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Editor "LAUHSTAMBH" Published form NCR.

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Wednesday, June 22, 2011

(67) कैसे हैं दीवाने लोग ?

आज इधर, कल उधर बैठकर गढ़ते नए बहाने लोग ,
अजब सियासत खेल है, जिसमें  बदलें रोज ठिकाने लोग /

इस पाले में उनको कोसें, उस पाले से इन पर वार ,
पल- पल में ईमान बदलते, सत्ता के दीवाने लोग /

कुर्सी की खातिर इज्ज़त क्या , देश भाड़ में झोंक रहे ,
बेशर्मी की हदें लांघते ,जैसे हों बौराने लोग /

कल खाते थे कसम मिटाने की जिसको , अब उसकी ही,
गोदी में बैठे हैं गाते , फिर से नए तराने लोग /

भीड़ जुट रही उनके पीछे , जिनका कोई कयाम नहीं,
अपने पैर कुल्हाड़ी मारें , कैसे हैं दीवाने लोग /

इन कौवों, गीधों के चंगुल से , गुलशन अवमुक्त  करो ,
उनके ही ये चोंच मारते, जिनके चुगते दाने लोग /   

Monday, June 20, 2011

(66) माँ जैसा और नहीं कोई


तेरी चिंता से ग्रस्त न जाने कितनी रात नहीं सोयी /
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  /

नौ माह उदर  में रख पाला , पीड़ा में भी था अमित लाड़,
जन्मे तो कितने कष्ट दिए, बाहर आये माँ उदर फाड़  /
पर तेरी ममता में उसने , अपने सब कष्ट विसार दिए ,
फिर तेरे लालन-पालन में , खुद के सारे सुख वार दिए /
तेरे हँसने पर खिली और वह तेरे रोने पर रोई ,
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  /

वह पौष - माघ की शीत लहर ,तेरा पल-पल, मल-मूत्र त्याग,
ठंडक से तुझे बचाने में , खुद रातें काटीं जाग -जाग /
तेरे हर संकट को हंसकर , बस खुद पर लेती आयी माँ ,
तेरे लालन-पालन में हर पल , बनी रही परछाई माँ /
तुझको आँचल में छुपा रखा, खुद गीले में लेटी-सोयी ,
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  /

डगमग शैशव का सम्बल वह, बोलना सिखाने वाली माँ ,
बैयाँ-बैयाँ ,टयाँ -टयाँ , चलना सिखलाने वाली माँ /
निज स्तन पान करा तुझको , तुझमें जीवन संचार किया ,
अपना सब मधुमय अंतराल , तेरे पालन पर वार दिया /
तेरे समर्थ हो सकने तक , तुझमें ही सदा रही खोयी ,
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  /

इस दुनिया में , इस पृथ्वी पर,माँ ही सबको लाने वाली ,
इस धरती पर सबसे पहले ,पहला पग रखवाने वाली /
खुद में ही फूला घूम रहा , भूला क्यों जिसकी गोद पला ,
जो माँ को भूल गया , उससे दुनिया में कौन कृतघ्न भला?
पत्नी, सुत, भ्रात सभी रिश्तों में , उनके अपने निजी स्वार्थ ,
निःस्वार्थ प्यार माँ का , उसकी ममता का मोल नहीं कोई /
धरती क्या तीनों लोकों में , माँ जैसा और नहीं कोई  / 

Sunday, June 19, 2011

(65) वेश्या पतिता नहीं होती /

वेश्या पतिता नहीं होती, पतन को रोकती है /
पतित जन की गन्दगी , अपने ह्रदय में सोखती है/
जो विषैलापन लिए हैं घूमते नरपशु जगत में ,
उसे वातावरण में वह फैलने से रोकती है /

यही तो गंगा रही कर , पापियों के पाप धोती ,
वह सहस्रों वर्ष से , बस बह रही है कलुष ढोती,
शास्त्र कहते हैं कि गंगा मोक्षप्रद है, पावनी है ,
किसलिए फिर और कैसे वेश्या ही पतित होती ?

मानता हूँ , वेश्या निज तन गमन का मूल्य लेती ,
किन्तु सोचो कौन सा व्यापार उनका ,कौन खेती ?
और यह भी , कौन सी उनकी भला मजबूरियां हैं ,
विवश यदि होती न, तो तन बेचती क्यों दंश लेती ?

मानता यह भी कि वेश्यावृत्ति , पापाचार है यह ,
किन्तु रोटी है ये उनकी , पेट हित व्यापार है यह ,
देह सुख  लेते जो उनसे, वही उनको कोसते भी,
और फिर दुत्कार सामाजिक भी , अत्याचार है यह /

गौर से देखो , बनाते कौन उनको वेश्याएं ,
और वे हैं कौन, जो इस वृत्ति को खुद पोषते हैं ?
पतित तो वे हैं , जो रातों के अंधेरों में वहां जा -
देह सुख  भी भोगते हैं , और फिर खुद कोसते हैं /  

Thursday, June 16, 2011

(64) पापा ऐसा क्यों होता है

पापा जब तुम बूढ़े होगे ,
जब यह काया थक जायेगी .
और हमारी शादी होगी ,
जब   मेरी  पत्नी आयेगी .

क्या तब दादा-दादी जैसे,
मम्मी और तुम्हें दोनों को,
वृद्धाश्रम में जाना होगा ?.
क्या तब मुझको भी ऐसे ही,
बस तब साल-महीनों में फिर,
तुमसे मिलने आना होगा ?

क्या दादा-दादी दोनों ही ,
कभी युवा थे, तुम जैसे थे?
और कभी क्या ,जैसा इस दम 
मैं छोटा हूँ, तुम वैसे थे ?
तब क्या दादा-दादी तुम से ,
भी यूं प्यार किया करते थे .
मेरा बेटा, प्यारा बेटा,
राजदुलारा वे कहते थे.?
क्या अपनों से दूरी का दुःख ,
पापा तुम तब सह पाओगे ?
मेरे बिन तुम वहां अकेले ,
बोलो कैसे रह पाओगे ?

पापा ऐसा क्यों होता है ,
क्यों सब बूढ़े हो जाते हैं?
अपना घर, अपने बच्चों को,
छोड़ वहां वे क्यों जाते हैं?

special on "FATHER,S DAY"

Wednesday, June 15, 2011

(63) ऐसे तो नहीं थे वे

दुर्गम चढ़ाइयों पर 
पहाड़ों की गोद में 
घने जंगलों के बीच 
प्रकृति के सानिध्य में
वे प्रकृति पुरुष थे .

जंगली पशुओं का आखेट ,
उनकी दिनचर्या का अभिन्न अंग
और उनके भोजन की आवश्यकता थी,
किन्तु वे हिंसक नहीं थे .
उनमें भी भावनाएं थीं,संवेदनाएं थीं .
वे भी जानते थे पीड़ा और दुःख को,
उनमें भी थी मानवता और अपनों के प्रति स्नेह .

अब वे ,वे नहीं रहे .
उनके हाथों में-
बरछे, भाले, धनुष-बाण और बंदूकें हैं ,
जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए नहीं,
अपने उन दुश्मनों से लड़ने के लिए -
जो आज तक उन्हें छलते,उनका शोषण करते रहे हैं .
कानूनन हिंसा अपराध है -
लेकिन तब कहाँ था क़ानून -
जब उन्हें लगातार छला जा रहा था .

वे नहीं जानते थे लोकतंत्र का मतलब,
वे नहीं जानते थे स्वाधीनता का मूल्य 
किन्तु वे आज़ाद थे पूरी तरह अपने अभयारण्यों में 
अपने उन जंगली चौपायों के बीच .
जिन्दगी कुछ ज्यादा कठिन थी,वस्त्रहीन थे वे.
लेकिन वे -
खुद अपने शासक थे, खुद लोक थे,खुद लोकतंत्र थे.
स्वचालित वाहन, कोठी, बंगले और सुविधाओं भरा जीवन ,
उनके लिए परी कथाओं सा था .
वे मानते थे उसे दूसरी दुनिया 
लेकिन उनमें उन्हें पाने का लोभ नहीं था .

