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Monday, October 10, 2011

(107) चरित्र निर्माण प्रथम हो


तब  होगा  निर्माण राष्ट्र  का ,जब चरित्र  निर्माण प्रथम हो /
जाति- धर्म से ऊपर उठकर, प्रतिभा का सम्मान प्रथम हो /

आओ ! मातृभूमि की सेवा का , मिलकर संकल्प करें हम ,
अपनी भाषा- भूषा के प्रति , फिर आदर का भाव भरें हम ,
उत्कर्शों के शिखर चढ़ें पर, संस्कृति का उत्थान प्रथम हो /
तब होगा निर्माण राष्ट्र का ,जब  चरित्र  निर्माण  प्रथम हो  /

पराधीनता  के  बंधन से ,  मुक्त हुए  छह  दशक  हो गए ,
पर गाँधी, सुभाष के सपने , स्वार्थ सिन्धु के बीच खो गए ,
उन सपनों को सच करने का , घर- घर में अभियान प्रथम हो /
तब होगा  निर्माण  राष्ट्र  का, जब  चरित्र   निर्माण  प्रथम  हो /

लोकतंत्र  के  सोपानों  पर, वर्ग  -  वर्ण  जैसी सीमाएं ,
बाधाओं के अग्निकुंड में, अब भी जलती हैं प्रतिभाएं ,
आवाहन तब करें देश का, जन- जन का आह्वान प्रथम हो /
तब होगा निर्माण  राष्ट्र  का, जब चरित्र  निर्माण  प्रथम हो  /

स्वार्थ  साधना  में जनमानस ,  संवेदना  भुला  बैठा  है ,
निज प्रभुता के मद से गर्वित , मनुज स्वयम में ही ऐंठा है,
चढ़ें प्रगति सोपान स्वयम, पर औरों का भी ध्यान प्रथम हो /
तब होगा  निर्माण  राष्ट्र  का, जब चरित्र  निर्माण  प्रथम हो  /

Friday, October 7, 2011

(106) नफ़रत न घोलिये /


अहले खुदा   की  राह में  ,  नफ़रत  न  घोलिये /
एहसास-ए-रंज -ओ-गम , न तराजू से तोलिये /

खुद !  काँच के मकान में , बैठे हुए हैं जब,
औरों के लिए , हाथ में पत्थर न तोलिये /

गीता हो, बाइबिल हो या गुरुग्रंथ हो , कुरान ,
सबके  उसूल  एक  ,  ज़रा  वर्क  खोलिए /

कौमों की सियासत में मुल्क झोंकने वालों ,
ये लफ्ज़ हैं हरजाई , संभलकर के बोलिए  /

वे ज़ख्म पुराने ही , अभी तक नहीं भरे ,
मरहम न दे सकें , तो उन्हें यूँ न खोलिए / 

Wednesday, October 5, 2011

(105) बुझने न पायें

रोशनी के चंद   दीपक ही सही , बुझने न पायें /
चित्र धूमिल ही सही सौहार्द के, मिटने न पायें /

जो मशालें ले  तमस से लड़ रहे , उनको सराहो ,
और जो उनकी हिमायत में खड़े, उनको सराहो ,
दर्द जो औरों का खुद में पालते , वे कम बहुत हैं,
शक्ति दो उनको समर्थन की, रहें जलतीं शमाएँ /
रोशनी के चंद दीपक   ही सही ,  बुझने न पायें /

मानता  हूँ  !  शक्तिशाली हैं ,  उजालों के लुटेरे ,
मानता,  सच को ढके हैं , झूठ के बादल घनेरे ,
फिर उठाओ आंधियाँ, इन बादलों को ठोकरें दो ,
सत, असत पर, न्याय को अन्याय पर विजयी बनाएं /
रोशनी  के   चंद दीपक  ही सही ,   बुझने  न  पायें /

देश के  स्वाधीन   होते  हुए भी  , ग़मगीन  हो  तुम ,
सोचिये ! मतदान के अतिरिक्त कितना दीन हो तुम ,
लोक के  इस  तंत्र  पर ,   काबिज़  लुटेरे   हो चुके हैं ,
मुक्ति का  उसकी करें   सदुपाय , आओ मन बनाएं /
रोशनी के   चंद दीपक  ही सही ,  बुझने   न  पायें /

इस प्रजा के तंत्र में , तुम स्वयं अधिपति हो स्वयं के ,
इसलिए  !  अन्याय को ललकार दो प्रतिकार बन के ,
जो   तुम्हारे   ही दिए  टुकड़ों पे पल   ,  गुर्रा  रहे  हैं ,
दो उन्हें  दुत्कार   , उनके    हौसले   बढ़ने न पायें /
रोशनी के  चंद   दीपक  ही सही ,   बुझने न  पायें /


Saturday, October 1, 2011

(104) चौंसठ वर्ष व्यतीत हो गए

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और यशस्वी प्रधानमंत्री रहे स्व. लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए स्वाधीन भारत के बारे में उनके द्वारा देखे गए स्वप्न स्वतः स्मृति पटल पर उभर आते हैं / आज के भारत जैसा भारत तो नहीं चाहा था उन्ह्नोने ---------------


बलिदानी गाथाओं के स्वर , अनचाहा संगीत हो गए /
आज हमारी आज़ादी को , चौंसठ वर्ष व्यतीत हो गए /

तब सोचा था ,त्याग-तपस्या का प्रतिफल कुछ नया मिलेगा ,
आज़ादी  के   गगनांगन   में , देश - प्रेम   का   सूर्य   उगेगा ,
बापू  के  सपनों  के  भारत  में ,  फिर  होगा  नया   उजाला ,
त्रेता युग आयेगा  फिर  से ,  हर चेहरे  पर कमल  खिलेगा  ,
रामराज्य के स्वर्णिम सपने , ज्यों बालू की भीत हो गए /
आज हमारी  आज़ादी को , चौंसठ वर्ष  व्यतीत  हो गए /

जनसेवक का बाना पहने ,  सरकारों  में घुसे  लुटेरे ,
न्याय व्यवस्था पंगु हो गयी ,पहले से बढ़ गए अँधेरे ,
वर्ग,जाति की दीवारों से ,  नेताओं ने सबको बांटा ,
बाहुबली - अपराधकर्मियों ने डाले शासन पर घेरे ,
शत्रु हुए अपने , अपनों के , हम खुद से भयभीत हो गए /
आज हमारी आज़ादी को , चौंसठ  वर्ष  व्यतीत हो गए /

किससे करें शिकायत किसकी , घर को   घरवालों ने लूटा ,
स्वार्थ साधनारत जनसेवक , जन सुख-दुःख से नाता टूटा ,
मत बिकते, मतदाता बिकते , बिकते पद , बिकती सरकारें ,
धनबल, जनबल से भय खाकर , सच्चा भी बन जाता झूठा ,
अर्धशतक में ही भारत के , गृह फिर से विपरीत हो गए  /
आज हमारी आज़ादी को , चौंसठ वर्ष व्यतीत हो गए /

जाति - धर्म की बलिवेदी पर , औसत सौ  प्रतिदिन हत्याएं ,
लूट , डकैती ,व्यभिचारों की,  हर दिन अगणित नयी कथाएं ,
तथाकथित जनप्रतिनिधि- प्रहरी , आग लगाकर हाथ सेकते ,
अनाचार,  अन्याय ,  अराजकता , अनीति   लाघीं  सीमाएं ,
शान्ति, प्रेम ,सहयोग ,सुह्र्दता , परदेशी की प्रीती हो गए /
आज  हमारी आज़ादी को ,  चौंसठ  वर्ष  व्यतीत  हो गए /

Wednesday, September 28, 2011

(103) कौन किसके लिए जिया

तुमने जो भी सिला दिया यारों ,
हमने शिकवा कहाँ किया यारों ?

मर तो सकता है किसी पर कोई ,
कौन किसके लिए जिया यारों ?

