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Saturday, July 23, 2011

(83) जीवन की सच्चाई

बचपन ! गोद, पालने और खेल में 
कैशोर्य ! पढ़ाई में 
तरुणायी ! प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा की दौड़ में 
परिपक्वता ! पत्नी और बच्चों की फरमाइशों में 
प्रौढ़ावस्था ! संतानों का भविष्य संवारने में
और बुढ़ापा -
घर- परिवार को एकजुट रखने में ,
रिश्तों को निभाने में ,
अवशेष को संवारने में बीत जाता है /
आदमी -
अपने लिए कब जी पाता है ?
वह सारी जिन्दगी -
कोल्हू के बैल सा खटता है /
जिन्दगी के ताने , उलाहने और समय के थपेड़ों में -
लगातार टुकड़े- टुकड़े बटता है  /
इस आपाधापी में -
वह जाने क्या - क्या सहता है /
फिर उसे अपना -
अपने खुद के कुछ होने का ध्यान कहाँ रहता है  ?
जीवन संध्या में, जब वह -
जिन्दगी का हिसाब जोड़ता - घटाता है ,
तो अपने पीछे -
बस केवल रिक्ति ही रिक्ति पाता है  /
यही मानव जीवन की सच्चाई है ,
जहाँ एक ओर कुआँ है -
और दूसरी ओर खाई है  /      

Tuesday, July 19, 2011

(82) नाचता तब मन हमारा

जब मचलती व्योम से , भू पर उतरती वारि धारा ,
मेह   की बूदों के संग- संग नाचता तब मन हमारा  .

पत्तियों को छू ,उतर कर टहनियों से , डालियों पर ,
द्रवित होकर बूँद ढलती, जब उतरती है धरा पर ,
फिर सहज बहती है पहले मंद, फिर गतिमान होकर ,
हुलसती अपनों से मिल वह, थिरकती निज मान खोकर ,
हर्ष ध्वनि करती हुई, नद  धार से मिलती है धारा .
 मेह की बूंदों के संग- संग नाचता तब मन हमारा .


वर्षा रानी का प्रकृति से मिलन या अभिसार भू पर ,
वह टपा- टप पाद स्वर , पाजेब की झनकार मनहर ,
दादुरों की तान के संग, कोकिला का राग सस्वर ,
वह छपा- छप थाप  संग झींगुर बजाते वाद्य  झांझर ,
और नभ में मेघदूतों का जभी बजता नगारा
मेह की बूंदों के संग-संग नाचता तब मन हमारा.

रंग धानी, अंग धानी, कुसुम कलि के झंग धानी,
और ज्यों सावन के रंग में, प्रकृति का हर रंग धानी,
उल्लसित, पुलकित ह्रदय थल, आर्द्र तन तो आर्द्रतम मन,
मात्र वातावरण में ही नहीं, उर में खिले सावन ,
झूलता सावन के झूले में लगे जब विश्व सारा,
मेह की बूंदों के संग-संग नाचता तब मन हमारा.

Sunday, July 17, 2011

(81) आतंक

आखिर क्यों होते हैं बार-बार आतंकी हमले ?
क्यों मच जाती है अचानक अफरा- तफरी ?
क्यों चीखों में बदल जाती हैं आवाजें ?
क्यों हंसती- खेलती जिंदगियां -
बदल जाती हैं लाशों में ?
कहते हैं, आतंक का कोई मजहब नहीं होता ,
लेकिन मकसद तो होता होगा ?
वह मकसद क्या है -
वहशीपन, दरिन्दगी ,
नफ़रत या पैसा ,
मूर्खता या राष्ट्रद्रोह ?
आतंकी घटनाओं में  हो सकती है विदेशी साजिश ,
लेकिन हाथ नहीं /
वे हाथ प्रायः देशी होते हैं /
ये, वे कुत्ते हैं-
जो अपना ही खून चाटकर आनंदित होते हैं /
वे पागल हैं ,पूरी तरह पागल !
और उनका इलाज है , मौत  !
मौत से कम कुछ भी नहीं /
इन पर रहम करना -
खुद के और देश के साथ गद्दारी है /
सवा सौ करोड़ दिलों में दहशत की कीमत पर,
हम रहमदिल कैसे हो सकते हैं ?
ये रक्तबीज हैं ,
इन्हें मारो, बिना रक्त की एक बूँद जमीन पर गिराए /
खुद मरने से पहले मारिये ,
यही आख़िरी रास्ता है /
फिर देशी- विदेशी का भेद न हो /
क्या जुटा पायेगा, इतना साहस यह देश ? ?