फिर वोटों के सौदागरों ने -
उन्हें सपने दिखाए .
उनके अरमान   जगाये और सपनों को दिए पंख.
जीतने के बाद उन्होंने ही उन पंखों को नोचा भी ,
बस उनके बीच के कुछ दलालों को नवाजा .
और फिर यही हुआ बार-बार .
दलालों की समृद्धि बढी -
वे सियासी रसूखदार और ओहदेदार भी बने,
लेकिन वे हर बार और हर एक से छले गए.

यही नहीं -
फिर वे उन जंगलों से भी बेदखल किये जाने लगे ,
जो उनके पालक थे, पिता  थे .
और उस जमीन से भी-
जो उनकी माँ थी .
स्वाभाविक आक्रोश में उन्होंने हथियार उठाये ,
यह प्रतिकार था , लेकिन-
सरकारी भाषा में वे नक्सली, माओवादी कहलाये .

अब वे मारते भी हैं, मारे भी जाते हैं,
लेकिन कोई नहीं जानना चाहता -
की  भोले-भाले आदिवासी किस मजबूरी में हथियार उठाते हैं.
बार-बार उठती है यह बात-
की वे ऐसे तो नहीं थे .
लेकिन कौन समझना चाहता है उनकी व्यथा .
हथियारों से हथियार परास्त किये जा सकते हैं ,
भावनाएं और आक्रोश नहीं.
और जब तक-
व्यवस्था इस बात को नहीं समझेगी ,
तब तक पैदा ही होते रहेंगे -
कानू सान्याल .

Monday, June 13, 2011

(62) हे द्रोपदियों

एक पत्नी के पांच पति ,
शायद तब -
रही होगी यह परम्परा .
किन्तु पांच पतियों की पत्नी द्रोपदी 
शरीर का सुख तो हो सकती है ,
किसी की अर्धांगिनी नहीं हो सकती .

युधिष्ठिर ,भीम,अर्जुन,नकुल, सहदेव,
सबकी सहचरी,सबकी अंकशायिनी ,
महाभारत की अति विशिष्ट पात्र .
महाविनाश की नायिका .
जिसके कारण,जिसके हठ पर,
 ज्येष्ठ-नेष्ट  , अग्रज और सहोदर -
आपस में ही लड़े -
एक-दूसरे का बहाया रक्त 
अपनों का वध कर खुश हुए .
क्योंकि उसी में प्रिया की खुशी थी .

माना की  -
दुर्योधन था अनीति के पथ पर ,
उसमें सत्ता का नशा , शक्ति का दर्प था .
किन्तु-
पांच महाबलियों की प्रिया होने के कारण ,
क्या द्रोपदी में -
अनावश्यक दर्प नहीं था.
वह कर्ण जैसे - दानी, स्वाभिमानी और महात्मा को 
सूत पुत्र कह सकती थी .
तो फिर -
कर्ण का उसके चरित्र पर -
उंगली उठाना  गलत क्यों  था .

छल से या बल से -
पांडवों ने जीती महाभारत .
इसलिए उनके सारे अपराध क्षम्य .
क्योंकि यह परम्परा है -
समरथ को नहिं  दोष गोसाईं 
.इसीलिये तो-
द्रोपदी को चिराकुमारी  कहा गया .
उसे प्रातः स्मरणीय पञ्च कन्याओं में 
दूसरा स्थान दिया गया .
आखिर पांच महाबलियों की पत्नी के -
सम्मान पर कौन उठा सकता है उंगली .

यही आज का भी सच है .
किसी द्रोपदी के चरित्र पर,
कोई उंगली नहीं उठा सकता .
और अगर उठाएगा -
तो कर्ण की तरह निहत्था मारा जाएगा .
वह भी बन सकती है साम्राज्ञी -
बशर्ते वह -
बाहुबलियों/समर्थों की अंकशायिनी हो .
इसलिए हे द्रोपदियों -
विशिष्ट बन चुकी द्रोपदियों से प्रेरणा लो .
तुम भी खोजो ऐसे पति ,
आखिर तुम्हें भी तो साम्राज्य चाहिए .

(61) कलम को बन्दूक बनने से रोको

दुनिया में कलम के कारण
बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ हुयी हैं .
इसीलिये -
कलम को सबसे बड़ा हथियार माना जाता है .
लेकिन यह हथियार उन्हीं को डराता है,
जिनका -
स्वाभिमान, सम्मान और संवेदनशीलता से नाता है.
दुश्चरित्र ,निर्लज्ज और संवेदनहीन लोगों को ,
भला कलम से कौन डरा पाता है .
और उनको भी-
जिनका बस स्वार्थ से ही नाता है .
इसीलिये हर कलमवाला -
जूतेवाला बनने पर आमादा है
यद्यपि कुछ कथित कलमकार -
जूते चाटने में ज्यादा यकीन रखते हैं .
और बदले में सत्ता की जूठन चखते हैं .

फिर भी जूता चल रहा है
और यह जिन पर चलता है
उनसे भी ज्यादा -
उनके तलवे चाटनेवालों को खल रहा है .
पता नहीं , जूता चलाने और जूता दिखाने में -
आक्रोश है या खबर बनने की चाह ,
लेकिन बार-बार खबर बनता   है जूता .
जूता दिखाने वाला पिटा -
और जूते की पिटाई कर , कुछ लोग खुश हैं ',
वे सन्देश दे रहे हैं की , अब जो जूता दिखाएगा 
उसके साथ , ऐसा ही सलूक किया जाएगा .

फिर लोग कलम को , क्यों बनायेंगे जूता 
वे कलम को बन्दूक बनायेंगे 
खुद लोगों की पकड़ की जद से -
बाहर रहकर दनदनाएंगे  .
अर्थात नक्सल और माओवाद की नयी पौध -
तब कौन लडेगा उनसे 
और तब क्या वे रोके जा पायेंगे .

इसलिए हे स्वयंभू विधाताओं ,
 अपने अन्तहकरण  में झांको -
और गंभीरता से सोचो .
भारत के सुखमय भविष्य के लिए -
कलम को बन्दूक बनने से रोको . 

Sunday, June 12, 2011

(60) किसलिए ग़मगीन हो तुम

मथ रही उलझन कोई , या कल्पना में लीन  हो तुम,
किसलिए सिर को झुकाए ,किसलिए ग़मगीन हो तुम.

देखिये उनको, जो पहुंचे शीर्ष पर लड़कर समय से,
बड़ा या छोटा कोई होता नहीं धन और वय से ,
ज्योति अपनी खुद बनो, खुद रास्ता अपना बनाओ,
पथ प्रदर्शक भी बनो,यह सोच त्यागो, दीन  हो तुम. 

दूसरे का ले सहारा जो चले , वह स्वयं क्या है ,
खुद कहाँ पहचान उसकी, हर समय पीछे खड़ा है,
जाय रुक अगला तो रुकना, चल पड़े अगला तो चलना,
खुद नहीं मालूम जाना है कहाँ, पथहीन हो तुम .

 मानता नव पथ सृजन में, श्रम बहुत ,संघर्ष भी है,
किन्तु श्रम,संघर्ष का प्रतिफल ,नया उत्कर्ष भी है,
सोचिये खुद के बनाए मार्ग के अधिपति तुम्हीं हो,
तुम प्रणेता,प्रेरणा,प्रेरक स्वयं स्वाधीन हो तुम .