दो कदम साथ चले भी तो बहुत ,
कद्रदानी का शुक्रिया यारों /

जख्म देना जहाँ की फितरत है ,
जिसने जो भी दिया , लिया यारों /

अब तो रूख्सत के वक़्त माफ़ करो ,
छोड़ दो मुझको , तखलिया यारों /

कौन किसके लिए ---जिया यारों //




Monday, September 26, 2011

(102 ) कौन हूँ मैं ?

कौन हूँ मैं , जानता खुद भी नहीं, पर जानता हूँ ,
मैं जलधि के ज्वार सा, आवेग सा, आक्रोश सा हूँ /

मैं कृषक का, मैं श्रमिक का, मैं वणिक का, मैं लिपिक का ,
वृद्ध, बालक,  नारि - नर , तरुणाइयों का जोश सा हूँ  /

सूर्य का सा ताप हूँ मैं, धधकता ज्वालामुखी हूँ ,
मैं हलाहल , मैं गरल , जनवेदना का रोष सा हूँ /

मूक की आवाज हूँ मैं, आर्त की चीत्कार हूँ मैं,
जो गगन को भेद दे , उस घोष उस उद्घोष सा हूँ /

और अंतिम छोर वाले आदमी की वेदना का ,
क्रोध हूँ, आवेश हूँ, संवेदना का कोष सा हूँ  /

मैं विवादी हूँ, प्रलापक हूँ , ये हैं आरोप मुझ पर,
नाम कुछ भी दे कोई, कवि ह्रदय का आक्रोश सा हूँ /

Saturday, September 24, 2011

(101) मैं ही आधार हूँ

मैं स्रजन, मैं अगन , मैं धरा , मैं गगन,
मैं प्रकृति , मैं नियति, मैं ही सहकार हूँ /
मैं प्रभा, मैं किरन, मैं विरल, मैं सघन ,
सूर्य  की रश्मियों  का ,  मैं  साकार हूँ  /

मैं समय, मैं अवधि ,वारि मैं , मैं जलधि ,
मैं ही ,  नद - नद्य  का  लेता  आकार  हूँ /
क्रोध मैं , मैं  विनय , घ्राण मैं, मैं ह्रदय ,
पञ्च  भूतों  में ,  मैं  सृष्टि  साकार  हूँ /

मैं जगत , जीव , जड़ और चैतन्य में ,
ईर्ष्या - द्वेष   मैं   प्यार - मनुहार हूँ  /
यज्ञ मैं , विज्ञ मैं  , ज्ञान - विज्ञान मैं,
तत्त्व , दर्शन भी मैं , शब्द ओंकार हूँ /

सारे साधन मेरे , एक मैं साध्य हूँ  ,
सृष्टि साकार में,  मैं  निराकार हूँ  /
मेरा कुछ नाम दे, एक कर्ता हूँ मैं ,
मैं ही कर्तव्य हूँ , मैं ही अधिकार हूँ /

धर्म की आड़ ले , बाटते जो मुझे ,
वे गुनहगार हैं, धूर्त - मक्कार हैं/
मैं ही मंदिर हूँ, मस्जिद , शिवाला भी मैं ,
मैं गिरिजाघरों का भी आधार हूँ  /



Thursday, September 15, 2011

( 100 वीं पोस्ट ) कुछ बनना, कायर मत बनना

मेरी   १०० वीं पोस्ट 
**************
     ब्लॉग पर यह मेरी १००वीं प्रविष्टि है / अच्छा या बुरा , पहला शतक ! मैं अपने हर समर्थक, शुभचिंतक तथा पाठक से , अपनी अब तक की " काव्य यात्रा " पर बेबाक प्रतिक्रिया की अपेक्षा करता हूँ / यदि मेरे प्रयास में कोई त्रुटियाँ हैं,तो उनसे भी अवश्य अवगत कराएं , आपका हर फैसला शिरोधार्य होगा . साभार  - एस . एन . शुक्ल
कुछ बनना, कायर मत बनना, अंतिम विजय तुम्हारी होगी/
अगर पराजय  भी हो , तो क्या ,  कल फिर से  तैयारी होगी / 

 बिना लड़े मत कभी पराजय स्वीकारो , यह ठानो मन में ,
 लड़ो !  और लड़कर हारो भी , तो  संतोष  रहेगा  मन  में , 
 ऐसी हार , हार तो होगी , लेकिन एक - दम न्यारी होगी / 
कुछ बनना, कायर मत बनना, अंतिम विजय तुम्हारी होगी/

 शत्रु प्रबल कितना भी हो , पर मरने से वह भी डरता है ,
  सीधे सींगों वाले पशु का , कौन सामना कब करता  है ,
   तूफानी  हर लहर सदा , चट्टानों से  लड़  हारी होगी /
कुछ बनना, कायर मत बनना, अंतिम विजय तुम्हारी होगी/

पीछे रह  ललकार  लगाने  वाला , युद्ध  नहीं लड़  सकता ,
जिसकी निष्ठा अविश्वस्त हो , वह नेतृत्व नहीं कर सकता,
जो खुद में  भयभीत , भला उसमें  कितनी   खुद्दारी होगी  /
कुछ बनना, कायर मत बनना, अंतिम विजय तुम्हारी होगी/













Monday, September 12, 2011

(99 ) वर्षों तक

उम्र भर साथ निभाने का था वादा कोई ,
 उसी करार में हम, जीते रहे वर्षों  तक /

तल्ख़ झोंको से लरजती हुयी चादर अपनी ,
सहेजते   भी  रहे ,  सीते रहे   वर्षों तक  /

सामने लोग मेरे , मुझसे खुद को भरते रहे ,
और  हम बहते रहे , रीते रहे   वर्षों  तक  / 

 फब्तियों  का  भी , एक दौर सहा है मैंने  ,
 ज़हर के घूँट भी , हम पीते रहे वर्षों तक /

 वे जो अकल में थे , पासंग भर नहीं मेरे-
 कभी उनसे भी , गए-बीते  रहे  वर्षों तक / 

 वक्त जो कुछ न कराये , वो समझो थोड़ा है,
  ये मान, सहते रहे , जीते  रहे वर्षों तक  /














Thursday, September 8, 2011

(98) इस अँधियारे में

रहबर के बाने में रहजन , देश दहारे में ,
आशाएं हम  खोज रहे हैं,इस अँधियारे में /

कल के बड़े हादसे में, किस घर का कौन गया ?
एक अजब सन्नाटा है, हर घर -चौबारे में /

दहशत ले , वापस लौटे थे , कल स्कूलों से ,
अब वे बच्चे पूछ रहे हैं, कल के बारे में /

सब पर बीत रही एक जैसी , फिर भी एक नहीं ,
बटे हुए कौम-ओ -मजहब के, लोग दयारे में /

शहर सभ्यता के मानक थे , अब वह बात कहाँ ,
एक नयी दुनिया बसती , इस पत्थर - गारे में /

घुटकर चीखें अन्दर की अन्दर रह जाती हैं ,
तूती की आवाज कौन सुनता नक्कारे में ?

Sunday, September 4, 2011

{97} न जाने क्यों ?

न जाने क्यों शहर ये आज ग़मज़दा , उदास है 
न जाने कौन सी , चुभी हुई दिलों में फाँस है

न जाने कौन खौफ से , हैं लोग यूँ  डरे हुए 
न जाने क्यों , ये घुचघुचे से आँख में भरे हुए

न जाने कौन सा यहाँ , कहाँ हुआ बवाल है
न जाने क्यों हर एक आँख में यहाँ सवाल है

न जाने क्या जला , कहाँ , ये गंध क्यों जली-जली
न जाने कैसी राख , उड़ रही यहाँ गली-गली

सुना है कल , सियासती हुजूम था इसी शहर
उसी हुजूम ने शहर में ढाया इस कदर कहर 

छुरे, कटार, बम चले, कहीं पे गोलियाँ चलीं 
धधकने लग गया शहर, लहू बहा गली-गली

ये क्या हुआ, ये क्यों हुआ ,किसी को कुछ पता नहीं 
किसी से पूछिए , तो बोलता है  बस ' न जाने क्यों '

न जाने क्यों ?न जाने क्यों ?न जाने क्यों ?न जाने क्यों ?