Friday, July 15, 2011

(80) रिश्ते

रिश्ते केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं होते
वे बन सकते हैं-
किसी से भी, कहीं भी, कभी भी
बस उनमें ईमानदारी हो
एक-दूसरे के प्रति वफादारी हो
वे स्वार्थ और लोभ से परे हों
दोनों दिल उमंग से भरे हों
दोस्त, मित्र, सहयोगी-
रिश्ते को कुछ भी दें नाम
लेकिन जब वक्त पड़े-
तो आयें एक दूसरे के काम.

वे जो लोकलाज वश-
सामाजिक विवशताओं में,
या मजबूरियों में
ढोये जाते हैं
वे जिम्मेदारियां तो हो सकते हैं-
लेकिन रिश्ते नहीं हो पाते हैं
जहाँ बस स्वार्थ का नाता हो-
वे यथार्थ में रिश्ते नहीं होते
पत्नी, पति  की-
और पुत्र, पिता के नहीं होते
निभ जाएँ तो बिना नाम दिए-
साथ-साथ चलते जिंदगी गुज़र जाती है
यह बात अलग है-
कि ऐसे रिश्तों को दुनिया नाम नहीं दे पाती है.

Wednesday, July 13, 2011

(79) पत्नी !!

पत्नी !पृथ्वी का वह प्राणी है ,
जो कभी संतुष्ट नहीं होती  /
पति की होकर भी,  जो पति की नहीं होती /
वह कभी बहू है, कभी माँ , कभी सास-
कभी दादी और कभी नानी है /
पति उसके लिए -
महज एक कमाऊ प्राणी है /
उसके पास -
पत्नी होने के अतिरिक्त ढेर सारे रिश्ते हैं /
और पति महोदय !
सारी जिन्दगी इन्हीं रिश्तों की चक्की में पिसते हैं /
वह अपने इन रिश्तों में , असीम सुख पाती है /
इसीलिये -
पत्नी होते हुए , पत्नी कब बन पाती है ?
घर के बाहर आदमी भले ही शेर हो ,
लेकिन घर में प्रायः -
पत्नी ही उस पर शेरनी जैसी गुर्राती है /
उसके पास -
जिन्दगी भर की शिकायतों का पिटारा है /
और पति -
पत्नी के सामने , सिर्फ बेचारा है /
यूं  तो वह ,
पति की लम्बी उम्र और सलामती के लिए -
दर्जनों व्रत और अनुष्ठान करती है /
लेकिन पति को यह एहसास कराने से नहीं चूकती ,
कि वह -
उसके साथ जिन्दगी के दिन भरती है /
वह निरंतर समस्याओं की-
इतनी बड़ी थाती है ,
कि उन्हें हल करते - करते
पति की सारी उम्र गुजर जाती है /

Monday, July 11, 2011

(78) नर कितना असहाय हो गया ?

वर्दीवाला ! शब्द आजकल दहशत का पर्याय हो गया ,
जिसकी लाठी, भैंस उसी की, यही वाक्य अब न्याय हो गया /

जो वर्दी एहसास सुरक्षा का देती थी, अब बिकती है ,
पदवालों, पैसेवालों के आगे नतमस्तक झुकती है,
हाय नौकरी, आह नौकरी, स्वाभिमान के दाम नौकरी,
रोजी -रोटी जो न कराये, नर कितना असहाय हो गया /

जो कल तक खाकी वर्दी से छिपते फिरते भय खाते थे,
और वही वर्दीवाले जिनकी  तलाश में मंडराते  थे ,
अब वे जनप्रतिनिधि, नेता हैं, काले धंधे चला रहे हैं,
वर्दी अब उनकी रक्षक है, शुरू नया अध्याय हो गया /

सीने पर पत्थर रखकर, वे लाठी-गोली दाग रहे हैं,
लेकिन बागी कहाँ थम रहे, लगा वारि में आग रहे हैं,
शायद पता नहीं है इनको, पानी कितना खौल चुका है,
विश्ववन्द्य यह देश आज लगता है कोई सराय हो गया /