मरो तो हंसते हुए,पर जियो तो सिर को उठाकर ,
स्वर्ण से कुंदन बनोगे,अग्नि में देखो तपाकर ,
सिर्फ उनको ही डराता समय,जो भयभीत हैं खुद,
करो अपने पर भरोसा,कब , किसी से हीन हो तुम.
किसलिए सिर को झुकाए, किसलिए गमगीन हो तुम.    

Saturday, June 11, 2011

(59) यह कैसा है लोकतंत्र

बेलगाम नौकर, जनसेवक, मालिक दर-दर रिरियाता है.
यह कैसा है लोकतंत्र ,जिसमें बस लोक छला  जाता है.

हे मतदाता खुद को जानो,खुद अपनी ताकत पहचानो,
देश लुटेरों के हाथों में ,मत सौंपो, जागो दीवानों.
बहुत हुआ अब सहन न होता, इन्हें बताना ही यह होगा,
लोकतंत्र के सिंहासन का , असली मालिक मतदाता है.

दान नहीं, हम भीख दे रहे, सीख इसलिए दे सकते हैं,
जिम्मेदारी सौंपी हमने, तो हिसाब भी ले सकते हैं.
नेता पण्डे नहीं , और यजमान नहीं हम हैं घाटों के,
यह एहसास करा दो, मतदाता ही भारत निर्माता है .

इंसानों से इतर नहीं ये,मत इनको भगवान् बनाओ,
क्या जाने कैसे निकलेंगे, मत फूलों के हार पिन्हाओ.
बदलो-परखो, परखो-बदलो, अब अपना सिद्धांत बनाओ,
क्यों हर बार लुटेरा, रहजन ही जनप्रतिनिधि बन जाता है.

हर चुनाव में गलती अपनी और बाद में चिल्लाते हैं,
वे ठगते हैं माना, लेकिन हम क्यों स्वयं ठगे जाते हैं .
गलती एक बार हो सकती , बार-बार ऐसा क्यों होता,
सोचो क्यों अपना ही सेवक, मालिक जैसा गुर्राता है . 

(58) फिर उठा गांडीव अर्जुन

अनवरत अन्याय है,अब पीर पर्वत हो चुकी है ,
भारती के लाल जागो,आज फिर भारत दुखी है .

अनाचारों से भरे फिर मेघ मडराने लगे हैं,
फिर वही वहशी ,दरिन्दे, देश पर छाने लगे हैं.
वे विदेशी थे,लड़े जिनसे,जिन्हें हमने भगाया,
आज देशी पालतू भी, खुद पे गुर्राने लगे हैं.
हे भरत के अंश,उल्टी धार यह कब तक बहेगी,
सच खड़ा नंगा है, लेकिन चोर, व्यभिचारी सुखी है

हाथ जोड़े थे खड़े कल,आज वे उठने लगे हैं,
सच दबाने के लिए, सब चोर फिर जुटने लगे हैं.
हर तरफ गहरा कुहासा है,धुंआ फैला हुआ है,
इस धुएं से सत्यता के, प्राण भी  घुटने लगे हैं.
हर अनाचारी से कह दो , होश में आ जाय वरना,
उबल सकता है , ह्रदय में जो छुपा ज्वालामुखी है.

डालियाँ चुभने लगें खुद के, तो उनको छांट  डालो,
हाथ अपना भी अगर सड़ने लगे,तो काट डालो.
किन्तु उससे भी जरूरी है की पहले भ्रांतियों की,
भेदभावों की ये गहरी खाइयां सब पाट डालो. 
राष्ट्र के हित दुष्ट का मर्दन,ये गीता में लिखा है,
फिर उठा गांडीव अर्जुन,महाभारत छिड़ चुकी है .


  

Tuesday, June 7, 2011

(57) सुराज चाहिए हमें

स्वराज चाहिए हमें, सुराज चाहिए हमें .
वो तब नहीं, वो कल नहीं, वो आज चाहिए हमें.

स्वतंत्रता के वक्त के, वो सब्जबाग क्या हुए ,
प्रजा का तंत्र, लोकतंत्र के वो राग क्या हुए,
वतन के उन शहीदों का लहू पुकार कह रहा ,
फिर इन्कलाब और वही महाज चाहिए हमें.
स्वराज चाहिए हमें,सुराज चाहिए हमें.

जो न्याय कर सके नहीं, नहीं वो तंत्र चाहिए,
असत्य से भरा हो जो, नहीं वो मंत्र चाहिए ,
ये गोलमाल,भ्रष्टता ,नृशंसता,अशिष्टता 
भरा हुआ नहीं ये काम -काज चाहिए हमें.
स्वराज चाहिए हमें,सुराज  चाहिए हमें. 

ये चोर-चोर भाइयों का खेल अब न चाहिए ,
ये दलबदल, दलों की रेल-पेल अब न चाहिए,
गुनाह से भरे हुए ये हुक्मरान की जगह,
जो न्याय के लिए लड़े, मिजाज चाहिए हमें.
स्वराज चाहिए हमें,सुराज चाहिए हमें.

जो मंदिरों के , मस्जिदों के नाम पर लड़ा रहे ,
जो धर्म, जाति, वर्ग भेदभाव को बढ़ा रहे ,
उन्हें भी ठोकरों पे लो ,जो स्वार्थ से भरे हुए ,
फिर एक नेक , संगठित समाज चाहिए हमें.
स्वराज चाहिए हमें,सुराज चाहिए हमें.

अधूरे स्वप्न रह गए जो वीरवर सुभाष के ,
जो गाँधी, नेहरू,शास्त्री ,पटेल, जयप्रकाश के,
वो भार है हमारे सिर , प्रतिज्ञाबद्ध हो कहो ,
वो बापू वाला सिर्फ रामराज्य चाहिए हमें ,
स्वराज चाहिए हमें,सुराज चाहिए हमें.

Sunday, June 5, 2011

(56) काव्य को धंधा बनाओ

वे जो वास्तव में कविता लिखते हैं, उनके साथ उनके अपने ही घर में क्या गुजरती होगी , इस कल्पना को मैंने कविता के माध्यम से ही शब्द देने का प्रयास किया है .अपने पाठकों का आशीर्वाद और सहयोगियों की टिप्पणी चाहूँगा .


हे मेरे प्रिय कवि सजन ,अब काव्य रचना भूल जाओ,
ध्यान से सुनना हमारी बात ,घर में मन लगाओ .

घर-गृहस्थी में बहुत कुछ चाहिए ,यह जान लो तुम ,
सिर्फ कविता से न चलना काम ,अब यह मान लो तुम.
आज तक तुम थे अकेले, जिस तरह चाहा रहे हो ,
काव्य गंगा में नहाए , मगन हो बहते रहे हो .

पर नहीं अब वह चलेगा , जो कहूं करना पड़ेगा ,
बात न मानी अगर , तो खुद किया भरना पड़ेगा .
अब तुम्हारा गीत हूँ मैं , अब तुम्हारी प्रीत हूँ मैं ,
आज से रचना तुम्हारी मैं ,सुगम संगीत हूँ मैं .

मैं  तुम्हारी कामना, मैं  ही तुम्हारी साधना हूँ ,
मैं  तुम्हारा स्रजन पथ हूँ धर्म, व्रत आराधना हूँ .
आज से कविता तुम्हारी, छंद रस हूँ, भाव हूँ मैं , 
कोकिला की कूक, वासंती पवन हूँ ,छांव हूँ मैं .

दीन  की अभिव्यक्ति पर लिखते रहे ,लेकिन मिला क्या ,
जो अकिंचन हैं स्वयं ही,वे तुम्हे देंगे सिला क्या .
पेट को रोटी नहीं जिनके , तुम्हें क्या दे सकेंगे ,
हाँ तुम्हीं से सिरफिरे कुछ ,वाहवाही भर करेंगे .