Saturday, August 27, 2011

(96) उजाड़ की तरह

कल के उजाड़, आज हैं बहार की तरह
और हम उजाड़ से अधिक उजाड़ की तरह.

वो सिर उठाये, आलीशान ताजमहल हैं.
हम हैं उखड चुकी, किसी मजार की तरह.

वो शीश महल में सजे, फैशन की ज्यों दुकान,
हम हैं किसी उजड़ी हुई बाज़ार की तरह.

वो पालकी में बैठे किसी राजकुंवर से,
हम पालकी लिए हुए कहार की तरह.

मसनद पे जमे हैं, वो किसी साहूकार से,
राशन दुकान वाली, हम कतार की तरह.

उनके-हमारे बीच में अंतर बहुत बड़ा ,
चाबी खजाने की वो, हम उधार की तरह.

Monday, August 22, 2011

(95) फिर मुनादी बज रही है

फिर मुनादी बज रही है
फिर बुलावा आ रहा है
 देश का इतिहास ,
  फिर खुद को स्वयं दुहरा रहा है /
और हर एक शख्स-
दीवानों के जैसा ,
  एक तिहत्तर वर्ष के बूढ़े के पीछे-
 और उसके पक्ष में
  सडकों पे बांधे मुट्ठियाँ लहरा रहा है /
बच्चों, बूढ़ों ,नौजवानों में-
 अजब आक्रोश सा है /
  और नारी वर्ग में भी-
   कुछ गजब का जोश सा है / 
 कांपती , कमजोर सी आवाज में-
 बूढ़ा वो सच कहने लगा है /
  और उस सच की धमक से - 
    देश की सरकार का मजबूत सा दिखता किला-
  ढहने लगा है /
 फिर वही छत्तीस बरस पहले घटी -
जैसी कहानी /
  फिर वही आक्रोश-
  युवकों में वही दिखती रवानी / 
    और फिर सरकार का वैसा ही हठ,
 जैसा कि तब था / 
    फिर वही सच को दबाने की-
नयी पुरजोर साजिश,
  फिर कुतर्कों की वही-
   सरकार की झूठी कहानी /
  बादशा का हर चहेता -
     सच से फिर कतरा रहा है /
देश का इतिहास
फिर खुद को स्वयं दुहरा रहा है /
---------------------------
 उस समय भी -
     एक बूढ़े ने ही कड़वा सच कहा था /
  आज फिर से -
        एक बूढ़ा ही वो सच दुहरा रहा है /
   झूठ की बुनियाद , तब भी थी हिली -
  फिर हिल रही है /
    झूठ को फिर से चुनौती -
   सत्यता से मिल रही है /
  और सत्ता के वे प्यादे -
जो मलाई खा रहे हैं /
    झूठ को ही सच बताकर -
   सत्य को झुठला रहे हैं /

 तर्क देते हैं वे -
   बहसी और विवादी है ये बूढ़ा /
नित नए तूफाँ-
    खड़े करने का आदी है ये बूढ़ा /
 यह है जादूगर -
 न इसके जाल में फंसना- फंसाना /
  स्वार्थी है यह -
   न इसके व्यर्थ बहकावे में आना /
  लाठियां दिखला रहे हैं-
   घुड़कियाँ भी दे रहे हैं /
  वर्दियों का रौब दिखला-
    धमकियाँ भी दे रहे हैं /
   किन्तु यह आक्रोश जो -
    सड़कों पे मुखरित हो रहा है /
  लाख बाड़ों और बांधों से -
  कहाँ अब थम रहा है /
   हर नए दिन, भीड़ का -
  सैलाब बढ़ता जा रहा है /
देश का इतिहास
फिर खुद को स्वयं दुहरा रहा है /
---------------------------

काश ! इन अंधों व बहरों में -
तनिक सद्ज्ञान होता /
    स्वार्थ के अतिरिक्त भी कुछ है-
  तनिक संज्ञान होता /
  काश ! वे पाते समझ -
  इन्सान को, इन्सानियत को /
   काश ! वे ढाते न -
  जेरो- जुल्म को , हैवानियत को /
    काश ! वे इस देश के प्रति -
  तनिक सा हमदर्द होते /
    काश ! वे इन्सान होते-
    काश ! वे भी मर्द होते /

   सामना करते वे सच का-
  मिनमिनाते स्वर न होते /
   काश ! जन-गण की व्यथा वे समझते -
  कायर न होते /
तो भला क्यों -
 एक बूढ़ा आदमी यूँ बौखलाता /
    क्यों भला वह देश भर में -
 चेतना की लौ जगाता /
आइये हम सब -
 समर्थन में जुटें , सबको जुटाएं /
 बदगुमानों , बदजुबानों से-
वतन अपना बचाएं /
 देश जागो, लोक जागो,
   नव सवेरा हो रहा है /
देश का इतिहास
  फिर खुद को स्वयं दुहरा रहा है /

Friday, August 19, 2011

(94) नारी

बचपन में भी नहीं था अन्य बच्चों जैसी उन्मुक्तता का अधिकार,
और कैशोर्य?
माता-पिता से लेकर सारे बड़ों की
घूरती-टोकती सी निगाहें 
हर कदम पर टोका-टोकी .
फिर आई तरुणाई.
ऐसे मानो अभिशाप बनकर आई.
अपनी  इच्छा से कहीं आने-जाने की,
अपने मन का कुछ भी करने की,
छूट नहीं, पूरी पाबन्दी !
उफ्फ!
हर तरफ बदन को टटोलती- घूरती निगाहें ,
जिनमें अपनेपन से अधिक वासना की चाह ,
सच-
किसी युवती के लिए कितनी कंकरीली-पथरीली राह?
फिर विवाह-
जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय.
लेकिन इस मामले में भी लड़की जैसे गाय.
चाहे जिस खूटे से बाँध देना 
कोई नहीं जानना चाहता उसकी इच्छा 
किसी अनजान के हाथों अपना सारा जीवन 
अपना स्वत्व , अस्तित्व और भविष्य 
सौंपने को विवश,
फिर वहां पितृगृह से भी अधिक पाबंदियां .
जीवन साथी का प्यार-मनुहार कितने दिन ?
फिर संतानों का प्रजनन 
उनका पालन-पोषण 
ममत्व भी, दायित्व भी.
जननी और पाल्या,
गृह लक्ष्मी,
गृह स्वामिनी ,
पति की अर्धांगिनी 
कितने सारे विशेषणों के आभूषण .
किन्तु क्या, कभी किसी ने पढ़ा नारी का मन?
जहां जन्मी-
उससे पृथक हो जाना उसकी नियति है .
जिसे जीवन सौंपा -
वह स्वामी पहले है, बाद में पति है.
जिन्हें जन्म देने, पालने-पोषने में.
अपना यौवन सुख बलिदान कर दिया 
वे भी कब हो पाते हैं उसके ?
नारी जीवन की यह कैसी गति है.
उसकी एक भी भूल कभी क्षमा नहीं की गयी 
आदि काल से नारी जीवन की यही कहानी है.
किन्तु उसकी पीड़ा किसने जानी है?

Sunday, August 14, 2011

(93) आप क्या करेंगे जगदीश्वर ?

