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Tuesday, January 17, 2012

(133) शल्य चिकित्सक की दरकार है /

देश की बिगड़ी जो कहानी है/
यह सियासत की मेहरबानी है /
लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार ही अभिशाप है,
किन्तु राजनीति तो उसका भी बाप है /
यहाँ बेतरह भाई - भतीजावाद है ,
परिवारवाद है, रिश्तेदारावाद है ,
और उससे भी बढ़कर -
राजनैतिक अवसरवाद है /
राजनेता !
तिकड़म के बीज बोते हैं ,
अलगाववाद की पौध उगाते -
और अवसरवाद की फसल काटते हैं /
वे प्रशासन से लेकर समाज तक -
अपने स्वार्थ साधने के लिए,
लोगों को फिरकों में बाटते हैं /
आम आदमी की भावनाओं से खेलते -
और एक दूसरे की गोद में बैठ -
तिकड़म की मलाई चाटते हैं/
रिश्वत इसी अवसरवाद की औलाद है ,
पत्नी बेवफाई है /
छल , प्रपंच, झूठ , मक्कारी जैसे भाई- भतीजे ,
और इसकी माँ खुद हरजाई है /
ढकोसलेबाजी और हेरा-फेरी ,
इस अवसरवाद की दादी- नानी है /
इसीलिये -
राजनीतिबाजों की आँखों का मर चुका पानी है /
यहाँ शाक- भाजी के भाव बिकता है ज़मीर /
घोर सैद्धांतिक विरोधियों की गठबंधन सरकारें ,
क्या इससे बड़ी हो सकती है-
अवसरवाद की दूसरी नजीर ?
ईमानदारी , नैतिकता और आदर्श ,
राजनीति के क्रीत दास हैं /
जो फटेहाल , चीथड़ों में -
इस देश के नंगे- भूखों के पास हैं /
आप राजनेताओं से -
भ्रष्टाचार से लड़ने की अपेक्षा करते हैं ?
अरे सिद्धांत और नैतिकता तो-
यहाँ पानी भरते हैं /
सड़ चुका है भ्रष्टाचार का घाव ,
और देश -
मरणासन्न सा बीमार है /
इसे वैद्य की दवा की नहीं-
किसी शल्य चिकित्सक की दरकार है /
जो सड़े अंग को -
बेरहमी से काट सके /
और लोकतंत्र पर छा चुके ,
काले बादलों को छाँट सके /
            - एस.एन.शुक्ल

Saturday, January 14, 2012

(132) पति बनते- बनते रह गए थे /

कुछ ही दिन पूर्व , मेरी हुयी सगाई थी /
और मेरे जीवन में पहली बार-
भावी पत्नी से मिलन की घड़ी आई थी/
उसने मुझे पांच बजे वोल्गा में बुलाया था /
किन्तु मेरी घड़ी ने -
अभी चार का ही घंटा बजाया था /
मैनें पहली बार जाना -
आदमी कितना चाक- चौबंद हो जाता है,
शादी क्या -
सगाई के बाद से ही ,
समय का कितना पाबन्द हो जाता है /
बेकरारी में , मैंने ज्यों ही -
पान की दूकान के अर्ध आदमकद दर्पण की ओर,
अपना चेहरा घुमाया /
त्यों ही - मेरे कालेज का सहपाठी ,
राकेश मुझसे आ टकराया /
उसने आते ही पीठ पर धौल जमाई /
बरबस पूछना ही पड़ा , कैसी भाई ?
उसने बताया -
यार मेरी प्रेमिका , शीघ्र ही होने वाली पराई है /
इसीलिये , आख़िरी बार मुझसे मिलाने आई है /
आओ तुम्हे अपनी पसंद दिखाते हैं,
अपनी, भूतपूर्व होने जा रही प्रेमिका से -
तुम्हारा परिचय कराते हैं/
मेरे न चाहते हुए भी -
वह मुझे खींच लाया /
और मेरे अज़ीज़ दोस्त --------
कहते हुए -
उसने अपनी प्रेमिका से , मेरा परिचय कराया /
किन्तु मैं हतप्रभ ठगा सा ,
और वह शर्म से तार- तार थी /
क्योंकि उसकी प्रेमिका ही -
मेरी भावी जीवन नैया की पतवार थी /
मेरे सपनों के महल -
ढह गए थे /
और हम, एक बार फिर -
पति बनते- बनते रह गए थे /
                   -एस.एन.शुक्ल