शब्द के ही शर चलाते ,आज तक गाते रहे हो,
और बदले में निरर्थक शब्द भर पाते रहे हो .
शब्द सरिता में नहा सकते हो, खा सकते नहीं हो,
आज की असली जरूरत , कभी पा सकते नहीं हो .

कल नहीं यह आज है , जो कठिन, कर्कश,तीत भी है, 
अर्थ युग में सिर्फ पैसा ही सगा है, मीत भी है .
यह नहीं कहती की कविता मत लिखो , पर लिखो ऐसा, 
जो बिक़े बाज़ार में महंगा ,मिले कुछ दाम-पैसा .

आज से कविता नहीं ,दायित्व पहला मैं तुम्हारा ,
इसलिए काव्यत्व छोडो ,कुछ नया सोचो सहारा .
छोड़कर कविता-कहानी , अर्थ के नवगीत गाओ, 
अन्यथा मुश्किल पड़ेगी ,समय रहते चेत जाओ .

समय के संग-संग चलो ,सत्ता समर्थक गीत गाओ ,
रात को दिन, आम को इमली कहो ,पैसा कमाओ .
काव्य को गंगा नहीं-प्रिय, काव्य को धंधा बनाओ ,
बस समर्थों को सराहो ,उन्हीं के यशगीत गाओ .    






Friday, June 3, 2011

(55) ठहर जा वरना अभी

मित्र तुम विषधर अगर ,तो मैं गरल पायी सदाशिव ,
इस जगत का ,मैं हलाहल ही सदा पीता रहा हूँ .
तुम अकेले क्या डराओगे मुझे फुफकार कर के ,
आदि से ही विषधरों के मध्य मैं जीता रहा हूँ .

तोड़ सकता हूँ तुम्हारे दांत ,चाहूं तो अभी पर ,
क्या करूं ,प्रतिकार की मन भावना आती नहीं है .
और तुम मुझको निबलतम मान कर फुफकारते हो
क्योंकि दुर्जन आत्मा ,सदभाव अपनाती नहीं है .

सोचता था ,तुम स्वयं ही समय से कुछ सीख लोगे ,
किसी दिन  विषदंत अपने खुद गडाना छोड़ दोगे .
याकि शायद खुद तुम्हारी अंतरात्मा जाग  जाये ,
और अपनी धृष्टता को तुम स्वयं ही मोड़ दोगे .

क्षम्य थी फुंकार ,लेकिन दंश अब तुम दे रहे हो ,
बस मुझे " भोला " समझकर करवटें तुम ले रहे हो .
रूप प्रलयंकर दिखाने को विवश मुझको करो मत ,
क्यों हमारे धैर्य की , इतनी परीक्षा ले रहे हो

तीसरा यदि चक्षु ही बस खोल दूं मैं ,तो तुम्हारा
जायगा अस्तित्व  मिट,यह मैं स्वयं भी जानता हूँ .
घाव पर ही घाव देते जा रहे ,कितना सहूँगा ,
ठहर जा- वरना अभी बस पाशुपति मैं तानता हूँ .

Thursday, June 2, 2011

(54) भूमि पर आना पड़ेगा


मानता हाथी बड़े हो
क्योंकि सत्ता में खड़े हो
आज ताकत है तुम्हारे हाथ में
मदमत्त हो तुम .
तंत्र के सब यन्त्र थामे हो
स्वयं ही शस्त्र हो तुम .
और हम हैं चींटियों जैसे 
तुम्हारे सामने बस -
रौंद सकते हो निरंकुश 
तंत्र का लेकर सहारा .
वक्त आने पर बताएँगे तुम्हें औकात अपनी 
साक्षी इतिहास -
हर अन्याय का गिरता है पारा .

किन्तु कल जब -
समय का यह चक्र फिर उलटा चलेगा .
जब तुम्हारे प्रभव का सूरज 
क्षितिज में जा ढलेगा .
और हाथों में विरोधी के -
समय का तंत्र होगा .
आज का यह तंत्र -
उसके तेज से अभिमन्त्र होगा.
गिड़गिड़ाओगे हमारे सामने 
आकर दुबारा .

सोच लेना चींटियाँ भी कम नहीं होतीं
अगर समवेत हों तो .
हाथियों को निगल सकती हैं
स्वयं यदि एक हों तो .
और यदि उनमें से कोई
जान की बाजी लगाकर
मत्त गज की नासिका में घुस -
कहीं पर काट पाई
तो तुम्हारा स्वयं का
अस्तित्व ही जाता रहेगा .
इसलिए नीचे भी देखो -
क्योंकि कितना भी उड़ो तुम -
एक दिन तुमको भी निश्चित 
भूमि पर आना पड़ेगा .
और जिनको - 
हीनता की दृष्टि से तुम देखते हो 
द्वार उनके -
याचना का पात्र ले जाना पड़ेगा .  

Wednesday, June 1, 2011

(53) जब न होंगी बेटियां

ख्वाहिशें औलाद की , पर चाहिए बेटा उन्हें
गर्भ में ही मार दी जातीं बिचारी बेटियां .
वजह यह , मुफलिस खरीदें महंगे दूल्हे किस तरह
अब भी बिन पैसे के रह जातीं कुंवारी बेटियां 

एक घर में चार बेटे हों भी तो ,टंटा रहे 
मायका -ससुराल दो-दो घर निभाती  बेटियां 
चाहिए बेटों को दौलत ,जर ,जमीनें ,जायदाद 
 प्यार के दो बोल को भी तरस जातीं बेटियां 

शारदा ,लक्ष्मी ,भवानी देवियों के देश में
 इतनी बेकद्री  की बस आंसू बहाती बेटियां
घर, शहर, सरकार तक एक अजब सा सौतेलापन
किन्तु फिर भी स्नेह का सागर लुटातीं बेटियां . 

बाप, बेटी का ,बहुत कम होता है दुश्मन मगर
जान की दुश्मन वही ,जो खुद कभी थीं बेटियां
होश में आओ दरिंदों ,बेटियों के कातिलों
बहू लाओगे कहाँ से ,जब न होंगी बेटियां .

(52) बहू बेटी से हरगिज कम नहीं होती

ससुर जी बाप,सासू माँ ,ननद जैसे सगी बहना 
नए घर में ,नए परिवेश में आकर भी खुश रहना
पती को देवता ,देवर को भाई ,और घरवाले सगे जैसे 
समझकर भी ,उलाहने और तानों को सहज सहना .

जरा सोचो बहू भी थी किसी की लाडली बेटी 
वो अपने छोड़ ,क्या सपने सजाये साथ लाई है 
जहाँ जन्मी ,पली ,खेली ,बढ़ी उनसे अलग होकर 
बहाती आंसुओं की धार ,लेकर प्यार आयी है 

किसी की और की बेटी , बिना जाये,बिना पाले 
तुम्हारी बन गयी बेटी , खुदा का शुक्रिया करिए 
तुम्हारी खुद की बेटी भी , किसी घर की बहू होगी 
जरा इस बात का भी ध्यान थोड़ा कर लिया करिए 

वो लक्ष्मी है,रुलाओगे तो निश्चय रूठ जायेगी 
वो पूर्णा है ,रहेगी खुश तो सारा घर सजायेगी 
बहू,बेटी से हरगिज कम नहीं होती है ,बढ़कर है 
तुम्हारे वंश की नवबेलि को आगे बढायेगी .      
                                                       

Monday, May 30, 2011

(51) कर्ण वध

 कौन्तेय कर्ण के मध्य उस समय, था चल रहा चरम पर रण 
दोनों की रक्त फुहारों से, रंग रहा धरित्री का कण-कण.