पति शब्द पर पुरुष का एकाधिकार समाप्त 
अब महिला भी हो सकती है पति
आश्चर्य क्यों?
देखिये ! भारत की राष्ट्रपति महिला हैं.
देश के संविधान में-
सबको समान अधिकार प्राप्त है.
भाषा, भूषा और लिंग का भेद पूरी तरह समाप्त है.
बात यहीं तक सीमित नहीं,
अब महिला भी बन सकती है पति .
और पुरुष बन सकता है पत्नी.
यह हम नहीं अदालत कहती है.
जहां प्रकृति नियंता ईश्वर की आत्मा रहती है?
अब देश के कानून में-
समलैंगिक यौन संबंधों के खिलाफ कोई धारा नहीं है.
आप लाख भारतीय संस्कृति की दुहाई दें-
लेकिन आपके पास इसे रोक पाने का कोई चारा नहीं है.
हाँ ऐसे संबंधों में आपसी सहमति अनिवार्य है.
फिर क़ानून को भी ऐसा रिश्ता स्वीकार्य है.
पहले केवल औरत जनती थी बच्चा 
लेकिन अब पुरुष भी ऐसा कर रहे हैं.
वे अपनी कोख में पाल, बच्चा जन रहे हैं.
पुरुष, पुरुष के साथ विवाह करने लगे  हैं
और महिलाएं, महिलाओं के साथ
हे प्रकृति नियंता!
दुनिया ने आपके बनाए कानून बदल डाले
अब आदमी खुद अपना नियंता बन गया है.
अब वह खुद बन रहा है ईश्वर.
फिर आप क्या करेंगे जगदीश्वर?

Friday, August 12, 2011

( 92 ) चेहरे हैं मक्कारों के

सड़कें नाम हुईं कारों के, फुटपाथें बाज़ारों के
जंगल वे जंगल विभाग के, जोत-खेत सरकारों के
दफ्तर, अफसर - बाबू घेरे, जहां दलाली आम हुई
पुलिस सड़क पर करे वसूली, थाने थानेदारों के .

नदियाँ , तीरथ , घाट पुजाऊ पंडों की जागीर हुए 
मंदिर-मंदिर जमें पुजारी, दोनों हाथों लूट रहे 
बस भाड़े में जेब कट रही, रिश्ते-नाते दूर हुए
जो कुछ बाकी बचा, छिपाते नज़रों से बटमारों के.

राजनीति में काबिज गुंडे, सरकारों में बैठे चोर
शासन में भी हेरा-फेरी करने वालों का ही जोर
अस्पताल दल्लों के हाथों, डॉक्टर चांदी काट रहे
भरी आदालत वादी लुटते, मौज-मजे बदकारों के.

धरना, रैली और प्रदर्शन पर लाठी की मार पड़े 
टुकुर-टुकर हम ताकें यह सब, चौराहे पर खड़े -खड़े 
बोलो मालिक कहाँ जायं अब, किससे हम फ़रियाद करें 
जिधर उठाकर नज़रें देखो , चेहरे हैं मक्कारों के.


Wednesday, August 10, 2011

(91) मायावी दानव

वे दादी-नानी की काल्पनिक कहानियां 
मायावी दानव और उसका तिलिस्म 
जो अपने विरोधियों को पत्थर बना देता था 
किसी राजकुमारी को अपहृत कर बंदी बना लेता था
उससे जो भी टकराता .
वह या तो मारा जाता-
या पत्थर का हो जाता
उसने जाने कितनी  गर्दनों को कतरा .
जाने कितनों  को बनाया भेड़ा -बकरा 
उसे वर्षों तक कोई हरा नहीं पाया 
क्योंकि उसकी आत्मा -
उसके प्राणों का रहस्य कोई नहीं खोज पाया .
फिर किसी तरह भेद खुला ,
कि दानव की आत्मा -
पिंजरे में बंद तोते में कैद है .
जब वह तोता मरेगा-
तो दानव भी निर्जीव हो जायेगा 
सात तालों में बंद तोता
अभेद्य सुरक्षा तंत्र से घिरा तोता
तिलिस्मी चक्रव्यूह में कैद तोता
और उस तोते में बसी दानव आत्मा
जहाँ न पहुंचना आसान था
और न तोते को मार पाना .
फिर एक राजकुमार का दृढ निश्चय
और उसका मार्ग प्रशस्त करने वाला फकीर
उसने राह दिखाई ,
राजकुमार को तिलिस्मी अंगूठी पहनाई .
अब वह अदृश्य हो सकता था.
सुरक्षा घेरे को भेद तोते तक पहुँच सकता था.
यह संभव हुआ -
राजकुमार ने तोते की गर्दन मरोड़ी
और दानव धराशाई हो गया .

आज देश में बहुत सारे दानव हैं
उनहोंने भी लोकतंत्र की राजकुमारी को कैद कर रखा है.
तोतों में नहीं-
विदेशी बैंकों के रहस्यमय खातों में.
देश को किसी राजकुमार, किसी फ़कीर का इंतज़ार है
क्या कोई राजकुमार आएगा ?
कोई फ़कीर उसे मार्ग दिखायेगा ?
वह भेदेगा रहस्य को ?
पहुँच सकेगा उन बैंक खातों तक?
और यह देश-
देश का लोकतंत्र दानवों के आधिपत्य से मुक्त हो पायेगा ?

Sunday, August 7, 2011

(90)खुद को रुसवा कर गए

बुज़दिलों की फ़ौज फिर बढ़ने लगी है देश में ,
बढ़ रहे  हैं  खुदकुशी  के मामले हर दिन नए  /
आन की खातिर कभी, या देश की खातिर कभी ,
जान  देते  लोग थे , अब  वे  जमाने  लद गए  /

इश्क में नाकाम तो मंजिल है जिनकी खुदकुशी ,
इम्तिहां में  फेल  हों , तो  भी  तलाशें  खुदकुशी /
कितने नाज़ुक दिल हैं इस दम, मोम हैं या रेत हैं ,
जो तनिक  सी  आँच  में पिघले, हवा में बह गए /

जिधर  देखो !  नौजवानी , इश्क में  बीमार है  ,
हर किसी को बस हकीम-ए-इश्क की दरकार है /
इश्क क्या वे  ख़ाक  फ़रमाएंगे , ये सोचो ज़रा ,
जो ज़रा से तल्ख़  झोकों  में  जड़ों से ढह  गए  /  

जो  कभी  नाकामियों  के खौफ से  डरते नहीं  ,
लड़ते हैं वे , जीतते भी  , इस तरह मरते नहीं  /
जिन्दगी खोकर के किसने , क्या भला हासिल किया ,
जान से खुद भी गए और खुद को रुसवा कर गए  /

Friday, August 5, 2011

(89) उनके सपने उड़ान भरने दो

छोड़कर उंगलियाँ चलाओ उन्हें 
खुद उन्हें अगला पाँव धरने दो .
जवानी उफनती नदी सी है  ,
राह खुद ही तलाश करने दो  /

सोच सकते हैं वे , गलत क्या है ,
और क्यों, कब , कहाँ सही क्या है .
उनके सपनों के पंख उगने दो ,
उनके सपने उड़ान भरने दो  /

हटा दो  पत्थरों को राहों से ,
तुम से मुमकिन हो तो करो इतना .
ठोकरें खुद उन्हें सबक देंगी  ,
उनको मंजिल तलाश करने दो  /

थामकर बांह चलोगे कब तक ,
अपने पैरों वे कब खड़े  होंगे  ?
लड़खड़ाएंगे फिर वे संभलेंगे ,
उन्हें खुद आप से सँवरने दो  /

कैद पिंजरों में मत करो उनको ,
खोल दो बंदिशें सभी उनकी  .
कितनी लम्बी उड़ान भरनी है,
फैसला खुद उन्हें ही करने दो  /

Wednesday, August 3, 2011

(88) भारत वर्ष ही अभिशप्त है ?

इस देश में  अब  प्रेरणा,  पौरुष ,  पराक्रम  अस्त  है,
साहित्य, संस्कृति , सृजन, शुचि ,संवेदना संत्रस्त है .
अन्याय के प्रतिकार की तो बात ही मत कीजिये ,
अधिकार अपने मागने का , हौसला तक पस्त है .

उत्कर्ष  के, उत्थान  के, निर्माण, नव निर्माण के ,
बनते हैं कितने , रोज फर्जी कागजों पर आंकड़े ,
यह आंकड़ों का खेल भी, बाजीगरी का खेल है  ,
बस मस्मरेजम खेल में , सरकार अपनी व्यस्त है.

