ये सस्य- श्यामला धरा, ये नीलिमा लिए गगन,
ये तारकों भरी निशा , सुबह की मद भरी पवन,
ये शीत, ताप, मेह , अंधकार में , प्रकाश में ,
ये हिम , नदी प्रवाह और शुभ्र जलप्रपात में,
ये सूर्य- चन्द्र रश्मियों में ,जिसका साहकार है/
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /
हरी- भरी ये वादियाँ, पहाड़ ये तने - तने ,
ये लहलहाते खेत और बाग़- वन घने - घने ,
वो जिसने रत्न हैं धरा के गर्भ में छुपा धरे ,
वो जिसके हर प्रयत्न हैं , मनुष्य बुद्धि से परे ,
जलधि तरंग को , उछालता जो बार- बार है /
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /
असीम वारि राशि से, भरे हुए समुद्र ये ,
समुद्र के विशालकाय और जंतु छुद्र ये ,
ये व्योम, वायु ,अग्नि,वारि , भूमि पंचतत्व से,
रचाया प्राणिमात्र को , विधान से, ममत्व से ,
किया उसी ने, जीवनीय शक्ति का संचार है /
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /
रचे उसी ने जीव और जंतु हर प्रजाति के ,
रचे उसी ने अन्न , फल व पुष्प भाँति- भाँति के ,
रचा उसी ने धूप- छाँव , मेघ की फुहार को ,
रचा उसी ने वायु को, वसंत की बहार को ,
किया उसी ने रंग, गंध , स्वाद का प्रसार है /
अजब वो चित्रकार है , गज़ब वो शिल्पकार है /



