दोनों के विशिख प्रहारों से, क्षत-विक्षत दोनों के शारीर
निर्णायक क्षण की वेला थी, दोनों सम बल, दोनों गंभीर.
इस गति से तीर छूटते थे, दिखता प्रहार न प्रहारांत
श्रम बिंदु मिल रहे श्रोणित से, दोनों के तन मुख श्रमित क्लांत.
उड़ गए पताका ध्वजा क्षत्र, हिल गयी रथों की भी कीलें
मृत रुंड-मुंड से पटी धरा, मंडराते गीध, बाज, चीलें. 

क्रोधित हो तभी धनंजय ने , नारायण शर कर लिया थाम 
तब जान सृष्टि का क्षय निश्चित, देवता उठे कर त्राहिमाम.

पर तभी कर्ण के श्यंदन का, पहिया धंस गया, धरा उर में
रुक गए अस्त्र, थम गया युद्ध, संतोष हुआ कुछ सुर पुर में .

तब वीर कर्ण ने धनुष-बाण  रख दिए विवश रथ के अन्दर 
श्यंदन को छोड़ निहत्था ही आ गया उतर कर धरती पर .

रथ के पहिये को धंसा देख, लग गया उठाने स्वयं वीर 
ज्यौं- ज्यौं बल कर्ण लगाता था, वह धंसता जाता था गंभीर. 

विश्वासघात होगा उससे , इससे नितांत अनजाना था 
कपिला गौ का था शाप फलित, रथ धंसना मात्र बहाना था. 

तत्समय युद्ध के नियमों में वर्जित था वार निहत्थे पर 
अर्जुन ने तत्क्षण  रोक लिया, शर चढ़ा हुआ प्रत्यंचा पर. 

तब कहा कृष्ण ने अर्जुन से, हे वीर करो अपना प्रहार 
ऐसा अवसर रण मध्य नहीं आने वाला है बार-बार .

अर्जुन बोला नियमानुसार है वार निहत्थे पर वर्जित 
निज स्वार्थ हेतु कैसे तज दूँ, जीवन भर की निष्ठा अर्जित?

संजय बोले तब, जुआ युद्ध में विजय हेतु है सभी उचित
है पार्थ यही उपयुक्त समय, मत खड़े रहो अब चित्र खचित.

वैरी क्षत्रिय, महिपाल हेतु कब, कहाँ, कौन सा कार्य हेय
छल है या बल यह मत सोचो, सन्धानो शर धनु कौन्तेय.

सृष्टि के आदि से आज तलक, अपनाई सबने यही रीति
छल-बल से विजय प्राप्त करना , है रही युद्ध की सदा नीति.

जालंधर वध के लिए विष्णु ने वृंदा के संग किया घात
भस्मासुर के विनाश में भी नारी स्वरुप का लिया साथ.

वारिध मंथन में असुरों को , छल से मदिरा पिलवायी थी
पियूष पिलाकर देवों को  युद्ध में विजय दिलवाई थी .

त्रेता में भी रघुनन्दन ने, था किया बालि का वध छल से
फिर मेघनाद, दशकंधर का भी किया न वध केवल बल से .

हमने भी भीष्म पितामह को, छल से रणभूमि हराया था 
फिर उसी नीति से गुरू द्रोण को भी सुरलोक पठाया था .

क्या भूल गए जब द्रुपद सुता को केश पकड़ कर ले आया
निर्वसना करने का प्रयास था दुहशासन ने अपनाया .

जब भरी सभा के बीच , द्रोपदी कड़ी हुई थी निस्सहाय 
तब किसने उसका लिया पक्ष, तब किसने तुमसे किया न्याय ?

तब उसी सभा में भीष्म, द्रोण ने अधर न क्योंकर खोले थे 
क्या होते देख अनीति, कर्ण या कृपाचार्य कुछ बोले थे ?

वह द्यूतकर्म, द्रोपदी विनय, वह लाक्ष्याग्रह का अग्निकांड
क्या भूल गए, अभिमन्यु तनय के कैसे अरि ने लिए प्राण ?

 वे रहे सदा अपनाते छल,कौरव कब चले नीति पथ पर 
है कर्ण उन्हीं का मित्र-बधो, वह रथ पर हो या धरती पर. 

जब रथ का पहिया उठा कर्ण, कर में ले लेगा धनुष-बाण 
तब रोम न उसका छू पाओगे, इतना निश्चित रखो ध्यान.

स्मरण रहे अपने युग का, निश्चय वह अप्रतिम योद्धा है 
दुर्योधन की दाहिनी भुजा, वीरों का वीर पुरोधा है. 

इस समय कर्ण के कन्धों पर, है शत्रु पक्ष का सकल भार 
कौरवी शक्ति का केंद्र बिंदु, सारा इस पर दारोमदार.

कर्ण की मृत्यु का समाचार, जब कौरव दल में जायेगा 
तो तेरा गर्वित शत्रु पक्ष, बलहीन स्वयं हो जायेगा. 

साधन भी है अवसर भी है, है समय तुम्हारे सानुकूल 
दुविधा मत पालो कौन्तेय, मत करो चूक , मत करो भूल. 

है  परशुराम का शिष्य कर्ण सायुध संहार असंभव है
अब तक के युद्ध मध्य अर्जुन, हो चूका तुम्हें भी अनुभव है.

वरदान उन्हीं का है इसको, रण लड़कर नहीं हरा सकता
आयुध हांथों में लिए कर्ण से विजय न कोई पा सकता.

यह सुर्यपुत्र जब हांथों में, थामेगा फिर से धनुष-तीर
दुष्कर ही नहीं असंभव है, तब जीता जाये कर्णवीर.

है वही कर्ण यह, पांचाली को नगर बधू  जो कहता है
कुत्सित व द्वेष का भाव सदा पांडव जन के प्रति रहता है.

इसलिए प्रतिज्ञा पूरण कर, मत सोच उचित-अनुचित क्या है
अन्न्याई के संग नीति युद्ध, यह भाव सर्वथा मिथ्या है.

फिर जन्म- मृत्यु तो निश्चित है,तू  तो बस मात्र बहाना है
आ गयी मृत्यु बेला जिसकी, उसको बस उस क्षण जाना है.

तेरे ही द्वारा और अभी, है लिखा कर्ण वध इसी तरह
शर प्रत्यंचा से जाने दे मत कर विलम्ब, मत रह निस्पृह.

फिर कुरु दल की अनीति का भी, तो नाश तुझे ही करना है
कौरव दल के हर अनुगामी को, फल कर्मों का भरना है.

अब प्राण कर्ण के लेने को, है काल रहा तुझको निहार
दुविधा से बाहर आ अर्जुन, चिंता को तज बस कर प्रहार.

विचलित हो गया धनंजय भी,फंस  यदुनंदन के वाग्जाल
फडकने लग गए अधराधर, हो गए क्रोध से चक्षु लाल.

डगमग हो गई मनः स्थिति, भर गया रोष से अंतस्तल
हो गया विवेक शून्य अर्जुन, उर दहका भीषण क्रोधानल.

शर चढ़ा तुरत प्रत्यंचा पर, फिर खींच श्रवण तक लिया तान
तत्पर अरी वध के लिए पार्थ, फुंकार उठा तक्षक समान.

फिर पलक झपकते चला तीर, विषधर भुजंग ज्यों बल खाकर
मनो पशुपति का ही त्रिशूल, धंस गया कर्ण के उर जाकर.

आघात भयंकर था इतना, हो गया सहन करना दुष्कर
आ गयी मूर्छा क्षण भर में, गिर गया धरनि पर भहराकर.

कुछ क्षण बीते चेतना जगी , सम्मुख देखा यदुनंदन को
आ गयी व्यथा उर की बाहर, वह रोक न पाया क्रन्दन को.

