगडुगी  में  एकता  की  तान  कहाँ है ?

सूबे के नाम पर, कहीं मज़हब के नाम पर ,
रुतबे,  रसूख  और  सियासत के नाम पर ,

नफ़रत की क्यारियाँ हैं , क्यारियों में नफरतें ,
वो देश पे  मिटने की ,  आन- बान कहाँ  है ?
                                - एस.एन . शुक्ल

Wednesday, February 8, 2012

(137) मुक्तक
















                      (137)   मुक्तक 
मुल्क  यह सेकुलर है तो फिर हदबरारी किसलिए ,
जातियों   की   खेमेबंदी  ,   तरफदारी   किसलिए , 
हर सियासतबाज़  की ख्वाहिश बने हुक्काम खुद ,
वरना  ये  फिरकापरस्ती ,  सेंधमारी   किसलिए ? 
                   - २-
अब सियासत, महज़ वोटों की तिजारत हो गई ,
और इलेक्शन , पाँच सालाना जियारत हो गई ,
बाप का बेटा का बेटा , याकि बेटी और दामाद ,
सारी पब्लिक , चंद कुनबों की विरासत हो गई /
                   -३-
गज़नबी,  गौरी , सिकंदर  ने तुझे  लूटा कभी ,
और फिर तैमूर , मुगलों का  कहर टूटा कभी ,
फ्रेंच , डच , अंग्रेज , अब देशी दरिंदों का कहर ,
देश !  तेरे सब्र  का  पर  बाँध क्या टूटा कभी ?
                 -४-
या खुदा , भगवान, मौला ,   गाड या  परवरदिगार ,
देवियों, देवों, फरिश्तों , पीर-ओ-मुर्शिद -ए-मज़ार ,
हे महापुरुषों  की  आत्माओं  , कहाँ  सोयी हो तुम ,
क्यों नहीं तुम तक पहुँचती , दीन- दुखियों की पुकार ?
                 -5-
पाप  का साम्राज्य   बढ़ता  जा रहा हर ओर है  ,
रो  रही   ईमानदारी  , मौज  में  हर  चोर  है ,
झूठे, मक्कारों , दरिंदों  के लिए दौलत के ढेर ,
और सुविधाओं भरा , हर भ्रष्ट - रिश्वतखोर है / 
                                - एस.एन .शुक्ल

Friday, February 3, 2012

(१३६) इलाज भी जूता है /

        (१३६) इलाज भी जूता है /









सब  कहते  भ्रष्टाचार  बहुत , यह  लोकतंत्र  बीमार  बहुत ,
सब कहते समय खराब ,और सब कहते अत्याचार बहुत /
औरों की  देखादेखी  जब ,  क्षमता  से कई  गुना चाहत ,
तो फिर कैसे मिल पायेगी ,इस भ्रष्ट व्यवस्था से राहत ?
सब चाह रहे फिर भगत सिंह , सब चाह रहे फिर हों सुभाष ,
सब  चाह  रहे  आज़ाद  और  बाघा  जतीन  हों  आस-पास /
वे  पैदा  हों, संघर्ष  करें , पर  केवल  औरों  के  घर  हों  ,
अम्बानी, टाटा , डालमिया , बिड़ला हों  तो  मेरे घर हों /
बस यही चाह , इस लोकतंत्र की सफल राह का काँटा है,
सोचो! खुद को  तुमने  ही तो , सांचों - खेमों में बांटा है /
मीठा हप- हप , कड़वा थू- थू , उपदेशों की बांचें पोथी ,
बाहर उजले, अन्दर मैले , यह कैसी राजनीति थोथी ?
जब हो चुनाव तो , जाति - धर्म की करते हो पैरोकारी ,
खुद जान - बूझकर पैदा की, अब कहते इसको बीमारी /
बोलो  संसद  में  किसने  भेजे, चोर ,  लुटेरे ,  जमाखोर ,
जब बार- बार गलती अपनी , तो मचा रहे क्यों व्यर्थ शोर ?
यह भ्रष्टाचार एक दिन में ,  नाले  से सागर  नहीं  बना ,
यह अनाचार - रिश्वतखोरी भी अनायास तो नहीं तना /
यह देन तुम्हारी खुद  की है , तुमने ही  इसको  पोषा है ,
लेकिन जब खुद को दर्द हुआ , तो खुद तुमने ही कोसा है /
मैं भी अन्ना - मैं भी अन्ना , सड़कों पर चिल्लाने वालों, 
झूठे  सपनों,  थोथे  नारों से ,  मन  को  बहलाने  वालों /
तुम में से ऐसे कितने हैं , जो खुद हैं पाक- साफ़  बोलो,
जब खुद का ही दामन मैला, तो पहले तोलो फिर बोलो /
पहले अपना मन साफ़ करो, अपनी गलती भी स्वीकारो ,
फिर गलत दिखे चाहे कोई , गिनकर सौ- सौ जूते मारो  /
जैसे व्यभिचारी , चोर  और  मिर्गी  की औषधि जूता है ,
बस उसी तरह इस भ्रष्ट व्यवस्था का इलाज भी जूता है /
                                        - एस.एन.शुक्ल 

