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Sunday, May 29, 2011

(43) अनुतरित से

कभी नेह के मेह रहा करते थे जिन पलकों में
और कभी हम खोये रहते थे जिनकी अलकों में.

उन पलकों से आज प्रश्न प्रायः बरसा करते हैं
अलकों में अब छाँव नहीं सूखे बादल रहते हैं.

जिस पग ध्वनि से मन वीणा के तार बजा करते थे
देह गंध से जिसकी, हरसिंगार  झरा करते थे.

उस पग ध्वनि में साज नहीं हैं, उलाहनें-तानें हैं
हरसिंगार की मधुर गंध से अब हम अनजाने हैं.

थे हम स्वयं जवाब, सवालों से भी खूब लड़े हैं
अनुतरित से प्रश्न बने पर खुद ही आज खड़ें  हैं.

(42) घर नहीं होता

मकां जिनके नहीं है पास, उनके पास घर तो है
मगर महलों में रहते हैं जो, उनका घर नहीं होता.

दर-ओ-दीवार, बैठक, छत  बना लो ईंट, गारे से
हवेली और बंगले, कोठियों से घर नहीं होता.

दिलों को दूर कर देती है दौलत, बाँट देती है
मियां हर मर्ज़ का नुस्खा कभी भी जर नहीं होता. 

पता उनको भी है लेकर न जा सकते यहाँ से कुछ
मगर फिर भी हवश का जोश हरगिज कम नहीं होता.

ये है तो उसकी ख्वाहिश , और वह है तो बड़ी ख्वाहिश
इन्हें दौलत रहे, सब जाय, कोई गम नहीं होता

(41) वह कविता कहाँ है?

 हैं कहाँ वे कवि निराले, और वह कविता कहाँ है
उस नुकीली कलम वाले और वह कविता कहाँ है
हाँ वही कविता-
कि जिसकी साँस में पुरवाइयाँ थीं
और जिसकी गंध लेकर बौरती अमराइयाँ थीं
और वह कविता-
कि जिससे स्वाभिमानी स्वर जगे थे
याकि जिसकी चेतना से, डर फिरंगी तब भगे थे
कर गई जो देश को परतंत्रता से मुक्त
वह कविता कहाँ है?

हाँ वही कविता-
कि जिसकी अग्नि से सूरज बना था
और जिसके स्वाभिमानी बोल सुन गिरिवर तना था
रंग से जिसके हंसी थी घास,  उपवन मुस्कुराये
गंध से जिसकी खिले थे फूल, पौधे लहलहाए
कर गयी सारी धरा को धान्य-धन से युक्त
वह कविता कहाँ है?


हाँ वही कविता-
कि जिसको सुन भ्रमर दल गुनगुनाये
कूक जागी कोकिला की, और पक्षी चेह्चेहाये
और वह कविता
कि जिसकी हंसी से शैशव झरा था
मुस्कुराहट में उमंगें, भ्रकुटि में तांडव भरा था
जो सदा दुःख और सुख में भी रही संयुक्त
वह कविता कहाँ है?

हाँ वही कविता-
जिसे सुन फड़क उठतीं थीं भुजाएं
विजित होते देश थे, थीं गूंजती जय से दिशाएं
और वह कविता
कि जिसमें ईद,होली का मिलन था
दीपमाला की प्रभा थी, ज्योति से लोहित गगन था
थी जहाँ हर वर्ग के प्रति हृदय में अनुरक्ति
वह कविता कहाँ है?





(40) अर्चना कैसे करूँ

अज्ञान हूँ मैं माँ, तुम्हारी अर्चना कैसे करूँ
तव वंदना की पंक्तियों में, भावना कैसे भरूं

तूने चराचर जीव, निज आलोक से झंकृत किये
दी मूक को वाणी तुम्हीं ने, और कवि को स्वर दिए
सब प्राणियों में ज्ञान का संचार तूने ही किया
तव कृपा बिन जागृत जगत की कल्पना कैसे करूँ
अज्ञान हूँ मैं माँ, तुम्हारी अर्चना कैसे करूँ

तू ज्ञानियों का ज्ञान है, विद्वतजनों की विद्वता
है प्रेरणा का स्रोत तू, अन्तः करण  की शुद्धता
तेरी कृपा से नित नए सोपान चढ़ता है मनुज
तव प्रेरणा से हीन कोई कामना कैसे करूँ
अज्ञान हूँ मैं माँ, तुम्हारी अर्चना कैसे करूँ.