वर्दी खाकी हो, काली हो या सफेद हो सब बिकती है ,
न्याय और अन्याय नहीं, बस नोटों की गड्डी दिखती है ,
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट तक झूठी मन माफिक बनती है ,
भरी अदालत झूठ बिक रहा, दुष्कर कितना न्याय हो गया  /

एक नहीं हर ओर दुशासन-दुर्योधन से दुष्ट दरिन्दे,
देश द्रोपदी जैसा कातर, चीरहरण कर रहे लफंगे,
शकुनी मामाओं का जमघट, उलटी धार बहाते पानी ,
शातिर, शोरेपुश्तों के आगे, सब कुछ निरुपाय हो गया  /

Tuesday, July 5, 2011

(76) गंगे तुम्हारी वन्दना

पतित पावनी गंगा के पुनरोद्धार  के लिए अनशन रत रहे, संत निगमानंद की मृत्यु पर उस हुतात्मा के माँ गंगा के प्रति देहदान को श्रद्धांजलि स्वरुप ये पंक्तियाँ -

गंगे तुम्हारी वन्दना! गंगे तुम्हारी वन्दना !
हे पतित पावनि, शुभगते, शत-शत तेरी अभिनन्दना.

माँ भारती की सहचरी, सहजीवनी, सहवासिनी
सुखदा, वरा, नीरासदा, कलि कलुष पातक नाशिनी 
माँ भारती जैसा ही तेरा, स्नेह सबको  मातृवत 
वह देवकी, यशुमति है तू, अदभुत तेरी आलिंगना 
गंगे तुम्हारी वन्दना! गंगे तुम्हारी वन्दना !

सुजला तू ही, सुफला तू ही, तू मातु मलयज शीतला 
तू पाल्या, तू तारिणी , संपन्न तू षोडश कला 
हे सरस सलिला , हम अकिंचन क्या तुझे देंगें भला 
हैं भाव से तेरे जननि,स्वीकार अक्षत-चंदना
गंगे तुम्हारी वन्दना! गंगे तुम्हारी वन्दना !

हे सुरसरी, भागीरथी, विष्णुप्रिया, देवापगा  
अविरल रहे धारा तेरी, माँ पग न अपने डगमगा 
तेरा मलिन मुख देख सारा देश आशंकित-व्यथित 
क्या एक 'निगमानंद' प्रस्तुत हम सभी की अर्पणा
गंगे तुम्हारी वन्दना! गंगे तुम्हारी वन्दना !

Saturday, July 2, 2011

(75) रिमझिम ये फुहारें आईं

 पहली बरसात की रिमझिम ये फुहारें आईं ,
सूखती  धरती  के  चेहरे   पे  बहारें आईं  /

पी कहाँ  प्यासे  पपीहे  ने पुकारा  था कल ,
सूखते झील, नदी, नालों, ने मागा था जल,
पेड़- पौधे भी थे प्यासे , लिए बोझिल आँखें ,
सबके  चेहरों  पे  उम्मीदें  व  करारें लाईं /

दादुरों  की नयी  पीढ़ी  ने  मचाई  हलचल ,
आ गया प्यार मेरा, डाल से बोली कोयल  ,
छत पे चिड़ियों का चहकता हुआ कलरव गुंजन ,
तितलियाँ झूमती फूलों पे  फिरें इतरायीं  /

घास मुसकाई तो मिट्टी ने उड़ाई खुशबू ,
हवा  में  गंध  घुली, झूमती आयी खुशबू  ,
बादलों की घटा में धूप भी सहमी- सहमी ,
तपन घटी ,  मयूर मन में बजी शहनाई /

थोड़ी  बूँदों  ने  किसानों  के  खिलाये  चेहरे ,
अब तो हर बेल के सिर, फूल के होंगे सेहरे   ,  
उर्वरा  उगलेगी  सोना  किसान  के  घर में .
अनगिनत सुनहरे ख़्वाबों की कतारें लाईं  /


Friday, July 1, 2011

(74) मुझे मर जाने दे ( ग़ज़ल )

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे ,
कब से रीता हूँ , तू अब तो मुझे भर जाने दे /

बाद मुद्दत के दर- ए -आब पे पहुँचा हूँ मैं  ,
अब हमारी भी तरफ , शोख लहर आने दे  /

यूँ तो शिकवे हैं बहुत ,बाद में कर लूँगा मैं ,
लबों से जाम अभी , इश्क का टकराने दे  /