हाथ खाली हैं जवानों के, वे रह- रह मल रहे हैं  ,
बुद्धिजीवी !  बंद कमरों में जुगाली कर रहे हैं  ,
याकि  टी वी चैनलों पर बस ज़बानों की नुमाइश ,
मानो प्रवचन बांचता , यह वर्ग भी सन्यस्त है .

हर महकमा, हर मुलाजिम , लूट के पर्याय जैसा ,
देश का क़ानून , खुद में पंगु सा, असहाय जैसा ,
पेट उतने ही बड़े , जितनी बड़ी वे कुर्सियों पर ,
देश !  ईश्वर के भरोसे है , व्यवस्था ध्वस्त  है .

कुछ अस्त है, कुछ पस्त है , कुछ त्रस्त, कुछ संत्रस्त है ,
लगता  है , जैसे  देश  भारत वर्ष   ही अभिशप्त है .

.

Monday, August 1, 2011

(87) यह जीवन है ! ! !

जीवन के पाँच तत्त्व -
पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और हवा 
और पाँचों दैनंदिन जीवन में गतिमान .
युद्ध का प्रतीक पृथ्वी, वीर भोग्या वसुंधरा .
संघर्ष का प्रतिमान अग्नि,ताप भी- तेज भी .
प्रवाह का द्योतक जल, जुएँ जैसा अनियंत्रित .
शून्य का बिम्ब आकाश, अनंत  आशाओं सा .
और जीवनदायिनी वायु, जो अदृश्य है - पहेली है .

                           (१ )
जीवन युद्ध है .
यहाँ विजय भी संभव है तो पराजय भी ,
जैसा कि हर युद्ध में होता है .
किन्तु फिर भी आदमी जीतना चाहता है, केवल जीतना .
जो जीत नहीं पाते ,
साहस खो देते हैं,
वे ही वरण करते हैं आत्म- वध का मार्ग .
दूसरी सेनाओं से लड़ते हुए -
सैनिक भी तो पराजित होते हैं ,
तो क्या वे आत्महत्या कर लेते हैं ?

                      (२ )
जीवन संघर्ष है .
अर्थात जीवन जीना है तो,
लड़ना होगा, सिर्फ लड़ना .
और कोई मार्ग भी तो नहीं है .
जो संघर्ष से घबराते हैं ,
वे बिना लड़े ही हार जाते हैं .
फिर वे दायित्वों से विमुख-
पलायनवाद का मार्ग अपनाते हैं .
और सारा जीवन -
दूसरों की कृपा पर आश्रित ,
दूसरों की झिड़कियाँ सहकर बिताते हैं .

                       (३ )
जीवन जुआं है .
जहां आवश्यक नहीं-
कि हर पाशा सीधा ही पड़े .
किन्तु यह प्रकृति प्रदत्त मजबूरी है.
न चाहते हुए भी -
इस जुएँ में पाशा फेकना जरूरी है .
हर पाशा उलटा भी नहीं पड़ता ,
जब भी पाशा तुम्हारे पक्ष में आयेगा .
अनायाश ! सब कुछ ठीक हो जाएगा .

                      (४ )
जीवन आशा है .
अर्थात आशा ही जीवन है .
आशाएं बलवती होती हैं.
तो वे प्रायः फलवती भी होती हैं .
जो आशा की डोर नहीं छोड़ता ,
वह प्रायः पार होता है .
और जो निराश हो गया,
वह भाग्य को कोसता हुआ रोता है.

                   (५ )
जीवन पहेली है .
ऐसी पहेली, जो कभी हल नहीं होती .
जिसका कोई सिरा पकड़ में नहीं आता ,
ठीक हवा की तरह .
लेकिन इस पहेली से जूझना ही जीवन है .
यह कभी हंसाती है, कभी रुलाती है .
कभी उलझाती , तो कभी खुद रास्ता दिखाती है .

Friday, July 29, 2011

(86) जिंदगी गम ही नहीं

जिंदगी गम ही नहीं, खुशनुमा एहसास भी है ,
ज़रा तलाश के देखो, वो आस-पास भी है.

ज़मीं की मुश्किलों में मुब्तिला क्योंकर रहना,
उड़ान भरने को सारा खुला आकाश भी है.

गम की गठरी को संजोने से दर्द होता है,
मगर उसी में कहीं पर छिपी मिठास भी है.

जिंदगी के ग़मों को ले के कहाँ तक रोयें, 
अँधेरा है कभी तो फिर कभी उजास भी है.   

ये नाचता है जहाँ , बस उसी की सरगम पे,
जिसमें है जूझने का जज्बा और आस भी है .

Tuesday, July 26, 2011

(85) राजनीति संतों का काम नहीं ?

अन्यायी राजाओं का अंत करने वाले परशुराम, 
ब्रह्मा की सृष्टि को चुनौती देने वाले विश्वामित्र ,
अत्याचारी शासक नन्द वंश के विनाश की शपथ लेकर -
चरवाहे बालक को यशस्वी सम्राट बनाने वाले चाणक्य ,
सिख गुरू नानक और गुरू गोविन्द सिंह ,
और आधुनिक युग में -
भारतीय स्वाधीनता संघर्ष की बेमिसाल , मशाल ,
ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेकने वाले -
मोहन दास करमचंद गांधी ,
इनमें से कौन नहीं था संत ?
देश- दुनिया में और भी हैं ऐसे अनंत /

ये सब युगातीत राजनैतिक इतिहास के महाग्रंथ हैं /
और सच्चे अर्थों में -
वे अपने समय के संतों से भी बड़े संत हैं /
कौन कहता है -
कि  राजनीति संतों का काम नहीं है  ?
व्यवस्था को गलत दिशा में भटकने से रोकना ,
संतों का वास्तविक काम यही है /
और सच यही है कि-
राजनीति में असंतों के वर्चस्व के कारण ही -
अन्याय, उत्पीड़न, भेदभाव और भ्रष्टाचार के मामले बढ़े हैं /
एक प्रश्न और -
क्या राजनीति असंतों (दुष्टों ) का काम है ?
जो लोग इस प्रश्न पर मौन हैं /
सोचिये, वे लोग कौन हैं ?

बिना व्याख्या के स्पष्ट है -
जो राजनीति में हैं , वे संत नहीं हैं /
वे मुंशी प्रेमचंद, निराला या पन्त नहीं हैं /
वे समाज की व्यथा से बहुत दूर हैं /
या यह कि-
वे ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में नासूर हैं /
वे नहीं चाहते -
उनके तिकड़म और हेराफेरी को कोई संत (सज्जन ) जाने /
उनकी मक्कारी और बेईमानी पर उँगली ताने /
इसीलिये वे संतों पर उँगलियाँ उठाते हैं /
क्योंकि एक आँख वालों को -
दोनों आँखों वाले कहाँ सुहाते हैं ?


  

Sunday, July 24, 2011

(84) राजनीति और धर्म

धर्म, पूजा-पद्धति का नाम नहीं ,
धर्म,जीवन पद्धति है.
जिसके आदर्शों में-
दया है, करुणा है,
प्यार है, नैतिकता है,
सहयोग है, सदाचार है ,
अन्याय का प्रतिकार है.
और वे सब नियम-उपनियम भी -
जो मानवता  के लिए आदर्श माने जाते हैं.  
जो ऐसे धर्म को नशा मानते हैं,
उन्हें आप क्या मानते हैं?

