प्रेम की बाती पिरोकर , बुझ रहे दीपक जलाएं /
शान्ति का सन्देश ले , हर वर्ष आती दीपमाला ,
पर तिमिर घटता नहीं, मन में नहीं होता उजाला ,
इस तिमिर को तेल- घृत दीपक, मिटा सकते नहीं हैं,
मनुजता के दीप, फिर बंधुत्व के घृत से सजाएं /
रोशनी का पर्व ! आओ हम सभी मिलकर मनाएं /
व्योम से आकर धरा पर, खिल रहे हैं आज तारे ,
साथ मिलकर एकता का , दे रहे सन्देश सारे ,
सोचिये!क्या कह रहे ये,क्या समय की माँग इस क्षण,
कह रहे, मानव मनों की आपसी कटुता मिटायें /
रोशनी का पर्व ! आओ हम सभी मिलकर मनाएं /
तैरते ये दीप जल पर, शान्ति की लय छेड़ते हैं ,
सौम्यता, सौहार्द से , वातावरण को जोड़ते हैं ,
सीख लें इनसे , सुह्र्द्ता , सौम्यता की,सरलता की ,
मित्रता के पुष्प , जीवन वाटिका में फिर खिलाएं /
रोशनी का पर्व ! आओ हम सभी मिलकर मनाएं /
कुटिलता के गर्त से , हर व्यक्ति का चेहरा सना है,
कलुष का साम्राज्य है, संताप का कुहरा घना है ,
इस कुहासे को मिटाना ही, सभी का लक्ष्य हो अब ,
यूँ प्रज्वल्लित करें दीपक,धरा ज्योतिर्मय बनाएं!
रोशनी का पर्व ! आओ हम सभी मिलकर मनाएं /
-S. N. SHUKLA
-S. N. SHUKLA


