Wednesday, January 11, 2012

(131) मंजिलों को तलाशा किये /

मन में पाले भरम, उसका होगा करम ,
बस  भटकते  रहे ,  एक आशा  लिए /
रिश्ते- नातों के फैले  बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /

ठोकरें ही मिलीं, हम जिधर भी गए ,
फिर भी हर बार  रस्ते तलाशे नए ,
खाइयों को रहे  पाटते   उम्र  भर,
उम्र भर संग खुद ही तराशा किये /
रिश्ते- नातों के फैले बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /

वह सितमगर है तो मैं भी  गमख्वार  हूँ ,
क्या करूँ , अपनी  आदत  से  लाचार हूँ ,
उसकी नफ़रत को , चाहत में दूंगा बदल,
क्या जिए , गर जिए मन निराशा लिए /
रिश्ते- नातों  के  फैले  बियाबान  में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा   किये /

टूट जाऊँ मगर  झुक  न  पाऊँगा  मैं,
अपनी आदत है यह , रुक न पाऊँगा मैं,
बंदगी तब तलक, जब तलक ज़िंदगी ,
फ़ायदा  बेवजह  क्या  तमाशा  किये ?
रिश्ते- नातों के फैले बियाबान में,
हम सदा मंजिलों को तलाशा किये /
                  -  एस. एन . शुक्ल 










Wednesday, January 4, 2012

(130) फिर वही कहानी बार- बार

फिर वही कहानी बार- बार , फिर वही नाटकों सा मंचन ,
फिर से चुनाव, फिर से प्रपंच , दर- दर नेताओं का नर्तन /

फिर  स्वानों जैसी  गुर्राहट , फिर  कौवों जैसी  काँव - काँव ,
फिर सच को झूठ , झूठ को सच , साबित करने के पेच- दाँव /

फिर इश्तहार, बैनर - पोस्टर, फिर रैली, सभा, जुलूस बढ़े ,
फिर गाँव- गली में गूम रहे , जो सुविधाओं में पले - बढ़े /

फिर रंगे सियारों के चेहरे , उनके वे लग्गू - पिछलग्गू  ,
फिर उम्मीदों से ताक रहे , गोबरे, घुरहू, पेमन, खग्गू  /

फिर छल- प्रपंच, फिर जोड़ - तोड़ , फिर जाति- धर्म का गुणा- भाग ,
फिर  अपने  स्वार्थ  सिद्ध  करने  हित ,  वैमनष्य  की  वही  आग  /


फिर अय्यारी - मक्कारी के लटके- झटके , फिर सीप - साप ,
फिर  वादों , नारों  और घोषणाओं  का  बस   मिथ्या प्रलाप  /


फिर निर्दल , दल , दलबल , दलदल , फिर भांति- भांति के रचे स्वांग ,
फिर   एक - दूसरे   प्रतिद्वंदी   की ,  खीच   रहे   हैं   सभी   टाँग  /


फिर खुद को सच्चा जनसेवक , साबित करने की वही होड़ ,
फिर एक- दूसरे के खेमे में , नकबजनी , फिर  तोड़ - फोड़ /

फिर  राजनीति  के  सौदागर ,  पल- पल  में बदल रहे पाले ,
फिर वह ही शतरंजी बिशात , फिर विषधर नाग वही काले /


फिर वही कहानी बार- बार , फिर जन- गण से विश्वासघात ,
फिर  आम  आदमी  की ,  आशाओं पर होगा उल्का प्रपात  /


आखिर कब तक , इस मक्कारी - अय्यारी को झेले जनता ?
आखिर कब तक , इन  नटवरलालों  के हाथों  खेले जनता  ?