और राजनीति के वे कथित पहरुए -
जो राजनीति में धर्म के विरोधी हैं ,
क्या परोक्ष वे-
अधर्म की राजनीति के पक्षधर नहीं हैं ?
मानस चौपाई की अर्धाली-
''राजनीति बिनु धन, बिनु धर्मा ''
अर्थात राजनीति में -
धन और धर्म दोनों आवश्यक हैं .
उन्हें धन याद है, धर्म नहीं 
इसीलिए देश में-
अधर्म की राजनीति फल रही है
जहाँ केवल अधर्मियों की ही चल रही है

Saturday, July 23, 2011

(83) जीवन की सच्चाई

बचपन ! गोद, पालने और खेल में 
कैशोर्य ! पढ़ाई में 
तरुणायी ! प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा की दौड़ में 
परिपक्वता ! पत्नी और बच्चों की फरमाइशों में 
प्रौढ़ावस्था ! संतानों का भविष्य संवारने में
और बुढ़ापा -
घर- परिवार को एकजुट रखने में ,
रिश्तों को निभाने में ,
अवशेष को संवारने में बीत जाता है /
आदमी -
अपने लिए कब जी पाता है ?
वह सारी जिन्दगी -
कोल्हू के बैल सा खटता है /
जिन्दगी के ताने , उलाहने और समय के थपेड़ों में -
लगातार टुकड़े- टुकड़े बटता है  /
इस आपाधापी में -
वह जाने क्या - क्या सहता है /
फिर उसे अपना -
अपने खुद के कुछ होने का ध्यान कहाँ रहता है  ?
जीवन संध्या में, जब वह -
जिन्दगी का हिसाब जोड़ता - घटाता है ,
तो अपने पीछे -
बस केवल रिक्ति ही रिक्ति पाता है  /
यही मानव जीवन की सच्चाई है ,
जहाँ एक ओर कुआँ है -
और दूसरी ओर खाई है  /      

Tuesday, July 19, 2011

(82) नाचता तब मन हमारा

जब मचलती व्योम से , भू पर उतरती वारि धारा ,
मेह   की बूदों के संग- संग नाचता तब मन हमारा  .

पत्तियों को छू ,उतर कर टहनियों से , डालियों पर ,
द्रवित होकर बूँद ढलती, जब उतरती है धरा पर ,
फिर सहज बहती है पहले मंद, फिर गतिमान होकर ,
हुलसती अपनों से मिल वह, थिरकती निज मान खोकर ,
हर्ष ध्वनि करती हुई, नद  धार से मिलती है धारा .
 मेह की बूंदों के संग- संग नाचता तब मन हमारा .


वर्षा रानी का प्रकृति से मिलन या अभिसार भू पर ,
वह टपा- टप पाद स्वर , पाजेब की झनकार मनहर ,
दादुरों की तान के संग, कोकिला का राग सस्वर ,
वह छपा- छप थाप  संग झींगुर बजाते वाद्य  झांझर ,
और नभ में मेघदूतों का जभी बजता नगारा
मेह की बूंदों के संग-संग नाचता तब मन हमारा.

रंग धानी, अंग धानी, कुसुम कलि के झंग धानी,
और ज्यों सावन के रंग में, प्रकृति का हर रंग धानी,
उल्लसित, पुलकित ह्रदय थल, आर्द्र तन तो आर्द्रतम मन,
मात्र वातावरण में ही नहीं, उर में खिले सावन ,
झूलता सावन के झूले में लगे जब विश्व सारा,
मेह की बूंदों के संग-संग नाचता तब मन हमारा.

Sunday, July 17, 2011

(81) आतंक

आखिर क्यों होते हैं बार-बार आतंकी हमले ?
क्यों मच जाती है अचानक अफरा- तफरी ?
क्यों चीखों में बदल जाती हैं आवाजें ?
क्यों हंसती- खेलती जिंदगियां -
बदल जाती हैं लाशों में ?
कहते हैं, आतंक का कोई मजहब नहीं होता ,
लेकिन मकसद तो होता होगा ?
वह मकसद क्या है -
वहशीपन, दरिन्दगी ,
नफ़रत या पैसा ,
मूर्खता या राष्ट्रद्रोह ?
आतंकी घटनाओं में  हो सकती है विदेशी साजिश ,
लेकिन हाथ नहीं /
वे हाथ प्रायः देशी होते हैं /
ये, वे कुत्ते हैं-
जो अपना ही खून चाटकर आनंदित होते हैं /
वे पागल हैं ,पूरी तरह पागल !
और उनका इलाज है , मौत  !
मौत से कम कुछ भी नहीं /
इन पर रहम करना -
खुद के और देश के साथ गद्दारी है /
सवा सौ करोड़ दिलों में दहशत की कीमत पर,
हम रहमदिल कैसे हो सकते हैं ?
ये रक्तबीज हैं ,
इन्हें मारो, बिना रक्त की एक बूँद जमीन पर गिराए /
खुद मरने से पहले मारिये ,
यही आख़िरी रास्ता है /
फिर देशी- विदेशी का भेद न हो /
क्या जुटा पायेगा, इतना साहस यह देश ? ?

Friday, July 15, 2011

(80) रिश्ते

रिश्ते केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं होते
वे बन सकते हैं-
किसी से भी, कहीं भी, कभी भी
बस उनमें ईमानदारी हो
एक-दूसरे के प्रति वफादारी हो
वे स्वार्थ और लोभ से परे हों
दोनों दिल उमंग से भरे हों
दोस्त, मित्र, सहयोगी-
रिश्ते को कुछ भी दें नाम
लेकिन जब वक्त पड़े-
तो आयें एक दूसरे के काम.

वे जो लोकलाज वश-
सामाजिक विवशताओं में,
या मजबूरियों में
ढोये जाते हैं
वे जिम्मेदारियां तो हो सकते हैं-
लेकिन रिश्ते नहीं हो पाते हैं
जहाँ बस स्वार्थ का नाता हो-
वे यथार्थ में रिश्ते नहीं होते
पत्नी, पति  की-
और पुत्र, पिता के नहीं होते
निभ जाएँ तो बिना नाम दिए-
साथ-साथ चलते जिंदगी गुज़र जाती है
यह बात अलग है-
कि ऐसे रिश्तों को दुनिया नाम नहीं दे पाती है.

Wednesday, July 13, 2011

(79) पत्नी !!

पत्नी !पृथ्वी का वह प्राणी है ,
जो कभी संतुष्ट नहीं होती  /
पति की होकर भी,  जो पति की नहीं होती /
वह कभी बहू है, कभी माँ , कभी सास-
कभी दादी और कभी नानी है /
पति उसके लिए -
महज एक कमाऊ प्राणी है /
उसके पास -
पत्नी होने के अतिरिक्त ढेर सारे रिश्ते हैं /
और पति महोदय !
सारी जिन्दगी इन्हीं रिश्तों की चक्की में पिसते हैं /
वह अपने इन रिश्तों में , असीम सुख पाती है /
इसीलिये -
पत्नी होते हुए , पत्नी कब बन पाती है ?
घर के बाहर आदमी भले ही शेर हो ,
लेकिन घर में प्रायः -
पत्नी ही उस पर शेरनी जैसी गुर्राती है /
उसके पास -
जिन्दगी भर की शिकायतों का पिटारा है /
और पति -
पत्नी के सामने , सिर्फ बेचारा है /
यूं  तो वह ,
पति की लम्बी उम्र और सलामती के लिए -
दर्जनों व्रत और अनुष्ठान करती है /
लेकिन पति को यह एहसास कराने से नहीं चूकती ,
कि वह -
उसके साथ जिन्दगी के दिन भरती है /
वह निरंतर समस्याओं की-
इतनी बड़ी थाती है ,
कि उन्हें हल करते - करते
पति की सारी उम्र गुजर जाती है /

Monday, July 11, 2011

(78) नर कितना असहाय हो गया ?