बस बोला इतना हे गिरिधर, था उचित न तुमको पक्षपात
यह विजय पार्थ की नहीं क्योंकि उसने धोखे से किया घात.
निज कुंडल-कवच पुरंदर को, मां को गुरु के दे दिए बाण
बस रण था अब पुरषार्थ मध्य, फिर क्यों धोखे से लिए प्राण?

हैं आप पार्थ पर कृपावान, इससे मुझको क्या लेना था
कौन्तेय-कर्ण को रण पौरुष भी तो अजमाने देना था. 

अब तो यह प्रायः निश्चित है , अंततः  मृत्यु मैं पाउँगा
पर जो अपकीर्ति तुम्हें मिलनी है, उससे रोक क्या पाउँगा ?

माना अनीति पथ दुर्योधन, पर आप रहे कब नीति पक्ष 
यदि कुरुदल की छवि धूमिल थी, तो रही आपकी कहाँ स्वच्छ ?

है विश्व विदित जो नीति भीष्म वध हेतु आपने अपनाई 
फिर गुरू द्रोण की मृत्यु हेतु भी वही क्रिया थी दोहराई .

अब मेरे साथ हुआ जो कुछ, दुःख उसका नहीं रंच भर है 
पर अपयश दंश मिले तुमको, बस  मात्र मुझे इसका डर है.

यह अंतिम विनय आपसे है, संभव हो इसे छिपा जाना 
था कर्ण तुम्हारा ही अग्रज, मत कभी पार्थ को बतलाना. 

संभव था युद्ध नहीं होता, संभव था रुक जाता विनाश 
हों शासक केवल पाण्डुपुत्र, पर कैसे होती पूर्ण आस .

यदि तुम्हें बुआ के पुत्रों का हित  भाता, तो मैं भी तो था 
मैं नहीं पाण्डुसुत था तो क्या, अग्रज था और सहोदर था. 

मैंने इस रण में कई बार, छोड़ा उन सबको अनुज जान 
रण बार-बार मुझसे मिलकर , तुम सदा कराते रहे भान.

हैं पाण्डु पुत्र मेरे भाई, यह तुमने ही बतलाया था 
पर कर्ण तुम्हारा अग्रज है, क्या उनसे यह कह पाया था ?

भगिनी  सुहाग की रक्षा का, था साथ तुम्हारे  जुड़ा स्वार्थ 
इसलिए कुचक्र रहे रचते, तुम सदा बचाते रहे पार्थ. 

अनिवार्य युद्ध था समर भूमि, यह क्षत्रिय की परवशता  थी 
जीवित रहता तो अर्जुन वध, करना प्रण हेतु विवशता थी. 

तब कहा कृष्ण ने मित्र कर्ण, क्यों आया यह अज्ञान तुझे 
वह अंगराज हो याकि पार्थ, दोनों हैं एक समान मुझे .

इस मृत्यु लोक में हर कोई पाता है अपना कर्म भोग 
विधना ने लिखा इसी विधि था, तेरे जीवन में मृत्यु योग. 

जब निश्चित है विधि का विधान , क्या सोच और क्या रोना है 
फिर यश-अपयश या लाभ-हानि तो हर जीवन संग होना है.

तेरे वध से मैंने तो क्या, जग ने अमूल्य निधि खोई है 
तुझसा दानी या मित्र, वीर अब सृष्टि न दूजा कोई है.

प्रभु परशुराम, कपिला गौ  के, वचनों की लाज निभानी थी 
यह निश्चित था विधि का विधान, तब मृत्यु इसी विधि आनी थी. 

है मेरा यह आशीष तुझे, तव कीर्ति युगों तक रहे अमर 
मानापमान या जन्म-मृत्यु, सब कुछ निश्चित है पृथ्वी पर. 

(50) घायल कर्ण की परीक्षा

 संध्या बीती शशि उदय हुआ, आ गया निशा का प्रथम प्रहर
भेड़िये, स्वान, लोमड़, गीदड़ , ध्वनि कुरुक्षेत्र की धरती पर.
लड़-झगड़  रहे नर मांस हेतु निज उदर पूर्ति का लिए सोच
भौंकते,हुवाते, गुर्राते, लोथों से खाते मांस नोच.
कुछ मूर्छित - अर्ध मूर्छित उर, था मृत्यु पूर्व उठ रहा दाह
घावों की पीड़ा से आहत, था रहा कहीं कोई कराह.
कौरव दल  में था गहन शोक इस असमय कर्ण पराजय पर 
था पाण्डु पक्ष गर्वित प्रसन्न, रण मिली आज अर्जुन जय पर .
बातों-बातों में अर्जुन भी कह गया शब्द कुछ दंभपूर्ण 
मैंने रण मध्य कर्ण खल का, कर दिया आज सब गर्व चूर्ण.
उस दुष्ट, नराधम सूतपुत्र की छाती कर विदीर्ण डाली
दुर्योधन की दाहिनी भुजा भी मैंने आज तोड़ डाली.
तब रहा कृष्ण से गया नहीं, चुप रहो पार्थ वह बोल पड़े
मैं साक्षी हर घटना का हूँ,  इसलिए न बोलो बोल बड़े.
उस कर्ण वीर से तेरी रक्षा का, मैंने हर किया यत्न
तेरी जय में मानव तो क्या, देवों के भी कुछ हैं प्रयत्न
जब कुंडल कवच मांगने को, थे गए इंद्र याचक बनकर
प्रभु परशुराम के दिए हुए, कुंती माता ने मांगे शर.
तब नृप विराट गौशाला में, कपिला गौ ने दे दिया शाप
श्यंदन के पहिये को पृथ्वी ने, अपने उर में लिया चांप.
तीनों लोकों का स्वामी मैं, रहता था तव सारथि बनकर
फिर स्वयं पवनसुत रक्षक बन, रण रहते थे तेरे ध्वज पर.
तब मेरे प्रेरित करने पर, निःशस्त्र कर्ण पर किया वार 
सोचो- केवल निज पौरुष बल , तुम कैसे उसको सके मार?
है मरा अभी तक नहीं कर्ण, घायल लड़ रहा मृत्यु से रण 
उस दानवीर योद्धा क्षति से आहत है वसुधा का  कण-कण.
हे पार्थ, कर्ण है वन्दनीय, अक्षुण, अजेय उसका प्रताप
वह बना समय गति काल-ग्रास , अनुचित तेरा मिथ्या प्रलाप.
बोला अर्जुन दानी योद्धा, मैं कैसे मानूं श्रेष्ठ पुरुष 
यदि कर्ण अभी तक जीवित है तो सिद्ध करें उसका पौरुष.
मेरे सहयोगी होकर भी कर रहे शत्रु का यशोगान 
चल युद्धभूमि में सिद्ध करें, तब मानूं मैं उसको महान.
संजय बोले हे कौन्तेय, कामना पूर्ण होगी तेरी
कर निज शंका का समाधान, चल युद्ध भूमि मत कर देरी.
पर कर्ण परीक्षा लेने को हमको याचक बनना होगा
इस वीर रूप को त्याग पार्थ, ब्राह्मण स्वरुप धरना होगा.
थे विप्र वेश में कृष्ण- पार्थ, रणभूमि खड़े बेबस अधीर 
वे ढूंढ़ रहे थे अंगराज का , शवों मध्य आहत शरीर.
खोजते-खोजते बीत चूका था रजनी का दूसरा प्रहर 
मोहन के पैरों से तब ही  टकराया कर्ण वीर का कर.
बोला राधेय कौन हो तुम, क्या खोज रहे हो शवों बीच
भेड़िये, श्रंगालों में मानव, क्या तुमको लायी मृत्यु खींच ?
संजय बोले हे मनुज श्रेष्ठ, हम दोनों ही याचक ब्राह्मण
पथ  विस्मृत होकर निशा मध्य, आ गए इधर करते विचरण