अब जाति - धर्म की राजनीति , अब दल वाली निष्ठा छोड़ो ,
फिर राष्ट्रधर्म को अपनाओ , नव गति दो , राष्ट्र दिशा मोड़ो  /

                                                - एस.एन . शुक्ल


Friday, December 30, 2011

(129) नये वर्ष की शुभ मधुर कामनायें /

                                     स्वीकारें नव वर्ष की शुभकामनायें
                                    =======================
 सभी मित्रों, शुभचिंतकों तथा पाठकों तक व्यक्तिगत नव वर्ष की  शुभकामनायें काव्यांजलि के रूप में पहुंचा रहा हूँ.  आशा है आप इन्हें स्वीकारेंगे और शुभकामनायें आप तक पहुँचीं , इसकी पुष्टि भी करेंगे /
                                                                         आप सब का - एस. एन. शुक्ल



प्रगति पथ बढ़ें , दुःख विगत के भुलायें,                                
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /

रचें नव स्रजन का , नया तंत्र  फिर से ,
जपें जागरण का ,  नया मंत्र  फिर से ,
वरें  साधना, साध्य के हित लगन से ,
करें राष्ट्र जीवन को , अभिमन्त्र फिर से ,
नया  पथ , नये  साध्य , साधन जुटायें /
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /

न आये  कोई , लोक जीवन  में  बाधा  ,
जो हो लक्ष्य , उससे मिले और ज्यादा ,
मिले  हर्ष , उत्कर्ष , सन्मार्ग  के  पथ ,
चलें साथ मिल , यह अटल हो इरादा  ,
स्वहित , सर्वहित , मन रहें भावनायें /
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /

न हो  वेदना  से  ,  कोई  सामना अब ,
न हो , स्वार्थ के सिद्धि की कामना अब,
न हो व्याधि, बाधा , किसी तन व मन में,
रहे लोक -हित , मन विमल कामना अब ,
न  हों  ,  ईर्ष्या -द्वेष   सी    कल्पनायें  /
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /

लता, तरु , विटप पुष्प- फल से भरें फिर ,
धरा,  धान्य- धन , सम्पदा  से  भरे  फिर ,
जरें ,   द्वेष - संताप    की     सर्जनाएं ,
प्रकृति  शक्तियाँ, लोक मंगल करें  फिर ,
बहें  ,  स्नेह - सौहार्द    पूरित  हवाएं  /
नये वर्ष  की  शुभ -  मधुर  कामनायें /
                        - एस. एन. शुक्ल







Sunday, December 25, 2011

(128) आवाज़ लगाते रहिये /

          पत्थरों के शहर में , कितना सिर झुका के चलें ,
          उठे जो संग ,  तो  सिर  को भी  उठाते   रहिये  /

          अन्धेरा सारा मिट सकेगा , ये  मुमकिन न सही ,
          फिर भी उम्मीद की ,  इक शमअ जलाते रहिये /

          कोई   तो   तीर ,   निशाने  पे  लगेगा  आखिर ,
          ये सोचकर   ही    सही ,  तीर   चलाते   रहिये  /

          जो लड़ रहे  हैं  अंधेरों  से  ,   अकेले  न  पड़ें  ,
          उनकी आवाज़  में  , आवाज़  मिलाते रहिये /

          सियाह रात के  फिर बाद , खुशनुमा   है सहर ,
          कम से कम  इतना , दिलासा तो दिलाते रहिये /

          कोई जगे न जगे  , काम ये उनका है ,  मगर -
          तुम्हारा  फ़र्ज़  है  , आवाज़  लगाते  रहिये  /
                                             - एस. एन. शुक्ल 

Thursday, December 22, 2011

(127) आग जलवाइये /

आ गयी फिर शरद ऋतू  ठिठुरती हुई ,
आग का सेक  दे , इसको   गरमाइये /
कंप रही शीत से ,  कितनी  बेचैन  है,
गर्म कपड़े   इसे ,  थोड़े    पहनाइये  /