डूबना चाहता हूँ , आब- ए - मोहब्बत में मैं,
रोकना अब नहीं , लहरों पे लहर छाने  दे  /

डूब जाऊँ भी अगर , तो कोई मलाल नहीं ,
चाहता कौन है जीना ,  मुझे मर जाने दे /

Wednesday, June 29, 2011

(73) वह सकुचाती, शर्माती सी

वह सकुचाती, शर्माती सी , नाजों के बीच पली जैसी ,
मानो बगिया के बीच खिली हो , कोमल कुसुम कली जैसी /

वह श्वेत धवल परिधान युक्त , थी भीड़ मध्य भी अलग- थलग ,
हम अपलक उसमें खोये से , वह मूरत मोम ढली जैसी  /

वह स्मित, मृदु स्वर में बातें, अधराधर का उठना- गिरना ,
पुष्पों से ज्यों, मधु रस वर्षा ,  मिश्री की लगे डली जैसी   /

वह विधना की अनुपम कृति सी , वह देवलोक की देवि सदृश ,
साकार कल्पना की छवि सी ,  भोली  सी  और  भली  जैसी /

शारदा, भवानी, लक्ष्मी ज्यों, आयी हो धरकर बाल रूप  ,
वह तेजस, वह लावण्य , लगे जैसे वृषभानु लली  जैसी  / 

Tuesday, June 28, 2011

(72) [ पुराना सब बदल डालो ]

इमारत जब नयी तामीर करनी हो तो अक्सर ही ,
पुरानी कुछ दबी यादें , उभरकर आ ही जाती हैं  /
अगर खुद का बनाया आशियाँ , खुद तोड़ना हो तो ,
वो यादें आँख में , शबनम कभी छलका ही जाती हैं /

मगर जब फिर उसी दर पर, बनाना हो नया घर तो ,
पुराना घर, दर- ओ- दीवार सब कुछ तोड़ना होगा  /
ये माना पीढ़ियाँ - दर- पीढ़ियाँ गुज़री हैं इस घर में ,
मगर उस भावना, उस मोह को अब छोड़ना होगा /

वही सिद्धांत, फिर से मुल्क की तामीर की खातिर ,
ज़रा सा संगदिल होकर, ज़रा सा सख्त हो अपना /
नया कुछ भी बनाने में , बहानों की नहीं चलती ,
हकीकत में नहीं बदलेगा , नवनिर्माण का सपना  /

है जिस रस्ते पे इस दम मुल्क , वह मंजिल से भटका है ,
वहां  रोड़े,  अँधेरे  हैं,  बहुत  शातिर     लुटेरे    हैं   / 
फिर उस मंजिल का क्या मतलब, जहां मकसद न हो हासिल ,
जहां इन्साफ मुश्किल हो ,जहां बस गोल घेरे हैं  /

पुरानी रूढ़ियाँ  या घर, बदलना ही उन्हें बेहतर ,
जो करना है, वो करिए आज , कल- परसों पे मत टालो /
निकल आओ अंधेरों से , अँधेरे दर्द देते हैं ,
नया फिर से बनाओ घर, पुराना सब बदल डालो  /  


Monday, June 27, 2011

(71) कैसे चुप रहूँ मैं ?

नहीं फितरत, धधकता आग के जैसा रहूँ मैं ,
नहीं आदत,कि शोलों सा भड़कता ही रहूँ मैं ,
मगर जब अन्नदाता स्वयं भूखा मर रहा हो ,
जवाँ इस देश का , खुद आप से ही लड़ रहा हो ,
सिसकती बेटियों के जिस्म नोचे जा रहे हों ,
वतन को बेच , रखवाले वतन के खा रहे हों ,
हो अंधा देश का क़ानून , तो कैसे सहूँ मैं ?
ये सब कुछ देख, आँखें फेर कैसे चुप रहूँ मैं ?