हंसासना, पद्मासना हे मातु वीणा धारिणी
वाणी,गिरा, हे शारदे, मातेश्वेरी, स्वर साधिनी
अपनी दया का दान दे, कर मुझ अकिंचन पर कृपा
यूँ  चाह कर भी अम्ब तेरी साधना कैसे करूँ
अज्ञान हूँ मैं माँ, तुम्हारी अर्चना कैसे करूँ.

इहलोक क्या, परलोक क्या बिन ज्ञान सब निस्सार है
मतिमंद के उर की प्रभा तू सार का भी सार है
कुविचार के तम से घिरा संसार सारा है यहाँ
तू ही बता ऐसे जगत का सामना कैसे करूँ

Saturday, May 28, 2011

(39) मेघों ने प्रीत लुटा डाली

बारिश की रिमझिम बूंदों से धरती की प्यास बुझा डाली
प्यासों के सहज निवेदन पर मेघों ने प्रीत लुटा डाली.

सागर का पानी तप-तप कर बन वाष्प क्षितिज वातान हुआ
उस सघन वाष्प संयोजन से, फिर बादल का निर्माण हुआ
तिल-तिल मिल रूप विराट बना, वह नभ में गरज रहा था जो
पावस के प्रणय निवेदन पर निज हस्ती स्वयं मिटा डाली.

फिर तृप्त हुई धरती पुलकी, जुट गई सृजन, संयोजन में
वन उपवन के खिल गए गात, हरियाली छाई तनमन में
फिर शीत मरूत के झोंकों से, कुछ झिझकी सिमटी कायनात
प्रियतम की प्रेम प्रतीक्षा में, झूमने लगी डाली-डाली.

फिर कोयल कूकी डाली से, आया प्रियतम प्यारा वसंत
मद रस छलकाती बही पवन, महकने लग गये दिग-दिगंत
पी कहाँ पपीहा की पुकार , अलि वृन्दों का मधु लय गुंजन
ऋतुराज-प्रकृति का आलिंगन, मधु की मदिरा छलका डाली.    

(38) कलम

इसका हूँ मैं,यह मेरी है, मैं प्रियतम हूँ यह आली है
इस धन से मैं धनवान, यशस्वी हूँ, यह अति गुण वाली है
अरि के सम्मुख यह वज्र और मुझ निर्बल संग बलशाली है
कैसी भी विषम परिस्थिति  हो करती हर दम रखवाली है.

इसका सिर हिमगिरि से ऊँचा, उर जैसे हिंद महासागर
इसका है लघुतम रूप किन्तु, यह जैसे गागर में सागर
इसमें सब रस, सब अलंकार, संधियाँ भाव हैं एक साथ
इसकी स्मृतियाँ हैं अनंत , रहतीं  सक्रिय दिन और रात.

इसमें है माँ का वात्सल्य, भगिनी सा निर्मल प्यार भरा
मानिनी प्रेयसी का गौरव , पत्नी जैसा अनुराग भरा
इसका हर बूँद जलधि सा है, वसुधा को देता नयी आस
इसकी हर साँस वसंत लिए, भर देती जन-मन में हुलास.

इसमें अमूल्य जीवन निधि है, नित नयी आस भर सकती है
यह प्रलयंकर का महाताप, सर्वस्व नाश कर सकती है
यह सर्जक है,यह भंजक है, यह चंडी है, कल्याणी है
बधिरों के कानों का स्वर है, यह मूक मुनुज की वाणी है.

यह महाक्रान्तियों की जननी, है महा मिलन का सेतु यही
डूबते राष्ट्रों का जीवन, उत्कर्ष प्रगति का हेतु यही
इसका आदर कर राष्ट्र, प्रगति के शिखरों को छू लेते हैं
वे विश्व मध्य पूजे जाते , जो इसे समादर देते हैं.

इसकी ज्वाला के लगते ही, हर अनाचार जल  जाता है
इसका पाकर के वरद हस्त, मानव कुंदन बन जाता है
छूकर मसि कागज मात्र, कलम यदि महाक्रान्ति कर सकती है
तो नयी दिशा की वाहक बन विश्व में शांति भर सकती है.

यह दुर्गा है, कल्याणी है, हम सब मिल इसे प्रणाम करें
हे रचनाकारों आओ, जनमानस में नव आयाम भरें.  