साथ में कुहरे , पाले  से  बच्चे  भी हैं ,
देर  तक  ये  जगेंगे ,  सतायेंगे   भी /
ये शरारत न कर पायें , सो जाएँ चुप ,
इनको गद्दे  , लिहाफों  में बहलाइए /

ताज़ा  पूडी - कचौड़ी  व छोले - करी -
में ज़रा छौंक ,   मेथी की  लगवाइए /
गुनगुनी चाय संग केक - बिस्कुट नहीं,
प्याज के कुछ  पकौड़े  भी तलवाइये /

बात है कुछ दिनों की ये , स्वागत करो,
यह अतिथि है इसे ज्यादा टिकना नहीं /
हर अतिथि देव है, अपनी संस्कृति है ये ,
इसलिए इसको   आसन दे  बिठलाइये  /

एक ही  माह  की   बात  बस  शेष  है ,
सरदी बच्चों को लेकर चली जायेगी /
फिर वसंती पवन , आयेगी सज के तन ,
साथ में , मधु- मधुर  गंध भी  लायेगी /

रात के बाद दिन , और फिर रात- दिन ,
यह समय चक्र ,  यूँ   ही चला है  सदा  /
सर्दियाँ   जायेंगी  ,   गर्मियाँ  आयेंगी  ,
तब तलक द्वार पर , आग जलवाइये  /
                           - एस. एन. शुक्ल 

Friday, December 16, 2011

(126) इनको रोकिये /

       एक थप्पड़ पे बहस इतनी, कि बस मत पूछिए
        मानों बम फिर फट पड़ा हो झवेरी बाज़ार में /
        aur जो हर रोज थप्पड़ खा रहे हैं लाखों - लाख ,
        क्या वे थप्पड़ लग रहे हैं , हुक्मरां के प्यार में ?

       जिसने मारा, उसको बेशक बंद कर दो जेल में ,
        मगर यह तो हो नहीं सकता , बगावत का ज़वाब /
        खोलिए आँखें , ये पहला वाकया भी तो नहीं,
        करवटें लेता है दिखता , फिर फ़जां में इन्कलाब /

        समझो क्यों इन्सान , गुस्से में उबलने लग गया ,
        समझो क्यों जोश -ए-ज़वानी, इस कदर है तैश में /
        ख्व़ाब में खोये रहे , समझा न रैय्यत का मिज़ाज ,
        तो   नहीं   महफूज़   रह    पाओगे ,    शाही-ऐश  में /
                                                                ----------

        सच ये थप्पड़ है, समूची हुकूमत के गाल पर ,
        सच ये है सोज़े- बगावत हुक्मरानों के खिलाफ़ /
        ज़ब   तहम्मुल  की  हदें  हैं  टूटती ,  होता है ये ,
        उठ खड़ा होता है इन्सां , साहबानों के खिलाफ़ /

        गर्म   है   माहौल ,   शोलें   हैं   जवानों   के   दिमाग़ ,
        आंधियाँ उठने को हैं , मत धूल इन पर झोंकिये /
        ज़र्रा- ज़र्रा   आग   बन   जाने   को   ज़ब   बेचैन   है ,
        हाथ ये , हथियार बन सकते हैं , इनको रोकिये /
                                        
                                                     - एस. एन. शुक्ल

      शाही-ऐश = राजभवन की विलासिता
      सोज़े- बगावत = विद्रोह की ज्वाला
      तहम्मुल = सहनशीलता
      ज़र्रा- ज़र्रा = कण- कण



Saturday, December 10, 2011

(125) ऐसा कभी खुदा न करे

तुझे  भुलाऊँ मैं , ऐसा कभी खुदा न करे /
मेरे ख़याल से सूरत तेरी  जुदा  न  करे  /

इश्क  की राह , समंदर से  बड़ी  होती है  ,
निभा सके न जिसे , ऐसा वायदा न करे /

मरीज़ मुझको, तुझे लोग  दवा  कहते हैं ,
दवा, दवा ही नहीं , जो कि फ़ायदा न करे /


इश्क की आग की , कैसे वो तपिश समझेगा ,
जिसके महबूब को , कोई कभी जुदा न करे  /

अब तो ये ज़ख्म , ये नासूर ही ज़न्नत हैं मेरी ,
मेहरबाँ  होके  इन्हें , कोई  अलहदा  न  करे  /