Sunday, January 29, 2012

(135) नियम परिवर्तन प्रकृति का /

नियम परिवर्तन प्रकृति का , दिवस पीछे रात भी है /
और  हर  काली  निशा  के  बाद  आता  प्रात  भी  है /
जो न  भय खाते निशा से , और सहते  धैर्य से तम ,
फिर समय उनके लिए , लाता प्रभामय प्रात भी है /

कष्ट मिट्टी पर लिखो , उपकार लिख डालो शिला पर ,
चूमना आकाश है तो , विजय  लिख दो  हर दिशा पर ,
स्वर्ण में भी  दीप्ति  आती ,  ताप  का  संताप सहकर ,
और तन  पर  झेलता  वह , तीव्रतम  आघात भी है /

है वही  जीवन  कि  जिसमें ,  कंटकों से  पूर्ण  पथ हो ,
है वही जीवन कि जिसमें , प्रथम इति पश्चात अथ हो ,
चक्र जीवन  का  निरंतर  ,  एक सा किसका  चला है ?
विजयश्री मिलती जिसे , मिलती  उसे ही  मात भी है /

वही है  सबसे दुखी , जिसने  कभी  भी  दुःख  न देखा ,
जो झरा वह फिर फरा भी , सृष्टि का यह अमिट लेखा ,
बाद पतझड़  कोपलों से , सँवरती  फिर तरु - लताएँ ,
फिर  वसंती  पवन देता  ,  उन्हें  नूतन  पात  भी  है /

नियम परिवर्तन प्रकृति का , दिवस पीछे रात भी है /
                                             - एस.एन.शुक्ल 

Sunday, January 22, 2012

(134) डरा कर इनसे /

हुक्मरां अब भी हैं बेदर्द ,  डरा कर इनसे /
ये किसी के नहीं हमदर्द ,  डरा कर इनसे /

गोलियाँ इनको चलाने से  भी गुरेज नहीं ,
भूखे- नंगों पे लाठियों से भी परहेज नहीं ,
ज़ुल्म की हद से गुजरते हैं अपनी शेखी में ,
वास्ते  इनके  कोई  कायदे - बंधेज  नहीं ,
ये  निगाहें  हैं बड़ी सर्द ,  डरा  कर  इनसे /
हुक्मरां अब भी हैं बेदर्द ,  डरा कर इनसे /


सड़क पे इनको उतरते हुए  डर लगता है,
भीड़  के  बीच गुजरते  हुए  डर लगता  है,
ये हैं संगीनों के साये में भी दहशत से भरे,
घर से बाहर भी निकलते हुए डर लगता है ,
और कहते हैं  खुद को मर्द , डरा कर इनसे  /
हुक्मरां अब  भी हैं  बेदर्द ,  डरा कर  इनसे /