वर्दीवाला ! शब्द आजकल दहशत का पर्याय हो गया ,
जिसकी लाठी, भैंस उसी की, यही वाक्य अब न्याय हो गया /

जो वर्दी एहसास सुरक्षा का देती थी, अब बिकती है ,
पदवालों, पैसेवालों के आगे नतमस्तक झुकती है,
हाय नौकरी, आह नौकरी, स्वाभिमान के दाम नौकरी,
रोजी -रोटी जो न कराये, नर कितना असहाय हो गया /

जो कल तक खाकी वर्दी से छिपते फिरते भय खाते थे,
और वही वर्दीवाले जिनकी  तलाश में मंडराते  थे ,
अब वे जनप्रतिनिधि, नेता हैं, काले धंधे चला रहे हैं,
वर्दी अब उनकी रक्षक है, शुरू नया अध्याय हो गया /

सीने पर पत्थर रखकर, वे लाठी-गोली दाग रहे हैं,
लेकिन बागी कहाँ थम रहे, लगा वारि में आग रहे हैं,
शायद पता नहीं है इनको, पानी कितना खौल चुका है,
विश्ववन्द्य यह देश आज लगता है कोई सराय हो गया /

वर्दी खाकी हो, काली हो या सफेद हो सब बिकती है ,
न्याय और अन्याय नहीं, बस नोटों की गड्डी दिखती है ,
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट तक झूठी मन माफिक बनती है ,
भरी अदालत झूठ बिक रहा, दुष्कर कितना न्याय हो गया  /

एक नहीं हर ओर दुशासन-दुर्योधन से दुष्ट दरिन्दे,
देश द्रोपदी जैसा कातर, चीरहरण कर रहे लफंगे,
शकुनी मामाओं का जमघट, उलटी धार बहाते पानी ,
शातिर, शोरेपुश्तों के आगे, सब कुछ निरुपाय हो गया  /

Tuesday, July 5, 2011

(76) गंगे तुम्हारी वन्दना

पतित पावनी गंगा के पुनरोद्धार  के लिए अनशन रत रहे, संत निगमानंद की मृत्यु पर उस हुतात्मा के माँ गंगा के प्रति देहदान को श्रद्धांजलि स्वरुप ये पंक्तियाँ -

गंगे तुम्हारी वन्दना! गंगे तुम्हारी वन्दना !
हे पतित पावनि, शुभगते, शत-शत तेरी अभिनन्दना.

माँ भारती की सहचरी, सहजीवनी, सहवासिनी
सुखदा, वरा, नीरासदा, कलि कलुष पातक नाशिनी 
माँ भारती जैसा ही तेरा, स्नेह सबको  मातृवत 
वह देवकी, यशुमति है तू, अदभुत तेरी आलिंगना 
गंगे तुम्हारी वन्दना! गंगे तुम्हारी वन्दना !

सुजला तू ही, सुफला तू ही, तू मातु मलयज शीतला 
तू पाल्या, तू तारिणी , संपन्न तू षोडश कला 
हे सरस सलिला , हम अकिंचन क्या तुझे देंगें भला 
हैं भाव से तेरे जननि,स्वीकार अक्षत-चंदना
गंगे तुम्हारी वन्दना! गंगे तुम्हारी वन्दना !

हे सुरसरी, भागीरथी, विष्णुप्रिया, देवापगा  
अविरल रहे धारा तेरी, माँ पग न अपने डगमगा 
तेरा मलिन मुख देख सारा देश आशंकित-व्यथित 
क्या एक 'निगमानंद' प्रस्तुत हम सभी की अर्पणा
गंगे तुम्हारी वन्दना! गंगे तुम्हारी वन्दना !

Saturday, July 2, 2011

(75) रिमझिम ये फुहारें आईं

 पहली बरसात की रिमझिम ये फुहारें आईं ,
सूखती  धरती  के  चेहरे   पे  बहारें आईं  /

पी कहाँ  प्यासे  पपीहे  ने पुकारा  था कल ,
सूखते झील, नदी, नालों, ने मागा था जल,
पेड़- पौधे भी थे प्यासे , लिए बोझिल आँखें ,
सबके  चेहरों  पे  उम्मीदें  व  करारें लाईं /

दादुरों  की नयी  पीढ़ी  ने  मचाई  हलचल ,
आ गया प्यार मेरा, डाल से बोली कोयल  ,
छत पे चिड़ियों का चहकता हुआ कलरव गुंजन ,
तितलियाँ झूमती फूलों पे  फिरें इतरायीं  /

घास मुसकाई तो मिट्टी ने उड़ाई खुशबू ,
हवा  में  गंध  घुली, झूमती आयी खुशबू  ,
बादलों की घटा में धूप भी सहमी- सहमी ,
तपन घटी ,  मयूर मन में बजी शहनाई /

थोड़ी  बूँदों  ने  किसानों  के  खिलाये  चेहरे ,
अब तो हर बेल के सिर, फूल के होंगे सेहरे   ,  
उर्वरा  उगलेगी  सोना  किसान  के  घर में .
अनगिनत सुनहरे ख़्वाबों की कतारें लाईं  /


Friday, July 1, 2011

(74) मुझे मर जाने दे ( ग़ज़ल )

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे ,
कब से रीता हूँ , तू अब तो मुझे भर जाने दे /

बाद मुद्दत के दर- ए -आब पे पहुँचा हूँ मैं  ,
अब हमारी भी तरफ , शोख लहर आने दे  /

यूँ तो शिकवे हैं बहुत ,बाद में कर लूँगा मैं ,
लबों से जाम अभी , इश्क का टकराने दे  /

डूबना चाहता हूँ , आब- ए - मोहब्बत में मैं,
रोकना अब नहीं , लहरों पे लहर छाने  दे  /

डूब जाऊँ भी अगर , तो कोई मलाल नहीं ,
चाहता कौन है जीना ,  मुझे मर जाने दे /

Wednesday, June 29, 2011

(73) वह सकुचाती, शर्माती सी

वह सकुचाती, शर्माती सी , नाजों के बीच पली जैसी ,
मानो बगिया के बीच खिली हो , कोमल कुसुम कली जैसी /

वह श्वेत धवल परिधान युक्त , थी भीड़ मध्य भी अलग- थलग ,
हम अपलक उसमें खोये से , वह मूरत मोम ढली जैसी  /

वह स्मित, मृदु स्वर में बातें, अधराधर का उठना- गिरना ,
पुष्पों से ज्यों, मधु रस वर्षा ,  मिश्री की लगे डली जैसी   /

वह विधना की अनुपम कृति सी , वह देवलोक की देवि सदृश ,
साकार कल्पना की छवि सी ,  भोली  सी  और  भली  जैसी /

शारदा, भवानी, लक्ष्मी ज्यों, आयी हो धरकर बाल रूप  ,
वह तेजस, वह लावण्य , लगे जैसे वृषभानु लली  जैसी  / 

Tuesday, June 28, 2011

(72) [ पुराना सब बदल डालो ]

इमारत जब नयी तामीर करनी हो तो अक्सर ही ,
पुरानी कुछ दबी यादें , उभरकर आ ही जाती हैं  /
अगर खुद का बनाया आशियाँ , खुद तोड़ना हो तो ,
वो यादें आँख में , शबनम कभी छलका ही जाती हैं /

मगर जब फिर उसी दर पर, बनाना हो नया घर तो ,
पुराना घर, दर- ओ- दीवार सब कुछ तोड़ना होगा  /
ये माना पीढ़ियाँ - दर- पीढ़ियाँ गुज़री हैं इस घर में ,
मगर उस भावना, उस मोह को अब छोड़ना होगा /

वही सिद्धांत, फिर से मुल्क की तामीर की खातिर ,
ज़रा सा संगदिल होकर, ज़रा सा सख्त हो अपना /
नया कुछ भी बनाने में , बहानों की नहीं चलती ,
हकीकत में नहीं बदलेगा , नवनिर्माण का सपना  /

है जिस रस्ते पे इस दम मुल्क , वह मंजिल से भटका है ,
वहां  रोड़े,  अँधेरे  हैं,  बहुत  शातिर     लुटेरे    हैं   / 
फिर उस मंजिल का क्या मतलब, जहां मकसद न हो हासिल ,
जहां इन्साफ मुश्किल हो ,जहां बस गोल घेरे हैं  /

पुरानी रूढ़ियाँ  या घर, बदलना ही उन्हें बेहतर ,
जो करना है, वो करिए आज , कल- परसों पे मत टालो /
निकल आओ अंधेरों से , अँधेरे दर्द देते हैं ,
नया फिर से बनाओ घर, पुराना सब बदल डालो  /  


Monday, June 27, 2011

(71) कैसे चुप रहूँ मैं ?