Sunday, December 4, 2011

(124) दामन तेरा मैला न था /

                        पहले तो  तूने  कभी  , ऐसा ज़हर उगला न था  /
                         इस तरह , दुश्मन पे भी तेरा लहू उबला न था /

                        जब खडा था तू   !  अजीजों के लिए , खंजर लिए  ,
                        क्या न कांपा था कलेजा , दिल तेरा मचला न था ?

                        यूँ शहर में आज , सन्नाटे का आलम किसलिए  ,
                        क्या इधर से आज कोई  आदमी निकला न था  ?

                        आज  तेरे भी   ज़ेहन में ,  उठ रहा  होगा   सवाल  ,
                        क्यों उधर को चल दिए , जब रास्ता अगला न था ?

                       तुम तो दुश्मन पे भी , दुश्मन सी नज़र रखते न थे ,
                       बस इसी से , आज तक -  दामन तेरा मैला न था  /

Friday, December 2, 2011

(123 ) पहले इन्सान को इन्सान बनाया जाए

                                   फिर से बदलाव का एक दौर चलाया जाए  /
                                   पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                  चाँद - तारों पे  पहुँचने लगा इन्सान मगर  ,
                                  आसमानों में भी उड़ने लगा इन्सान मगर ,
                                  यार मतलब के सभी , झूठ के रिश्ते - नाते ,
                                  भूलता जा रहा  , इन्सान को इन्सान मगर ,
                                  फिर से इन्सानियत का पाठ पढ़ाया  जाए /
                                  पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                  पहले मुश्किल थी जिन्दगी , बहुत ही किल्लत थी ,
                                  पहले  रस्ते  न थे  ,  दूरी  थी  , मगर  मिल्लत थी ,
                                  पहले  गम  और खुशी  , गैर की  भी ,  अपनी  थी ,
                                  जिन्दगी तल्ख़ भले थी  ,  मगर- न ज़िल्लत  थी ,
                                  आज  के दौर ! किसे  अपना बताया जाए  /
                                  पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                  लूट हर  ओर  मची  है , नीयत  में खामी  है,
                                  आम इन्सान की किस्मत में ही नाकामी है,
                                  अक्लमंदों को यहाँ ,खुश्क रोटियाँ मुश्किल ,
                                  हरामखोर  !    बड़े  हैं ,     बड़ा   हरामी   है ,
                                  हर गुनहगार  को  औकात में लाया जाए /
                                  पहले  इन्सान को   इन्सान बनाया जाए  /

                                                                    - S. N. Shukla

Tuesday, November 29, 2011

(122) मंजिल तलाशते रहे ....

मंजिल तलाशते रहे , परछाइयों के साथ  /
उगते रहे बबूल भी  ,  अमराइयों के साथ  /

सीने पे  ज़ख्म  खा के भी ,  खामोश  है कोई ,
अब गम मना रहे हैं वो , शहनाइयों के साथ  /

तब छाँव की तलाश में , दर- दर भटक रहे ,
जब शायबान उड़ गए  , पुरवाइयों के साथ  /

चाहत की बात का न तकाजा वो अब रहा  ,
हैं ख्वाहिशें दफ़न यहाँ , गहराइयों के साथ /

ताजिस्त वस्ल- ए - यार मयस्सर न हो सका ,
यह ज़िंदगी गुजर गई ,  तनहाइयों  के  साथ  /

Sunday, November 27, 2011

(121) दास्तां बदलो

अन्धेरा घिर न आये दोस्तों, बुझती शमां बदलो /
चमन गुलज़ार कर पाए न , ऐसा बागवाँ बदलो  /