(37) मोहब्बत

दर-ए-दिल हर किसी के सामने खोला नहीं जाता 
मोहब्बत को तराजू पर कभी तोला  नहीं जाता 
परों को प्यार के परखा न जाता खुर्दबीनों से
ज़हर ज़ज्बात के रिश्तों में यूँ घोला नहीं जाता 

गिले शिकवे मोहब्बत में हर एक बेला नहीं करते
ये नाजुक कांच हैं , फेंका यहाँ ढेला नहीं करते
सफीना डूबने के दर से जो मायूस रहते हैं
वो लहरों से समंदर की कभी खेला नहीं करते

मोहब्बत की नहीं जिसने वो उसका सार क्या जाने
जो इस एहसास से महरूम है वह प्यार क्या जाने
किसी दिल में उतर जाना, किन्हीं आँखों में बस जाना
बना जाता किसी का किस तरह दिलदार क्या जाने

कोई मंदिर ओ  मस्जिद, चर्च , गुरुद्वारा  नहीं होती
कोई चाहत नहीं होती, कोई प्यारा नहीं होता
न कोई तुरबतें होतीं, न बनता ताज दुनिया में
किसी की आँख का कोई कभी तारा नहीं होता

जवानी की कहीं कोई कहानी भी नहीं होती
न खिलते फूल गुलशन में रवानी भी नहीं होती
मोहब्बत बिन खुदाई क्या, खुदा भी खुद नहीं होता
कहीं इंसान की कोई निशानी भी नहीं होती

कोई लैला, कोई मजनू, कोई फरहाद न होता
मोहब्बत के लिए कोई कहीं बर्बाद न होता
ये दर्द-ओ-गम नहीं होते,कोई रिश्ते नहीं होते
कोई कुनबा, कोई बस्ती, नगर आबाद न होता  

(36) गजल

मेरे साथ है तेरी जुस्तजू, तू सुकून-ए-दिल है, करार है
मेरे दर्द-ए-दिल की दवा है तू  , उजड़े चमन की बहार है .

मेरी जिंदगी, तेरी शायरी, तेरी शायरी मेरी जिंदगी
मेरा फ़िक्र-ओ-फन मेरी शायरी तेरी एक अदा पे निसार है.

ये खुदा से है मेरी इल्तिज़ा, तू जहाँ रहे वहां खुश रहे
मेरा क्या है, क्या मेरी आरजू, मेरा सिरफिरों में शुमार है

मैं हूँ मुबतिला तेरे वस्ल में, तुझे क्या सुनाऊं मैं हाल-ए-दिल
हमें बैठने न दे चैन से, ये अजब तरह का खुमार है

मेरी हसरतें, मेरे रंज-ओ-गम से तू हो भले ही बेखबर
मेरी जिंदगी तेरी चाहतों में अब जलील-ओ-खार है.

(35) यत्न निरंतर करने वाला सदा जयी होता है

 राजा एक छिपा बैठा था गिरी गह्वर के अन्दर
तीन युद्ध वह हार चुका था शत्रु पक्ष से लड़कर.

शत्रु पक्ष से भीत निराशा थी अंतर्मन छाई
शिला खंड से तभी फिसलती चींटी पड़ी दिखाई.

खाद्य पदार्थ दबा था मुहँ में किन्तु न उसने छोड़ा
गिरकर संभली पुनः लक्ष्य पत्थर पर अपना मोड़ा.

पिछली गति से तेज़ चढ़ रही थी इस बार शिला पर
अर्ध मार्ग से पुनः फिसल वह गिरी भूमि पर आकर.

ऐसे पांच प्रयास किये पर सफल न वह हो पाई
छठवीं बार कड़ी मेहनत कर वह ऊपर तक आई.

देख रहा था राजा यह सब मन्त्रमुग्ध सा होकर
जो निराश बैठा था इस क्षण अपना सब कुछ खोकर.

चींटी की यह लगन देख रजा में पौरुष आया
इस घटना ने आशा दृढ़ता का संकल्प जगाया.

सोचा भाग्य सहारे रहने वाला ही रोता है
यत्न निरंतर करने वाला सदा जयी होता है.

वह बाहर आया फिर बिखरे सूत्र संभाले सारे
गज, तुरंग, रथ सैन्य और आयुध सब नए सवाँरे.