क्या शिविर बता सकते हो तुम , उस कर्ण वीर का, दानी का 
हम दर्शन लाभ चाहते हैं , उस सूर्यपुत्र वरदानी का.
हे विप्र देर कर दी  तुमने, है कर्ण अकिंचन स्वयं आज 
जो दानवीर कहलाता था, वह शेष कहाँ अब अंगराज ?
बोले  माधव उस दानी का घाट सकता किंचित मान नहीं 
हे वीर कदाचित तुम्हें, कर्ण के बारे में कुछ ज्ञान नहीं.
कैसी भी विषम परिस्थिति में वह सक्षम है सामर्थ्यवान 
इस समय विश्व में  और नहीं, उससा कोई दानी महान
उससे मिल अब तक गया नहीं, कोई भी याचक रिक्त हाँथ 
उस दानवीर की दानशीलता, की लाखों है अमिट गाथ.
तब कहा कर्ण ने विप्र वृन्द , समझाउं तुमको किस प्रकार 
वह दानवीर, वह महाबली, अक्षम है इस क्षण हर प्रकार.
हूँ मै हतभागा  वही कर्ण, पहचानो मुझको हे द्विजवर 
यदि चाहूं भी तो क्या दे दूँ, कैसे दे दूँ तुमको  प्रियवर ?
दुर्भाग्य  इसलिए भी मेरा , कुछ दे न सकूँगा मैं तुमको 
मृत्योपरांत  भी खेद रहेगा , विप्रराज  इसका मुझको.
यह सुनकर क्षण भर सोच, पुनः छोड़ी माधव ने दीर्घ स्वांस 
फिर बोले क्या जाना होगा, अब होकर ब्राह्मण को निराश ?
आ रहा समझ में है मेरी, इन बातों का बस यही सार 
होता था दानवीरता का अब तक तेरी मिथ्या प्रचार.
तब कहा कर्ण ने-विप्र नहीं याचक निराश जाने दूंगा 
जो संभव है समयानुकूल , वह निश्चय ही तुमको दूंगा .
 संभाव्य  विप्र को अर्पित कर , संतोष हृदय कर लेता हूँ
दो दांत स्वर्ण मंडित मेरे, वे तुम्हें दान कर देता हूँ.
पर इसके लिए पड़ा सम्मुख, पाषाण खंड दे दो मुझको
जिससे प्रहार कर तोड़ सकूँ, कर सकूँ इन्हें अर्पण तुमको.
बोले माधव मुझसे श्रम ले, तब तू श्रममूल्य चुकाएगा
यदि ब्राह्मण प्राप्त करे श्रम से, तो दान कहाँ रह जायेगा ?
तब मुष्टि मार कर निज मुख पर, रविसुत ने डाले तोड़ दांत
फिर उनको जड़ से खींच सहज, उपक्रम कर निज रख लिया हाँथ.
बोला हे विप्र ग्रहण कर लो , इस लघुतम भेंट हमारी को
है कर्ण न अब पहले जैसा, समझो उसकी लाचारी को.
बोले माधव हे दानवीर मैं जूठा दान नहीं लेता
ब्राह्मण को देने से पहले कम से कम इनको धो लेता .
पृथ्वी पर घिसट-घिसट कर तब, भट ने संधाने धनुष-बाण
लेटे-लेटे प्रत्यंचा पर, फिर तीर श्रवण तक लिया तान.
अगले क्षण कर से निकला शर , कर गया धरा का उदर पार
पल बीता बाहर उबल पड़ी, धरती से जल की तीव्र धार.
उस जल से धोकर दांतों को तब किया कर्ण ने स्वर्ण दान
मरते क्षण तीनों लोकों के, स्वामी से भी लिया मान.
तब प्रगट हो गए कृष्ण चतुर्भुज, विप्र रूप को दिया त्याग
साक्षात् विष्णु ने सम्मुख हो , कह दिया वत्स जो चाह मांग.
बोला राधेय आपको पा, क्या चाह रह गई पाने की ?
अब तो हे नाथ कृपा कर दें, आज्ञा बस निज पुर जाने की.
सारा जीवन साधक, ऋषि, मुनि, तिल-तिल जल करते हैं प्रयास
हो सफल तपस्या किसी भांति, हो जाय किसी विधि पूर्ण आस.
पुनि-पुनि नर तन ले यही क्रिया, वे बार-बार अपनाते हैं
तब भी दर्शन आपके नाथ, उनको दुरूह हो जाते हैं.
साक्षात् आपको पा करके, है कर्ण धन्य हो गया आज
इससे न अधिक कुछ भी संभव, फिर मांगे क्या, क्यों अंगराज?
बोले माधव ऋषि मुनियों से, हो परम श्रेष्ठ तुम दानवीर
निज उर पुर देता वास तुम्हें, अब तज दो यह नश्वर शरीर.
यह पञ्चभूत निर्मित शरीर, यद्यपि पृथ्वी पर है नश्वर
पर फिर भी तेरी कीर्ति कथा, युग-युग तक होगी अजर-अमर.




   

(49) होली

                                        १.
फागुन भीर अबीर, गुलाल
                   पलाश के रंगन सों रंगी होली
मौर धरे सिर बौर रसाल
                 चले मनौ लेन को दूल्हन डोली
भौरन राग सुरीले कहूँ 
                  सुर में कहूँ पंचम कोकिल बोली 
घूमै वसंत सुगंध लिए 
                 सिर में दई सेमर के रचि रोली. 

                                  २.
नूतन वर्ष के स्वागत में 
                सब साज संवारि चली तन होली 
गेंहूँ, चना, जौं कान्धेन  पै 
                चली फूलन सों सजवाय कै डोली 
राग, मल्हार बजावत, गावत
               कोकिल, भ्रंगन की लिए टोली 
पौन सुगंध बिखेरत संग 
              दई मग नाइ अबीरन झोली.

                         ३.
स्वागत में नववर्ष के आगम के 
             यह साज सिंगार है होली 
प्रेयसी-प्रेमियों के हिय में
            भर लायी वसंत बहार है होली
भारत में मनभावन, पावन
           पर्व नहीं उपहार है होली
दूर करो मन की कटुता
          खुला मेल-मिलाप का द्वार है होली.

(48) वह बहारे लखनऊ

ऐ चमनज़ारे जहाँ, ऐ नाज़नीनाने अवध
रश्क-ए- सद गुलज़ार शहरा, ऐ हसीनाने अवध
अब कहाँ शाम-ए- अवध, रश्क-ए-नज़ारे लखनऊ 
वह नवाबाने नफ़ासत, वह बहारे लखनऊ.

वो अदब, वो कायदा, तहजीब, वो शान-ए- अवध 
वो बहार-ए-खुल्द, वो रौनक, वो ईमान-ए- अवध 
शायरों की महफ़िलों का यादगार-ए- लखनऊ 
है कहाँ वो किस्सा गो, नगमा निगारे लखनऊ

अब कहाँ शाहानापन वो, और वो नाज़-ओ-अदा  
मंदिरों की घंटियाँ और वो अज़ानों की सदा
गंगा-जमनी तरबियत का वो दयार-ए-लखनऊ
मुल्क की चादर का वो सलमा सितारे लखनऊ

महफ़िलों की शोखियाँ वो और लफ़्ज़ों की मिठास 
और वो उडती पतंगें गोमती के आस-पास 
वो तमद्दुन की कशिश ,वो हुस्न-ए-ज़ारे लखनऊ
वो सुकून-ए-दिल, वो दिलवर, वो करार-ए-लखनऊ      

(47) उसमें मुझमें कुछ भेद नहीं

मैं उसमें हूँ, वह मुझमें है, उसमें मुझमें कुछ नहीं भेद
मुझमें उसमें अंतर इतना, ज्यों मूल और प्रति का विभेद.