आम इनसान को जाहिल ही  समझते  हैं  ये ,
सारी दुनिया की अकल खुद में समझते हैं ये ,
मुखालफ़त क्या , मशविरा भी गवारा न इन्हें ,
अलहदा  सबसे नस्ल  खुद की  समझते हैं ये ,
इनको दुनिया का नहीं दर्द , डरा कर इनसे  /
हुक्मरां  अब  भी  हैं बेदर्द ,  डरा कर  इनसे /

कुर्सियों के लिए , कुत्तों की  तरह लड़ते हैं ,
कुर्सियाँ पा के  मगर , शेर सा  अकड़ते  हैं ,
चलाते तब हैं ये जंगल का कायदा - क़ानून ,
बाप का माल समझ , खुद का ही घर भरते हैं ,
हमाम  में  हैं  ये  बेपर्द , डरा  कर  इनसे /
हुक्मरां अब भी हैं बेदर्द ,  डरा कर इनसे /
                            - एस. एन. शुक्ल 

Tuesday, January 17, 2012

(133) शल्य चिकित्सक की दरकार है /

देश की बिगड़ी जो कहानी है/
यह सियासत की मेहरबानी है /
लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार ही अभिशाप है,
किन्तु राजनीति तो उसका भी बाप है /
यहाँ बेतरह भाई - भतीजावाद है ,
परिवारवाद है, रिश्तेदारावाद है ,
और उससे भी बढ़कर -
राजनैतिक अवसरवाद है /
राजनेता !
तिकड़म के बीज बोते हैं ,
अलगाववाद की पौध उगाते -
और अवसरवाद की फसल काटते हैं /
वे प्रशासन से लेकर समाज तक -
अपने स्वार्थ साधने के लिए,
लोगों को फिरकों में बाटते हैं /
आम आदमी की भावनाओं से खेलते -
और एक दूसरे की गोद में बैठ -
तिकड़म की मलाई चाटते हैं/
रिश्वत इसी अवसरवाद की औलाद है ,
पत्नी बेवफाई है /
छल , प्रपंच, झूठ , मक्कारी जैसे भाई- भतीजे ,
और इसकी माँ खुद हरजाई है /
ढकोसलेबाजी और हेरा-फेरी ,
इस अवसरवाद की दादी- नानी है /
इसीलिये -
राजनीतिबाजों की आँखों का मर चुका पानी है /
यहाँ शाक- भाजी के भाव बिकता है ज़मीर /
घोर सैद्धांतिक विरोधियों की गठबंधन सरकारें ,
क्या इससे बड़ी हो सकती है-
अवसरवाद की दूसरी नजीर ?
ईमानदारी , नैतिकता और आदर्श ,
राजनीति के क्रीत दास हैं /
जो फटेहाल , चीथड़ों में -
इस देश के नंगे- भूखों के पास हैं /
आप राजनेताओं से -
भ्रष्टाचार से लड़ने की अपेक्षा करते हैं ?
अरे सिद्धांत और नैतिकता तो-
यहाँ पानी भरते हैं /
सड़ चुका है भ्रष्टाचार का घाव ,
और देश -
मरणासन्न सा बीमार है /
इसे वैद्य की दवा की नहीं-
किसी शल्य चिकित्सक की दरकार है /
जो सड़े अंग को -
बेरहमी से काट सके /
और लोकतंत्र पर छा चुके ,
काले बादलों को छाँट सके /
            - एस.एन.शुक्ल