उठायी थी कलम यह सोच कर, सत्पथ चलूँगा ,
अँधेरे रास्तों को दीप बन रोशन करूंगा  /
थीं तब भी अड़चनें सन्मार्ग पर, इतनी नहीं थीं,
अँधेरे बढ़ रहे थे, पर कंदीलें जल रही थीं ,
वो था वह दौर जब इन्सानियत कुछ-कुछ मरी थी ,
चमन में रोग था , पर पत्तियाँ तब तक हरी थीं /
थे जो भी बागवाँ, वे स्वार्थ में अंधे नहीं थे ,
जमीं के लोग थे वे ,इस तरह नंगे नहीं थे /

मगर इस दौर सारे मुल्क में उल्टी हवा है,
हर एक डाली पे उल्लू है, बताओ क्या दवा है ?
चमन में फूल, पत्ती, फल नहीं, गुब्बार है अब ,
शज़र को क्या कहें, मिट्टी तलक बीमार है अब /
जरूरत है दवाई की चमन को,खाद- पानी की ,
सफाई की, निराई की, हिफाज़त, निगहबानी की /
हवा कुछ कह रही है,सुन तो लो सरगोशियाँ उसकी,
वो शायद पूछती है,अब हिफाज़त कैसे हो इसकी ?
     
   

Saturday, June 25, 2011

(70) { तुम्हें ही भेदना है }

पल रहा अन्याय उर में , तो उसे अभिव्यक्ति भी दो ,
गाँठ मन की खोल दो, अंतःकरण की शक्ति भी दो /
देश यह पालक पिता है और धरती माँ सभी की ,
इसलिए इसको समर्पण भाव दो,अनुरक्ति भी दो /

मानता हूँ कुछ जबानों पर यहाँ ताले जड़े हैं ,
घाव भी हैं और पावों में बहुत छाले पड़े हैं /
किन्तु क्या बस इसलिए चुपचाप सब सहते रहोगे ?
देश का इतिहास , अस्सी घाव तन, फिर भी लड़े हैं /

प्रश्न केवल यह नहीं है , आज क्या कुछ हो रहा है ,
प्रश्न यह है, विश्व में भारत विभव क्यों खो रहा है ?
देश के सम्मान का दायित्व सारे देश पर है ,
इसलिए रोको उसे, जो भी अनर्गल हो रहा है /

जी चुके अपनी,  मगर  कर्तव्य तो अवशेष ही है ,
धर्म का अगला चरण, अगली विधा यह देश ही है /
नयी पीढ़ी के लिए भी , पथ बनाना है तुम्हें ही ,
बूँद से चूके , घड़ों से पूरना फिर क्लेश ही है /

आज सारे देश में हर ओर केवल वेदना है ,
और शासक वर्ग की भी मर चुकी संवेदना है /
धूल- कूड़ा है बहुत, अब आंधियाँ फिर से उठाओ ,
व्यूह का यह द्वार अंतिम भी तुम्हें ही भेदना है /  


Friday, June 24, 2011

(69) तब क्या करोगे प्यारे?

अन्ना और रामदेव के आन्दोलनों पर
सरकार की भृकुटी तनी है/
वजह शायद यह कि-
उसके गुर्गों के पास ही सबसे अधिक ब्लैक -मनी है /
यदि बन गया जन-लोकपाल
तो उतर सकती है उनकी भी मोटी खाल /
इसलिए नए- नए तर्क गढ़े जा रहे हैं /
अन्ना और बाबा पर-
साम्प्रदायिकता तथा तानाशाही के आरोप मढ़े जा रहे हैं /
यह सरकार की नयी परिभाषा है /
अनशन करना तानाशाही है -
और लाठियाँ भांजना  ? ? ?

वे कहते हैं कि-
अन्ना और बाबा पहले चुनाव जीतकर आयें /
फिर संसद में बैठकर क़ानून बनायें /
यहाँ इस सारे देश का एक सवाल है -
क्या चुनाव जीतने वालों को ही बोलने का अधिकार है ?
यदि ऐसा  ही है -
तो संविधान निहित मूल अधिकारों की क्या दरकार है ?
एक और सवाल-
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को किस क्षेत्र की जनता ने चुना है ?
उनके हाथ में तो सारे देश का झुनझुना है /
और यह भी कि किसी निर्वाचन क्षेत्र के -
दस-पंद्रह फीशदी मत हासिल कर चुनाव जीतने वाला बड़ा है
या वह व्यक्ति -
जिसके समर्थन में सारा देश मुट्ठियाँ बांधे खड़ा है ?