 दिलों  में जल रही है आग ,   कैसी कसमसाहट  है,
ज़माना , चाहता कुछ कर गुजरना है , समां बदलो /

न ज्यादा आजमाने की , ज़रुरत रह गई  इनको ,
गुज़र जाएँ न लमहे , वक़्त रहते राजदां  बदलो  /

तसल्ली कब  तलक होगी भला झूठे दिलासों से ,
अगर बरसें न ये बादल , तो सारा आसमां बदलो /

दिया तब पीठ पर खंजर, इन्हें जब भी मिला मौक़ा ,
लुटेरे  काफिले  का   साथ  छोडो  , कारवां बदलो  /

ये इस्पाती घड़े हैं  , जुर्म से भर जायेंगे , फिर भी  ,
न टूटेंगे  ,  इन्हें तोड़ो  ,   पुरानी  दास्तां   बदलो  /


                                             - S. N. Shukla

Tuesday, November 22, 2011

(120) जिस्म इन्सान के गोलियाँ बन गए-----

जिस्म इन्सान के गोलियाँ बन गए , और बदलती रहीं पालियाँ उम्र भर /
गुल, गुलिस्तान के आह भरते रहे  , कसमसाती  रहीं  डालियाँ  उम्र भर /

अपने खाली कटोरे सिसकते रहे,  उनकी मेजों पे चम्मच खनकते रहे ,
बाग़ वे सब्ज हमको दिखाते रहे  , हम बजाते रहे तालियाँ  उम्र  भर  /

देने वाले निवालों को मोहताज़ हैं , माँगने वाले सर पर रखे ताज हैं ,
हम गुनहगार जैसे भुगतते रहे  ,  वे  उठाते  रहे  उँगलियाँ उम्र भर  /

मेरे घर खोदकर बन गयीं  कोठियाँ, आदमी से बड़ी हो गयीं रोटियाँ ,
हम बचाते रहे टूटता संग- ए - दर , वे गिराते रहे बिजलियाँ उम्र भर /

कितना ढाएँगे वे जुल्म और कब तलक, एक दिन वे भी तो ख़ाक में जायेंगे ,
जो जला वह बुझा , जो फरा सो झरा , सोच सहते  रहे  गालियाँ  उम्र भर  /

जिस्म इंसान के गोलियाँ बन गए  , और बदलती रहीं पालियाँ उम्र भर /
                
                                                                        -S.N.Shukla

Wednesday, November 16, 2011

(119) तम भरी बदली टलेगी /

प्रकृति का है नियम परिवर्तन , अगर यह सत्य तो फिर ,
जो फरा   वह है झरा भी ,   सत्य है   यह तथ्य तो फिर ,
किसलिए मन में निराशा, भय , हताशा, खेद, सम्भ्रम,
जटिलता की   यह घड़ी भी  , क्या सदा यूँ  ही चलेगी  ?

मनुज के कृत कर्म से ,  माना समय   बलवान होता ,
किन्तु यह भी सत्य है  , हर उदय का अवसान होता ,
देव गति के सामने  ,  होती विवशता  हर किसी की ,
अवशता की अग्नि भी , उर में भला कब तक जलेगी ?

फल प्रकृति आधीन है , पर कर्म पर अधिकार तेरा ,
नियति भी झुकती उन्हीं से, तोड़ते जो विषम घेरा  ,
शुष्क पौधों को निराता - सींचता   यह सोच माली ,
कर्म कृषि अपने समय पर , एक दिन निश्चय फलेगी/

दैन्यता , असहायता का ,  दंश भी सह लो ह्रदय पर ,
ध्यान रखना, क्रोध या अविवेक मत छाये विनय पर ,
शील, साहस ने सदा ही , विजय पायी है समय से  ,
सूर्य  फिर होगा प्रभामय , तम भरी बदली टलेगी  /

Friday, November 11, 2011

(118) फिर अन्धेरा दौर

भूलना कर्तव्य को , अधिकार की बातें हमेशा ,
इस समूचे देश में , हर वर्ग का बस एक पेशा ,
दंभ का कुहरा , विनय की चाँदनी पर छा गया है ,
फिर अँधेरा दौर कैसा  ,  इस धरा पर आ गया है ?