Saturday, January 14, 2012

(132) पति बनते- बनते रह गए थे /

कुछ ही दिन पूर्व , मेरी हुयी सगाई थी /
और मेरे जीवन में पहली बार-
भावी पत्नी से मिलन की घड़ी आई थी/
उसने मुझे पांच बजे वोल्गा में बुलाया था /
किन्तु मेरी घड़ी ने -
अभी चार का ही घंटा बजाया था /
मैनें पहली बार जाना -
आदमी कितना चाक- चौबंद हो जाता है,
शादी क्या -
सगाई के बाद से ही ,
समय का कितना पाबन्द हो जाता है /
बेकरारी में , मैंने ज्यों ही -
पान की दूकान के अर्ध आदमकद दर्पण की ओर,
अपना चेहरा घुमाया /
त्यों ही - मेरे कालेज का सहपाठी ,
राकेश मुझसे आ टकराया /
उसने आते ही पीठ पर धौल जमाई /
बरबस पूछना ही पड़ा , कैसी भाई ?
उसने बताया -
यार मेरी प्रेमिका , शीघ्र ही होने वाली पराई है /
इसीलिये , आख़िरी बार मुझसे मिलाने आई है /
आओ तुम्हे अपनी पसंद दिखाते हैं,
अपनी, भूतपूर्व होने जा रही प्रेमिका से -
तुम्हारा परिचय कराते हैं/
मेरे न चाहते हुए भी -
वह मुझे खींच लाया /
और मेरे अज़ीज़ दोस्त --------
कहते हुए -
उसने अपनी प्रेमिका से , मेरा परिचय कराया /
किन्तु मैं हतप्रभ ठगा सा ,
और वह शर्म से तार- तार थी /
क्योंकि उसकी प्रेमिका ही -
मेरी भावी जीवन नैया की पतवार थी /
मेरे सपनों के महल -
ढह गए थे /
और हम, एक बार फिर -
पति बनते- बनते रह गए थे /
                   -एस.एन.शुक्ल

Wednesday, January 11, 2012

(131) मंजिलों को तलाशा किये /

मन में पाले भरम, उसका होगा करम ,
बस  भटकते  रहे ,  एक आशा  लिए /
रिश्ते- नातों के फैले  बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /

ठोकरें ही मिलीं, हम जिधर भी गए ,
फिर भी हर बार  रस्ते तलाशे नए ,
खाइयों को रहे  पाटते   उम्र  भर,
उम्र भर संग खुद ही तराशा किये /
रिश्ते- नातों के फैले बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /

वह सितमगर है तो मैं भी  गमख्वार  हूँ ,
क्या करूँ , अपनी  आदत  से  लाचार हूँ ,
उसकी नफ़रत को , चाहत में दूंगा बदल,
क्या जिए , गर जिए मन निराशा लिए /
रिश्ते- नातों  के  फैले  बियाबान  में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा   किये /

टूट जाऊँ मगर  झुक  न  पाऊँगा  मैं,
अपनी आदत है यह , रुक न पाऊँगा मैं,
बंदगी तब तलक, जब तलक ज़िंदगी ,
फ़ायदा  बेवजह  क्या  तमाशा  किये ?
रिश्ते- नातों के फैले बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /
                  -  एस. एन . शुक्ल 










Wednesday, January 4, 2012

(130) फिर वही कहानी बार- बार

फिर वही कहानी बार- बार , फिर वही नाटकों सा मंचन ,
फिर से चुनाव, फिर से प्रपंच , दर- दर नेताओं का नर्तन /

फिर  स्वानों जैसी  गुर्राहट , फिर  कौवों जैसी  काँव - काँव ,
फिर सच को झूठ , झूठ को सच , साबित करने के पेच- दाँव /

फिर इश्तहार, बैनर - पोस्टर, फिर रैली, सभा, जुलूस बढ़े ,
फिर गाँव- गली में गूम रहे , जो सुविधाओं में पले - बढ़े /

फिर रंगे सियारों के चेहरे , उनके वे लग्गू - पिछलग्गू  ,
फिर उम्मीदों से ताक रहे , गोबरे, घुरहू, पेमन, खग्गू  /

फिर छल- प्रपंच, फिर जोड़ - तोड़ , फिर जाति- धर्म का गुणा- भाग ,
फिर  अपने  स्वार्थ  सिद्ध  करने  हित ,  वैमनष्य  की  वही  आग  /