नई शक्ति सहस से वैरी राजा पर चढ़ आया
सत्ता मद में चूर शत्रु को रण में मार गिराया.

(34) कुँए का मेढक

वृष्टि अनवरत थी जारी, भीषण वर्षा के मारे
नदी, ताल, वन और खेत जलमग्न हो गए सारे.

उसी बाढ़ में सागर का मेढक भी बाहर आया
दैव योग ने उसे ठेलकर कुँए तलक पहुँचाया.

लेकिन उसे देखते ही कूपे का मेढक बिदका
कुँए मध्य हो अब तक का जीवन बीता था जिसका.

कौन, कहाँ के हो तुम और यहाँ तक कैसे आये
मार्ग भ्रमित हो गए, याकि पानी में बहकर आये?

भीषण वर्षा से सम्पूर्ण धरा जल प्लावित भाई
यही बाढ़ मुझको सागर से यहाँ तलक ले आई.

वह बोला सागर क्या है? क्या वह दूसरा कुआँ है
तुम्हें देखकर मेरे मन में संशय तनिक हुआ है .

सागर तो असीम है भाई, उसकी तुलना भ्रम है
लाखों कुँए मिलें तब भी सागर के सम्मुख कम हैं.

कुँए का मेढक बोला- है भाग्य तुम्हारा फूटा
सागर और कुँए से बढ़कर निकल यहाँ से झूठा.

मैं जीवन भर निकल न पाया इस कुँए के बाहर
तू बहकर आ गया यहाँ, कहता विशाल है सागर.

याद रखो जिसने जीवन में जितना कुछ देखा है
उसके ज्ञान क्षेत्र की बस वह ही अंतिम रेखा है.

(33) पत्ता भी नहीं हिलेगा

लाद कुल्हाड़े गुजर रही थी जंगल से एक गाड़ी
छोटे पेड़ सोच यह भागे आई विपदा भारी.

बीच राह में एक बड़ा बूढा वट वृक्ष खड़ा था
छोटे वृक्षों की तुलना में अनुभव जिसे बड़ा था.

उसने पूछा आखिर तुम सब कहाँ जा रहे भागे
कुछ पीछे आ रहे और कुछ निकल चुके हैं आगे?

तब उनमें से एक पेड़ ने बरगद को बतलाया
जंगल में आ चुके कुल्हाड़े हम पर संकट आया.

बरगद बोला क्या उनसे अपना भी बन्धु मिला है
अर्थ, कुल्हाडों के अन्दर लकड़ी का बेंट पिला है?

नहीं अकेले हैं वे, स्वर समवेत सभी का आया
तब बरगद ने उन्हें धैर्य देकर  ऐसे समझाया.

याद रखो जब तक दुश्मन से अपना नहीं मिलेगा
तब तक तुम्हें काटना क्या पत्ता भी नहीं हिलेगा.  

(32) मैं विद्रोही बन जिया सदा


कुछ लोग हवा के साथ चले, धारा के साथ बहे  होंगें
लोगों की नजरों में शायद वे ही तैराक रहे होंगे
मैं सदा चला विपरीत धार, मझधार-पार से क्या लेना
मैं विद्रोही बन जिया सदा, फिर जीत-हार से क्या लेना.

गद्दों पर उनको नींद नहीं, मैंने धरती पर सुख पाया 
वे फूल कुचलते निकल गए, मैंने काटों को अपनाया
उनको न चैन था महलों में, मैं खपरैलों में रहा मस्त 
मैं लड़ा अनल की लपटों से शीतल  फुहार से क्या लेना 
मैं विद्रोही बन जिया सदा, फिर जीत-हार से क्या लेना.

मेरी दस दिन की रोटी में, उनका बस एक निवाला था
बाहर से जितना उजले वे, अंतरतम उतना काला था
छल-छदम न मैंने अपनाया, मैं हूँ पुस्तक का खुला पृष्ठ
मैंने प्रकाश को अपनाया, फिर अन्धकार से क्या लेना
मैं विद्रोही बन जिया सदा, फिर जीत-हार से क्या लेना.

था सुना आग की लपटों से सोना कुंदन बन जाता है
पत्थर पर घिस जाने पर ही मेंहदी का रंग दर्शाता है
गोरी के गले लगा न सही,न उसकी रचा हथेली पर
संघर्ष मार्ग का राही मैं, मुझको बहार से क्या लेना
मैं विद्रोही बन जिया सदा, फिर जीत-हार से क्या लेना.

