बचपन ! गोद, पालने और खेल में
कैशोर्य ! पढ़ाई में
तरुणायी ! प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा की दौड़ में
परिपक्वता ! पत्नी और बच्चों की फरमाइशों में
प्रौढ़ावस्था ! संतानों का भविष्य संवारने में
और बुढ़ापा -
घर- परिवार को एकजुट रखने में ,
रिश्तों को निभाने में ,
अवशेष को संवारने में बीत जाता है /
आदमी -
अपने लिए कब जी पाता है ?
वह सारी जिन्दगी -
कोल्हू के बैल सा खटता है /
जिन्दगी के ताने , उलाहने और समय के थपेड़ों में -
लगातार टुकड़े- टुकड़े बटता है /
इस आपाधापी में -
वह जाने क्या - क्या सहता है /
फिर उसे अपना -
अपने खुद के कुछ होने का ध्यान कहाँ रहता है ?
जीवन संध्या में, जब वह -
जिन्दगी का हिसाब जोड़ता - घटाता है ,
तो अपने पीछे -
बस केवल रिक्ति ही रिक्ति पाता है /
यही मानव जीवन की सच्चाई है ,
जहाँ एक ओर कुआँ है -
और दूसरी ओर खाई है /
