फिर अय्यारी - मक्कारी के लटके- झटके , फिर सीप - साप ,
फिर  वादों , नारों  और घोषणाओं  का  बस   मिथ्या प्रलाप  /


फिर निर्दल , दल , दलबल , दलदल , फिर भांति- भांति के रचे स्वांग ,
फिर   एक - दूसरे   प्रतिद्वंदी   की ,  खीच   रहे   हैं   सभी   टाँग  /


फिर खुद को सच्चा जनसेवक , साबित करने की वही होड़ ,
फिर एक- दूसरे के खेमे में , नकबजनी , फिर  तोड़ - फोड़ /

फिर  राजनीति  के  सौदागर ,  पल- पल  में बदल रहे पाले ,
फिर वह ही शतरंजी बिशात , फिर विषधर नाग वही काले /


फिर वही कहानी बार- बार , फिर जन- गण से विश्वासघात ,
फिर  आम  आदमी  की ,  आशाओं पर होगा उल्का प्रपात  /


आखिर कब तक , इस मक्कारी - अय्यारी को झेले जनता ?
आखिर कब तक , इन  नटवरलालों  के हाथों  खेले जनता  ?



अब जाति - धर्म की राजनीति , अब दल वाली निष्ठा छोड़ो ,
फिर राष्ट्रधर्म को अपनाओ , नव गति दो , राष्ट्र दिशा मोड़ो  /

                                                - एस.एन . शुक्ल


Friday, December 30, 2011

(129) नये वर्ष की शुभ मधुर कामनायें /

                                     स्वीकारें नव वर्ष की शुभकामनायें
                                    =======================
 सभी मित्रों, शुभचिंतकों तथा पाठकों तक व्यक्तिगत नव वर्ष की  शुभकामनायें काव्यांजलि के रूप में पहुंचा रहा हूँ.  आशा है आप इन्हें स्वीकारेंगे और शुभकामनायें आप तक पहुँचीं , इसकी पुष्टि भी करेंगे /
                                                                         आप सब का - एस. एन. शुक्ल



प्रगति पथ बढ़ें , दुःख विगत के भुलायें,                                
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /

रचें नव स्रजन का , नया तंत्र  फिर से ,
जपें जागरण का ,  नया मंत्र  फिर से ,
वरें  साधना, साध्य के हित लगन से ,
करें राष्ट्र जीवन को , अभिमन्त्र फिर से ,
नया  पथ , नये  साध्य , साधन जुटायें /
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /

न आये  कोई , लोक जीवन  में  बाधा  ,
जो हो लक्ष्य , उससे मिले और ज्यादा ,
मिले  हर्ष , उत्कर्ष , सन्मार्ग  के  पथ ,
चलें साथ मिल , यह अटल हो इरादा  ,
स्वहित , सर्वहित , मन रहें भावनायें /
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /

न हो  वेदना  से  ,  कोई  सामना अब ,
न हो , स्वार्थ के सिद्धि की कामना अब,
न हो व्याधि, बाधा , किसी तन व मन में,
रहे लोक -हित , मन विमल कामना अब ,
न  हों  ,  ईर्ष्या -द्वेष   सी    कल्पनायें  /
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /

लता, तरु , विटप पुष्प- फल से भरें फिर ,
धरा,  धान्य- धन , सम्पदा  से  भरे  फिर ,
जरें ,   द्वेष - संताप    की     सर्जनाएं ,
प्रकृति  शक्तियाँ, लोक मंगल करें  फिर ,
बहें  ,  स्नेह - सौहार्द    पूरित  हवाएं  /
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /
                        - एस. एन. शुक्ल







Sunday, December 25, 2011

(128) आवाज़ लगाते रहिये /

          पत्थरों के शहर में , कितना सिर झुका के चलें ,
          उठे जो संग ,  तो  सिर  को भी  उठाते   रहिये  /

          अन्धेरा सारा मिट सकेगा , ये  मुमकिन न सही ,
          फिर भी उम्मीद की ,  इक शमअ जलाते रहिये /