नहीं फितरत, धधकता आग के जैसा रहूँ मैं ,
नहीं आदत,कि शोलों सा भड़कता ही रहूँ मैं ,
मगर जब अन्नदाता स्वयं भूखा मर रहा हो ,
जवाँ इस देश का , खुद आप से ही लड़ रहा हो ,
सिसकती बेटियों के जिस्म नोचे जा रहे हों ,
वतन को बेच , रखवाले वतन के खा रहे हों ,
हो अंधा देश का क़ानून , तो कैसे सहूँ मैं ?
ये सब कुछ देख, आँखें फेर कैसे चुप रहूँ मैं ?

उठायी थी कलम यह सोच कर, सत्पथ चलूँगा ,
अँधेरे रास्तों को दीप बन रोशन करूंगा  /
थीं तब भी अड़चनें सन्मार्ग पर, इतनी नहीं थीं,
अँधेरे बढ़ रहे थे, पर कंदीलें जल रही थीं ,
वो था वह दौर जब इन्सानियत कुछ-कुछ मरी थी ,
चमन में रोग था , पर पत्तियाँ तब तक हरी थीं /
थे जो भी बागवाँ, वे स्वार्थ में अंधे नहीं थे ,
जमीं के लोग थे वे ,इस तरह नंगे नहीं थे /

मगर इस दौर सारे मुल्क में उल्टी हवा है,
हर एक डाली पे उल्लू है, बताओ क्या दवा है ?
चमन में फूल, पत्ती, फल नहीं, गुब्बार है अब ,
शज़र को क्या कहें, मिट्टी तलक बीमार है अब /
जरूरत है दवाई की चमन को,खाद- पानी की ,
सफाई की, निराई की, हिफाज़त, निगहबानी की /
हवा कुछ कह रही है,सुन तो लो सरगोशियाँ उसकी,
वो शायद पूछती है,अब हिफाज़त कैसे हो इसकी ?
     
   

Saturday, June 25, 2011

(70) { तुम्हें ही भेदना है }

पल रहा अन्याय उर में , तो उसे अभिव्यक्ति भी दो ,
गाँठ मन की खोल दो, अंतःकरण की शक्ति भी दो /
देश यह पालक पिता है और धरती माँ सभी की ,
इसलिए इसको समर्पण भाव दो,अनुरक्ति भी दो /

मानता हूँ कुछ जबानों पर यहाँ ताले जड़े हैं ,
घाव भी हैं और पावों में बहुत छाले पड़े हैं /
किन्तु क्या बस इसलिए चुपचाप सब सहते रहोगे ?
देश का इतिहास , अस्सी घाव तन, फिर भी लड़े हैं /

प्रश्न केवल यह नहीं है , आज क्या कुछ हो रहा है ,
प्रश्न यह है, विश्व में भारत विभव क्यों खो रहा है ?
देश के सम्मान का दायित्व सारे देश पर है ,
इसलिए रोको उसे, जो भी अनर्गल हो रहा है /

जी चुके अपनी,  मगर  कर्तव्य तो अवशेष ही है ,
धर्म का अगला चरण, अगली विधा यह देश ही है /
नयी पीढ़ी के लिए भी , पथ बनाना है तुम्हें ही ,
बूँद से चूके , घड़ों से पूरना फिर क्लेश ही है /

आज सारे देश में हर ओर केवल वेदना है ,
और शासक वर्ग की भी मर चुकी संवेदना है /
धूल- कूड़ा है बहुत, अब आंधियाँ फिर से उठाओ ,
व्यूह का यह द्वार अंतिम भी तुम्हें ही भेदना है /  


Friday, June 24, 2011

(69) तब क्या करोगे प्यारे?

अन्ना और रामदेव के आन्दोलनों पर
सरकार की भृकुटी तनी है/
वजह शायद यह कि-
उसके गुर्गों के पास ही सबसे अधिक ब्लैक -मनी है /
यदि बन गया जन-लोकपाल
तो उतर सकती है उनकी भी मोटी खाल /
इसलिए नए- नए तर्क गढ़े जा रहे हैं /
अन्ना और बाबा पर-
साम्प्रदायिकता तथा तानाशाही के आरोप मढ़े जा रहे हैं /
यह सरकार की नयी परिभाषा है /
अनशन करना तानाशाही है -
और लाठियाँ भांजना  ? ? ?

वे कहते हैं कि-
अन्ना और बाबा पहले चुनाव जीतकर आयें /
फिर संसद में बैठकर क़ानून बनायें /
यहाँ इस सारे देश का एक सवाल है -
क्या चुनाव जीतने वालों को ही बोलने का अधिकार है ?
यदि ऐसा  ही है -
तो संविधान निहित मूल अधिकारों की क्या दरकार है ?
एक और सवाल-
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को किस क्षेत्र की जनता ने चुना है ?
उनके हाथ में तो सारे देश का झुनझुना है /
और यह भी कि किसी निर्वाचन क्षेत्र के -
दस-पंद्रह फीशदी मत हासिल कर चुनाव जीतने वाला बड़ा है
या वह व्यक्ति -
जिसके समर्थन में सारा देश मुट्ठियाँ बांधे खड़ा है ?

थोड़ा पीछे लौटिये -
महात्मा गांधी,पटेल, सुभाष ने कौन सा चुनाव लड़ा था ?
लेकिन तब उनके पीछे सारा देश खड़ा था /
गांधीजी को सारे देश ने राष्ट्रपिता माना -
आज भी मानता है /
लेकिन शायद सत्ता से जुड़ा वह वर्ग नहीं मानता -
जो उन्हीं की दुहाई दे , उन्हीं के नाम पर रबड़ी छानता है /

हे स्वयंभू विधाताओं -
पहले जनतंत्र के मायने जानो /
जनता के मन में पल रहे असंतोष को पहचानो /
अभी एक अन्ना के आन्दोलन से हलकान हो -
लेकिन कल जब सारा देश बनेगा  अन्ना हजारे ,
बोलो तब क्या करोगे प्यारे ? ?   

Thursday, June 23, 2011

(68) सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं

मैं सरस्वति पुत्र हूँ , करता नहीं व्यापार हूँ मैं ,
कल्पना का कवि नहीं हूँ,  सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं /

मूक की वाणी, दलित-शोषित ह्रदय की वेदना हूँ,
लोक प्रहरी हूँ, समूचे राष्ट्र की संवेदना हूँ /
एक ही उद्देश्य - जितना हो सके, वह सच कहूं मैं,
पथ विरत या सुप्त  लोगों को, जगाता भी रहूँ मैं /
लेखनी का शस्त्र यह, परमाणु पूरित हाथ मेरे ,
न्याय का सहचर, सखा , अन्याय का प्रतिकार हूँ मैं/
कल्पना का कवि नहीं हूँ,  सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं //१//

सिरफिरा,सनकी,विवादी, शब्द भी स्वीकार मुझको,
लोग विद्रोही कहें, तो भी है अंगीकार मुझको /
अनवरत अन्याय, फिर भी चक्षु कैसे बंद कर लूं ,
मात्र अपने स्वार्थ हित, कैसे ह्रदय पाषाण धर लूं / 
अग्नि जीवन ऊष्मा है, अग्नि तम को जारती है,
इसलिए बस घूमता , लेकर ह्रदय अंगार हूँ मैं /
कल्पना का कवि नहीं हूँ,  सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं//२//

रहबरी चोले  में रहजन, चाल तिरछी चल रहा है ,
और सारे देश के, आक्रोश उर में पल रहा है /
कुर्सियां जिनके तले, वे पट्टियां आँखों पे बांधे,
फिर गरीबों, तंगहालों के, भला हित कौन साधे?
वे बधिर हैं , सिसकियाँ, उनको नहीं पड़तीं सुनायी,
इसलिए संधानता शर, धनुष की टंकार हूँ मैं /
 कल्पना का कवि नहीं हूँ,  सत्य हूँ ,साकार हूँ मैं//३//