थोड़ा पीछे लौटिये -
महात्मा गांधी,पटेल, सुभाष ने कौन सा चुनाव लड़ा था ?
लेकिन तब उनके पीछे सारा देश खड़ा था /
गांधीजी को सारे देश ने राष्ट्रपिता माना -
आज भी मानता है /
लेकिन शायद सत्ता से जुड़ा वह वर्ग नहीं मानता -
जो उन्हीं की दुहाई दे , उन्हीं के नाम पर रबड़ी छानता है /

हे स्वयंभू विधाताओं -
पहले जनतंत्र के मायने जानो /
जनता के मन में पल रहे असंतोष को पहचानो /
अभी एक अन्ना के आन्दोलन से हलकान हो -
लेकिन कल जब सारा देश बनेगा  अन्ना हजारे ,
बोलो तब क्या करोगे प्यारे ? ?   

Thursday, June 23, 2011

(68) सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं

मैं सरस्वति पुत्र हूँ , करता नहीं व्यापार हूँ मैं ,
कल्पना का कवि नहीं हूँ,  सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं /

मूक की वाणी, दलित-शोषित ह्रदय की वेदना हूँ,
लोक प्रहरी हूँ, समूचे राष्ट्र की संवेदना हूँ /
एक ही उद्देश्य - जितना हो सके, वह सच कहूं मैं,
पथ विरत या सुप्त  लोगों को, जगाता भी रहूँ मैं /
लेखनी का शस्त्र यह, परमाणु पूरित हाथ मेरे ,
न्याय का सहचर, सखा , अन्याय का प्रतिकार हूँ मैं/
कल्पना का कवि नहीं हूँ,  सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं //१//

सिरफिरा,सनकी,विवादी, शब्द भी स्वीकार मुझको,
लोग विद्रोही कहें, तो भी है अंगीकार मुझको /
अनवरत अन्याय, फिर भी चक्षु कैसे बंद कर लूं ,
मात्र अपने स्वार्थ हित, कैसे ह्रदय पाषाण धर लूं / 
अग्नि जीवन ऊष्मा है, अग्नि तम को जारती है,
इसलिए बस घूमता , लेकर ह्रदय अंगार हूँ मैं /
कल्पना का कवि नहीं हूँ,  सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं//२//

रहबरी चोले  में रहजन, चाल तिरछी चल रहा है ,
और सारे देश के, आक्रोश उर में पल रहा है /
कुर्सियां जिनके तले, वे पट्टियां आँखों पे बांधे,
फिर गरीबों, तंगहालों के, भला हित कौन साधे?
वे बधिर हैं , सिसकियाँ, उनको नहीं पड़तीं सुनायी,
इसलिए संधानता शर, धनुष की टंकार हूँ मैं /
 कल्पना का कवि नहीं हूँ,  सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं//३//

Wednesday, June 22, 2011

(67) कैसे हैं दीवाने लोग ?

आज इधर, कल उधर बैठकर गढ़ते नए बहाने लोग ,
अजब सियासत खेल है, जिसमें  बदलें रोज ठिकाने लोग /

इस पाले में उनको कोसें, उस पाले से इन पर वार ,
पल- पल में ईमान बदलते, सत्ता के दीवाने लोग /

कुर्सी की खातिर इज्ज़त क्या , देश भाड़ में झोंक रहे ,
बेशर्मी की हदें लांघते ,जैसे हों बौराने लोग /

कल खाते थे कसम मिटाने की जिसको , अब उसकी ही,
गोदी में बैठे हैं गाते , फिर से नए तराने लोग /

भीड़ जुट रही उनके पीछे , जिनका कोई कयाम नहीं,
अपने पैर कुल्हाड़ी मारें , कैसे हैं दीवाने लोग /

इन कौवों, गीधों के चंगुल से , गुलशन अवमुक्त  करो ,
उनके ही ये चोंच मारते, जिनके चुगते दाने लोग /   

Monday, June 20, 2011

(66) माँ जैसा और नहीं कोई


तेरी चिंता से ग्रस्त न जाने कितनी रात नहीं सोयी /
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  /

नौ माह उदर  में रख पाला , पीड़ा में भी था अमित लाड़,
जन्मे तो कितने कष्ट दिए, बाहर आये माँ उदर फाड़  /
पर तेरी ममता में उसने , अपने सब कष्ट विसार दिए ,
फिर तेरे लालन-पालन में , खुद के सारे सुख वार दिए /
तेरे हँसने पर खिली और वह तेरे रोने पर रोई ,
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  /