          कोई   तो   तीर ,   निशाने  पे  लगेगा  आखिर ,
          ये सोचकर   ही    सही ,  तीर   चलाते   रहिये  /

          जो लड़ रहे  हैं  अंधेरों  से  ,   अकेले  न  पड़ें  ,
          उनकी आवाज़  में  , आवाज़  मिलाते रहिये /

          सियाह रात के  फिर बाद , खुशनुमा   है सहर ,
          कम से कम  इतना , दिलासा तो दिलाते रहिये /

          कोई जगे न जगे  , काम ये उनका है ,  मगर -
          तुम्हारा  फ़र्ज़  है  , आवाज़  लगाते  रहिये  /
                                             - एस. एन. शुक्ल 

Thursday, December 22, 2011

(127) आग जलवाइये /

आ गयी फिर शरद ऋतू  ठिठुरती हुई ,
आग का सेक  दे , इसको   गरमाइये /
कंप रही शीत से ,  कितनी  बेचैन  है,
गर्म कपड़े   इसे ,  थोड़े    पहनाइये  /

साथ में कुहरे , पाले  से  बच्चे  भी हैं ,
देर  तक  ये  जगेंगे ,  सतायेंगे   भी /
ये शरारत न कर पायें , सो जाएँ चुप ,
इनको गद्दे  , लिहाफों  में बहलाइए /

ताज़ा  पूडी - कचौड़ी  व छोले - करी -
में ज़रा छौंक ,   मेथी की  लगवाइए /
गुनगुनी चाय संग केक - बिस्कुट नहीं,
प्याज के कुछ  पकौड़े  भी तलवाइये /

बात है कुछ दिनों की ये , स्वागत करो,
यह अतिथि है इसे ज्यादा टिकना नहीं /
हर अतिथि देव है, अपनी संस्कृति है ये ,
इसलिए इसको   आसन दे  बिठलाइये  /

एक ही  माह  की   बात  बस  शेष  है ,
सरदी बच्चों को लेकर चली जायेगी /
फिर वसंती पवन , आयेगी सज के तन ,
साथ में , मधु- मधुर  गंध भी  लायेगी /

रात के बाद दिन , और फिर रात- दिन ,
यह समय चक्र ,  यूँ   ही चला है  सदा  /
सर्दियाँ   जायेंगी  ,   गर्मियाँ  आयेंगी  ,
तब तलक द्वार पर , आग जलवाइये  /
                           - एस. एन. शुक्ल 

Friday, December 16, 2011

(126) इनको रोकिये /

       एक थप्पड़ पे बहस इतनी, कि बस मत पूछिए
        मानों बम फिर फट पड़ा हो झवेरी बाज़ार में /
        aur जो हर रोज थप्पड़ खा रहे हैं लाखों - लाख ,
        क्या वे थप्पड़ लग रहे हैं , हुक्मरां के प्यार में ?

       जिसने मारा, उसको बेशक बंद कर दो जेल में ,
        मगर यह तो हो नहीं सकता , बगावत का ज़वाब /
        खोलिए आँखें , ये पहला वाकया भी तो नहीं,
        करवटें लेता है दिखता , फिर फ़जां में इन्कलाब /

        समझो क्यों इन्सान , गुस्से में उबलने लग गया ,
        समझो क्यों जोश -ए-ज़वानी, इस कदर है तैश में /
        ख्व़ाब में खोये रहे , समझा न रैय्यत का मिज़ाज ,
        तो   नहीं   महफूज़   रह    पाओगे ,    शाही-ऐश  में /
                                                                ----------

        सच ये थप्पड़ है, समूची हुकूमत के गाल पर ,
        सच ये है सोज़े- बगावत हुक्मरानों के खिलाफ़ /
        ज़ब   तहम्मुल  की  हदें  हैं  टूटती ,  होता है ये ,
        उठ खड़ा होता है इन्सां , साहबानों के खिलाफ़ /