जैसे बगिया में खिले फूल, जैसे मिटटी  में बसी धूल
जैसे पुष्पों संग लगे शूल, जैसे वृक्षों से जुडी मूल
जैसे मारुत में बसी गंध,जैसे कविता में रचे छंद
जैसे शरीर के रंध्रों से ,छनकर निकलें श्रमबिंदु  स्वेद 
मैं उसमें हूँ, वह मुझमें है, उसमें मुझमें कुछ नहीं भेद.

जैसे सरगम से बने गीत, जैसे प्रियतम से जुडी प्रीत
जैसे मिर्ची में बसी तीत , जैसे मिटटी से बने भीत
जैसे सागर से मिले सरित ,जैसे बादल में बसी तड़ित
ज्यों पन्नों में इतिहास बसा, जैसे छंदों में रचे वेद
मैं उसमें हूँ, वह मुझमें है, उसमें मुझमें कुछ नहीं भेद.

जैसे शारीर में बसे प्राण, नासिका बसे ज्यों शक्ति घ्राण
जैसे मिठास से युक्त खांड,ज्यों प्रत्यंचा में चढ़ा बाण
जैसे वीणा में बजें तार ,जैसे प्रयाग में त्रिनद धार
ज्यों चातुर्मास महीनों में, हों वारि राशि से भरे मेघ 
मैं उसमें हूँ, वह मुझमें है, उसमें मुझमें कुछ नहीं भेद.

जैसे फूलों में हो पराग, जैसे पाहन में छुपी आग 
जैसे सागर जल उठे झाग , जैसे सूची में फंसा ताग 
जैसे धरती से मिले गगन , जैसे सुगंध ले बहे पवन 
मेरी सुध उसने विसरा दी, बस इतना मुझको रहा खेद 
मैं उसमें हूँ, वह मुझमें है, उसमें मुझमें कुछ नहीं भेद. 
  

(46) सत्य जो होतो बिरंचि मैं तौ

कायर को भुजहीन बनावतो, शूरन चारि भुजा रचि देतो
दानिन के कर देतो बड़े करि, सूमन के कर ही हरि लेतो
कर्ण विहीन  बनावतो चोरन, नासिका वक्र छिछोरन देतो
मूक लबारन को करतो, अरु सत्य की वाणी गिरा भरि देतो.

दंभिन को कृश देतो शारीर, विनम्रता में ममता भरि देतो
धीरन में रचतो पुरुषार्थ, अधीरन की क्षमता हरि लेतो
कामिन देतो कपाल पै घाव , सुजानन के मुक्ता जड़ी देतो
निंदक को स्वर देतो उलूक, कवीन को कोकिला सो स्वर देतो.

भोगिन को करतो मुख सूकर, योगिन तेज ललाट पै देतो 
दुर्जन नासिका हीन बनावतो, सौम्यता साधुन में भरि देतो
देतो दरिद्र कुचालिन को,व्यभिचारिन नेत्र विहीनता देतो 
लम्पट देतो विडाल सो आनन, ज्ञानिन में पटुता भरि देतो .

सींग उगावतो हिंसक के, दयावान में वास वसंत को देतो
लार बहावतो लोलुप के, उपकारिन को कल्पद्रुम देतो 
कील उगावतो क्रोधिन के मुख, सौम्यता में सुचिता भरि देतो 
''सत्य'' जो होतो बिरंचि मैं तौ, सुविचारिन आस सुधा भरि देतो.    

(45) इसको सुबुद्धि देना महेश

कोई फल खाता है कोई चारा भूसा ही खाता है
कोई पत्ते खाकर जीता, पर मांस किसी को भाता है

मुहँ से तो कोई नाक लगा पानी पीने की अलग विधा
कोई चाट-चाट कोई सुड़क-सुड़क देखी जाती इनमें विविधा

कोई एक सींग, कोई दो सिंगा, कोई बारह सींगों वाला है
है बिना सींग के भी अनेक कोई लिए नाक पर भाला है

कुछ पूछ युक्त, कुछ पूछ हीन, पूछें भी हैं कैसी-कैसी
छोटी, मोटी,पतली, झबरी, रस्सी जैसी, झाड़ू जैसी 

पत्ती जैसे, पत्तों जैसे तो सूप सरीखे कोई कान
मोटे, पतले, कुछ गिरे- खड़े, है कड़े मुलायम कोई कान

लम्बी गरदन, ऊँची गरदन, छोटी गरदन, मोटी गरदन
है कोई ग्रीवा नाम मात्र, तो को आठ फुटी गरदन

पंजोंवाला, कोई फीलपांव, कोई पैर और कोई खुरवाला 
कोई नाल जडाता टापों में, फिर चलता होकर मतवाला.

कोई लम्बोदर, कोई उच्च पृष्ठ, कोई विविध रंगों की लिए शान 
आकार किसी का अति लघुतम, कोई विशाल पर्वत समान

कोई फुदक-फुदक, कोई मस्त चाल, कोई सरपट दौड़ लगाता है 
कोई उछल कूद में दक्ष  और डाली-डाली मंडराता है 

रेंकता, रंभाता, मिमियाता, कोई चिंघाड़ लगाता है 
गर्जत, भौकता है कोई, लेकिन कोई गुर्राता है .

पशु अपनी इन्हीं भिन्नताओं से जाति-वर्ग में हैं विभक्त 
लेकिन मानव में क्या अंतर, क्यों मनुज , मनुज के लिए त्यक्त 

आकार बनावट एक सदृश फिर भी फैला ईर्ष्या द्वेष
नर ज्ञानवान होकर अजान, इसको सुबुद्धि देना महेश


Sunday, May 29, 2011

(44) वह मेरी ज़िन्दगानी है

न वह हूरों की शहजादी, न वह परियों की रानी है
मैं उससे प्यार करता हूँ, वह मेरी ज़िन्दगानी है.

वह एक भोली सी लड़की है कि जैसी आम होती है
उसी के नाम से मेरी सुबह और शाम होती है
मैं उस चेहरे पर मायूसी कभी भी सह नहीं पाता
हमारे प्यार की यह एक छोटी सी कहानी है
मैं उससे प्यार करता हूँ वह मेरी ज़िन्दगानी है.

मेरे घर जब से आई है बहारों में बहारें है
महकता सा लगे आँगन, चहकती सी दीवारें हैं
मैं सारी देवियों के रूप उसमें साथ पाता हूँ
वह लक्ष्मी, शारदा, सीता है, कल्याणी, भवानी है
मैं उससे प्यार करता हूँ वह मेरी ज़िन्दगानी है.

वह अक्सर रूठ जाती है तो सारा घर मनाता है
उसी की मुस्कुराहट से मेरा घर मुस्कुराता है
वह जो चाहे वही होता कोई इफ-बट नहीं होता
हमारे घर में उसकी ही, फकत शाह-ए-जहानी  है 
मैं उससे प्यार करता हूँ वह मेरी ज़िन्दगानी है .

वह दद्दा की चहेती है, वह दादी शा की प्यारी है
वह माँ की मानिनी बेटी, वह बापू की दुलारी है
मैं उसको देख सारे गम ज़माने के भुला देता
वह सबका ख्याल रखती है, मगर थोड़ा गुमानी है
मैं उससे प्यार करता हूँ वह मेरी ज़िन्दगानी है.

वह मेरा मान है, सम्मान है, इज्जत है, नेमत है
हमारे वास्ते अहले खुदाई की वह रहमत है
मैं उसका बाप हूँ, उसको बड़े नाजों से पाला है 
वह मेरी प्यारी बेटी है, सलोनी है सयानी है 
मैं उससे प्यार करता हूँ वह मेरी ज़िन्दगानी है .