वह पौष - माघ की शीत लहर ,तेरा पल-पल, मल-मूत्र त्याग,
ठंडक से तुझे बचाने में , खुद रातें काटीं जाग -जाग /
तेरे हर संकट को हंसकर , बस खुद पर लेती आयी माँ ,
तेरे लालन-पालन में हर पल , बनी रही परछाई माँ /
तुझको आँचल में छुपा रखा, खुद गीले में लेटी-सोयी ,
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  /

डगमग शैशव का सम्बल वह, बोलना सिखाने वाली माँ ,
बैयाँ-बैयाँ ,टयाँ -टयाँ , चलना सिखलाने वाली माँ /
निज स्तन पान करा तुझको , तुझमें जीवन संचार किया ,
अपना सब मधुमय अंतराल , तेरे पालन पर वार दिया /
तेरे समर्थ हो सकने तक , तुझमें ही सदा रही खोयी ,
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  /

इस दुनिया में , इस पृथ्वी पर,माँ ही सबको लाने वाली ,
इस धरती पर सबसे पहले ,पहला पग रखवाने वाली /
खुद में ही फूला घूम रहा , भूला क्यों जिसकी गोद पला ,
जो माँ को भूल गया , उससे दुनिया में कौन कृतघ्न भला?
पत्नी, सुत, भ्रात सभी रिश्तों में , उनके अपने निजी स्वार्थ ,
निःस्वार्थ प्यार माँ का , उसकी ममता का मोल नहीं कोई /
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  / 

Sunday, June 19, 2011

(65) वेश्या पतिता नहीं होती /

वेश्या पतिता नहीं होती, पतन को रोकती है /
पतित जन की गन्दगी , अपने ह्रदय में सोखती है/
जो विषैलापन लिए हैं घूमते नरपशु जगत में ,
उसे वातावरण में वह फैलने से रोकती है /

यही तो गंगा रही कर , पापियों के पाप धोती ,
वह सहस्रों वर्ष से , बस बह रही है कलुष ढोती,
शास्त्र कहते हैं कि गंगा मोक्षप्रद है, पावनी है ,
किसलिए फिर और कैसे वेश्या ही पतित होती ?

मानता हूँ , वेश्या निज तन गमन का मूल्य लेती ,
किन्तु सोचो कौन सा व्यापार उनका ,कौन खेती ?
और यह भी , कौन सी उनकी भला मजबूरियां हैं ,
विवश यदि होती न, तो तन बेचती क्यों दंश लेती ?

मानता यह भी कि वेश्यावृत्ति , पापाचार है यह ,
किन्तु रोटी है ये उनकी , पेट हित व्यापार है यह ,
देह सुख  लेते जो उनसे, वही उनको कोसते भी,
और फिर दुत्कार सामाजिक भी , अत्याचार है यह /

गौर से देखो , बनाते कौन उनको वेश्याएं ,
और वे हैं कौन, जो इस वृत्ति को खुद पोषते हैं ?
पतित तो वे हैं , जो रातों के अंधेरों में वहां जा -
देह सुख  भी भोगते हैं , और फिर खुद कोसते हैं /  

Thursday, June 16, 2011

(64) पापा ऐसा क्यों होता है

पापा जब तुम बूढ़े होगे ,
जब यह काया थक जायेगी .
और हमारी शादी होगी ,
जब   मेरी  पत्नी आयेगी .

क्या तब दादा-दादी जैसे,
मम्मी और तुम्हें दोनों को,
वृद्धाश्रम में जाना होगा ?.
क्या तब मुझको भी ऐसे ही,
बस तब साल-महीनों में फिर,
तुमसे मिलने आना होगा ?

क्या दादा-दादी दोनों ही ,
कभी युवा थे, तुम जैसे थे?
और कभी क्या ,जैसा इस दम 
मैं छोटा हूँ, तुम वैसे थे ?
तब क्या दादा-दादी तुम से ,
भी यूं प्यार किया करते थे .
मेरा बेटा, प्यारा बेटा,
राजदुलारा वे कहते थे.?
क्या अपनों से दूरी का दुःख ,
पापा तुम तब सह पाओगे ?
मेरे बिन तुम वहां अकेले ,
बोलो कैसे रह पाओगे ?

पापा ऐसा क्यों होता है ,
क्यों सब बूढ़े हो जाते हैं?
अपना घर, अपने बच्चों को,
छोड़ वहां वे क्यों जाते हैं?

special on "FATHER,S DAY"