कर रहा छल- छद्म , जैसे हर नगर में आज फेरा ,
बन रहे  अपने , पराये ,   स्वार्थ का हर और डेरा ,
स्वान का सा धर्म , अब मानव मानों को भा गया है ,
फिर अँधेरा दौर  कैसा  ,  इस धरा पर आ गया है ?

आधुनिकता की  डगर में ,  टूटते रिश्ते पुराने ,
पालकों तक के हुए अब , आज सब चेहरे अजाने ,
अंधड़ों में फँस यहाँ ,  हर आदमी छितरा गया है ,
फिर अँधेरा दौर कैसा  ,  इस धरा पर आ गया है ?

पागलों से घूमते हम , शस्त्र अपनों पर उठाये ,
क्या अमिय का अर्थ , जब विषकुम्भ निज उर में छिपाए?
दुष्टता का दैत्य  !  मानवता ह्रदय की खा गया है ,
फिर अँधेरा दौर कैसा  ,  इस धरा पर आ गया है ?

                                              - S. N. Shukla

Monday, November 7, 2011

(117) हथियार संभालो

आज अहिंसा  नहीं जवानों  ,  हाथों में हथियार  संभालो /
लुटता देश और तुम चुप हो , खुद अपनी पतवार संभालो / 


रिरियाते - मिमियाते से स्वर, और याचना की मुद्राएँ  ,
दैन्य, दासता , जाति - धर्म की , ये ओछी-थोथी सीमाएँ,
तोड़ो, छोड़ो झूठे बंधन ,  सबल बनो , अधिकार संभालो /
लुटता देश और तुम चुप हो , खुद अपनी पतवार संभालो /


दाता, दीन- हीन फिरते हैं ,   याचक हैं महलों के वासी ,
मूर्खराज का वंदन करती , प्रतिभा बन चरणों की दासी ,
आगे और अनीति नहीं अब , विषपायी तलवार संभालो /
लुटता देश और तुम चुप हो , खुद अपनी पतवार संभालो /


कन्धों पर चढ़कर औरों के , पार करो मत गहरे जल को ,
जीवन की   गंभीर भंवर में  , कंधे  साथ न  देंगे कल को ,
बनो सफल तैराक स्वयं , औरों को भी उस पार निकालो /
लुटता देश और तुम चुप हो , खुद अपनी पतवार संभालो /












                                                              S.N.Shukla

Friday, November 4, 2011

(116 ) गज़ब वो शिल्पकार है /

ये सस्य- श्यामला धरा, ये नीलिमा लिए गगन, 
ये तारकों भरी निशा , सुबह की मद भरी पवन,
ये शीत, ताप,  मेह ,   अंधकार में ,   प्रकाश में ,
ये हिम ,   नदी प्रवाह और शुभ्र   जलप्रपात में,
ये सूर्य- चन्द्र रश्मियों में ,जिसका साहकार है/
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /

हरी- भरी ये वादियाँ,   पहाड़ ये   तने - तने ,
ये लहलहाते खेत और बाग़- वन घने - घने ,
वो जिसने रत्न   हैं   धरा के गर्भ में छुपा धरे ,
वो जिसके हर प्रयत्न हैं , मनुष्य बुद्धि से परे ,
जलधि तरंग को ,  उछालता जो बार- बार है  /
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /

असीम वारि राशि से, भरे हुए समुद्र ये ,
समुद्र के विशालकाय और जंतु छुद्र ये  ,
ये व्योम, वायु ,अग्नि,वारि , भूमि पंचतत्व से,
रचाया प्राणिमात्र को ,   विधान से, ममत्व से ,
किया उसी ने,  जीवनीय शक्ति का संचार है /
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /

रचे उसी   ने  जीव  और जंतु   हर प्रजाति के ,
रचे उसी ने अन्न , फल व पुष्प भाँति- भाँति के ,
रचा उसी ने धूप- छाँव , मेघ की फुहार को ,
रचा उसी ने वायु को, वसंत की बहार  को ,
किया उसी ने रंग, गंध , स्वाद का प्रसार है /
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /

Tuesday, November 1, 2011

(115) नारी की नियति विवशता है /

वह पिता और पति, पुत्रों क्या , जन - जन के द्वारा त्रस्ता है /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

था छला अहिल्या को जिसने, वह देवराज कहलाता है,
जननी हंता उस परशुराम का , सारा जग यश गाता है,
सोलह हजार रानी वाला ,  भगवान कहाया जाता है ,
पत्नी का दाँव लगाने वाला , धर्मराज पद पाता है ,
केवल नारी के ही जीवन में, यह कैसी परवशता है ?
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

हर युग में नारी का शोषण, इतिहास गवाही देता है ,
त्रेता , द्वापर में भी उसका , चीत्कार सुनायी देता है  ,
उस शेषनाग अवतारी ने , काटे नारी के  नाक- कान ,
रावण सा पंडित , ज्ञानी , छल से पर नारी हर लेता है ,
कापुरुष तलक बनकर भुजंग, बस नारी को ही डसता है /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

सीता की अग्नि परीक्षा ली ,  फिर भी न राम ने अपनाया ,
अम्बा को भीष्म महाबल से , क्यों भरी सभा से हर लाया ?
क्या द्रुपद सुता थी वस्तु , कि जिसको पाँच भाइयों ने बाँटा ?
पुरुषार्थ , विवश अबला पर ही , क्यों दुस्साशन ने अजमाया ?
अवसाद, घृणा या तिरस्कार से ही नारी का रिश्ता है /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

था पुरुष प्रधान समाज आदि से, नारी भोग्या कहलाई ,
बहुपत्नी नर कर लेता था, नारी कब बहुपति कर पायी ?
पति चिता मध्य पत्नी जलती थी, पति पर नहीं बाध्यता थी ,
नर रहा सदा ही मूल्यवान , नारी का जीवन सस्ता है  /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

वस्तु की भाँति बिकती थीं वे, ग्रंथों में इसका लेखा है ,
धन, धरा और नारी के कारण , ही युद्धों को  देखा है  ,
बालिका जन्मते ही ,  उसका वध कर देते थे राजपूत  ,
घर की चहारदीवारी ही, उसकी बस सीमा रेखा है ,
पर दया - धर्म , ममता , मृदुता , तब भी नारी में बसता है /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /

सडकों, गलियों में छेड़छाड़ , भीड़ों में शीलहीन फिकरे ,
क्या राजनीति, क्या लोकरीति , नारी चरित्र के ही जिकरे ,
क्यों नारी के ही हिस्से में, ह्त्या, अपहरण , बलात्कार ,
ज्यों चील झपटती चूहों पर, ज्यों कबूतरों पर हों शिकरे ,
नारी भ्रूणों की ह्त्या कर , नर फिरता बना फरिस्ता है  /
बचपन , यौवन से अंत तलक , नारी की नियति विवशता है /




Saturday, October 29, 2011

(114) तो क्या ?

अँधेरे चारों तरफ फिर वही, जो पहले थे,
एक गर रात , रोशनी में नहाई  तो क्या ?

जश्न की रात, रात भर हुई  आतिशबाजी ,
दिवाली एक रोज के लिए , आई तो क्या ?

उनसे पूछो , कि जिनके घर नहीं जले चूल्हे ,
शब किन्हीं की रही , प्यालों में समाई तो क्या ?

नकारखाने  में , तूती   के  मायने क्या हैं ,
कहीं आवाज भी, पड़ी जो सुनाई  तो क्या ?

साल में एक नहीं, तीन सौ पैंसठ दिन हैं ,
बलात एक दिन , रौनक कहीं आई तो क्या ?

रोशनी वो जो , हर बशर पे एक सा बरसे,
अधूरी रोशनी , फिर आई न आई तो क्या ?

                           - एस. एन.शुक्ल