        गर्म   है   माहौल ,   शोलें   हैं   जवानों   के   दिमाग़ ,
        आंधियाँ उठने को हैं , मत धूल इन पर झोंकिये /
        ज़र्रा- ज़र्रा   आग   बन   जाने   को   ज़ब   बेचैन   है ,
        हाथ ये , हथियार बन सकते हैं , इनको रोकिये /
                                        
                                                     - एस. एन. शुक्ल

      शाही-ऐश = राजभवन की विलासिता
      सोज़े- बगावत = विद्रोह की ज्वाला
      तहम्मुल = सहनशीलता
      ज़र्रा- ज़र्रा = कण- कण



Saturday, December 10, 2011

(125) ऐसा कभी खुदा न करे

तुझे  भुलाऊँ मैं , ऐसा कभी खुदा न करे /
मेरे ख़याल से सूरत तेरी  जुदा  न  करे  /

इश्क  की राह , समंदर से  बड़ी  होती है  ,
निभा सके न जिसे , ऐसा वायदा न करे /

मरीज़ मुझको, तुझे लोग  दवा  कहते हैं ,
दवा, दवा ही नहीं , जो कि फ़ायदा न करे /


इश्क की आग की , कैसे वो तपिश समझेगा ,
जिसके महबूब को , कोई कभी जुदा न करे  /

अब तो ये ज़ख्म , ये नासूर ही ज़न्नत हैं मेरी ,
मेहरबाँ  होके  इन्हें , कोई  अलहदा  न  करे  /

Sunday, December 4, 2011

(124) दामन तेरा मैला न था /

                        पहले तो  तूने  कभी  , ऐसा ज़हर उगला न था  /
                         इस तरह , दुश्मन पे भी तेरा लहू उबला न था /

                        जब खडा था तू   !  अजीजों के लिए , खंजर लिए  ,
                        क्या न कांपा था कलेजा , दिल तेरा मचला न था ?

                        यूँ शहर में आज , सन्नाटे का आलम किसलिए  ,
                        क्या इधर से आज कोई  आदमी निकला न था  ?

                        आज  तेरे भी   ज़ेहन में ,  उठ रहा  होगा   सवाल  ,
                        क्यों उधर को चल दिए , जब रास्ता अगला न था ?

                       तुम तो दुश्मन पे भी , दुश्मन सी नज़र रखते न थे ,
                       बस इसी से , आज तक -  दामन तेरा मैला न था  /

Friday, December 2, 2011

(123 ) पहले इन्सान को इन्सान बनाया जाए

                                   फिर से बदलाव का एक दौर चलाया जाए  /
                                   पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                  चाँद - तारों पे  पहुँचने लगा इन्सान मगर  ,
                                  आसमानों में भी उड़ने लगा इन्सान मगर ,
                                  यार मतलब के सभी , झूठ के रिश्ते - नाते ,
                                  भूलता जा रहा  , इन्सान को इन्सान मगर ,
                                  फिर से इन्सानियत का पाठ पढ़ाया  जाए /
                                  पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                  पहले मुश्किल थी जिन्दगी , बहुत ही किल्लत थी ,
                                  पहले  रस्ते  न थे  ,  दूरी  थी  , मगर  मिल्लत थी ,
                                  पहले  गम  और खुशी  , गैर की  भी ,  अपनी  थी ,
                                  जिन्दगी तल्ख़ भले थी  ,  मगर- न ज़िल्लत  थी ,
                                  आज  के दौर ! किसे  अपना बताया जाए  /
                                  पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                  लूट हर  ओर  मची  है , नीयत  में खामी  है,
                                  आम इन्सान की किस्मत में ही नाकामी है,
                                  अक्लमंदों को यहाँ ,खुश्क रोटियाँ मुश्किल ,
                                  हरामखोर  !    बड़े  हैं ,     बड़ा   हरामी   है ,
                                  हर गुनहगार  को  औकात में लाया जाए /
                                  पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                                                    - S. N. Shukla