वे छिपकर तीर चलाते थे, मैंने छाती पर सहे वार
वे रहे कोंचते घावों को, मैंने बदले में दिया प्यार
वे रहे लूटते, हम लुटते,पर मैंने छोड़ा नहीं लक्ष्य
सहलाया मैंने चोटों को, मुझको प्रहार से क्या लेना
मैं विद्रोही बन जिया सदा, फिर जीत-हार से क्या लेना.

(31) घुट-घुट कर जीना, जीना क्या?

जीना तब तक हंस कर जीना, घुट-घुट कर जीना, जीना क्या !
पीना तब तक छक कर पीना , छुप-छुप कर पीना, पीना क्या !
                   जब दिया ओखली  में सर को
                   चोटों की परवाह क्या करना
                   जब एक बार चुन लिया मार्ग
                   फिर तूफानों से क्या डरना
क्या आंधी, वर्षा, अन्धकार, ऋतु मौसम और महीना क्या !
जीना तब तक हंस कर जीना, घुट-घुट कर जीना, जीना क्या!
                  मेरी असफलताओं को लख
                  माना कुछ जन हँसते होंगे
                  मेरे पीछे जनचर्चा में कुछ
                  व्यंग बाण कसते होंगे
मैं फाड़-फाड़ कर सीता हूँ, उस फटे हुए को सीना क्या !
जीना तब तक हंस कर जीना, घुट-घुट कर जीना, जीना क्या !
               जो बीत गया उसका क्या दुःख
              जब रात गई तो बात गई
              क्या एक चोट को सहलाना
              हमने हैं झेले घात कई
पी महादेव के प्याले को, अमृत प्याले का पीना क्या !
जीना तब तक हंस कर जीना, घुट-घुट कर जीना, जीना क्या !
             सीखा होगा तुमने पाकर
             हमने खोकर के सीखा है
             मीठे का स्वाद एक क्षण का
            वह याद रहे जो तीखा है
औरों के लिए जिया मैं तो, खुद का जीना ही जीना क्या !
जीना तब तक हंस कर जीना, घुट-घुट कर जीना, जीना क्या !

Friday, May 27, 2011

(30) लेखनी

मूल्य क्या उस लेखनी का सत्यताजो कह न पाई
जो उठी यश गान में नर के, करूँ कैसे बड़ाई.

लेखनी वह जो निबलतम में नया पुरुषार्थ भर दे
जो समर्थों के ह्रदय में क्षमा, करुणा, प्यार भर दे
धार हो तलवार की जिसमें, विनय हो ,प्यार भी हो
हो मृदुलता अमिय की, उर में जलधि का ज्वार भी हो.

लेखनी वह जो अनाथों को शरण दे, प्रेरणा दे
बेसहारों को सहारा और जन को चेतना दे
हृदय में अनुराग भर दे, सौम्यता शुचिता बढ़ाये
पथ प्रदर्शित करे जन का, राह भटके को दिखाए.

लेखनी वह जो प्रगति पथ कंटकों से हीन कर दे
दंभ के, अन्याय के, मद के विभव को क्षीण कर दे
राजभय से भीत होकर शीश मत अपना झुकाए
शक्ति दे अन्याय के प्रतिकार  की, दृढ़ता बढ़ाये.

दीन की अभिव्यक्ति हो जिसमें, दलित का आर्त स्वर हो
शोषितों की वेदना के प्रति समर्पण भी प्रखर हो
अनाचारों से लड़े जो सदा जनगण की लड़ाई
है उसे शत-शत नमन आओ करें उसकी बड़ाई.




(29) प्रश्न?

याचना से बड़ी कौन दयनीयता
भावना से बड़ी कौन कमनीयता
कामना से बड़ी क्या असहनीयता
साधना से बड़ी कौन रमणीयता.
                                              प्रश्न जीवन मरण से बड़ा कौन सा
                                              धर्म मां के चरण से बड़ा कौन सा
                                              नीति सहभागिता से बड़ी कौन सी
                                              पंथ सदभावना से बड़ा कौन सा.
कौन सी हार दुर आचरण  से बड़ी 
कौन सी जीत सद आचरण से बड़ी
कौन सी हानि अपमान जैसी बड़ी 
कौन सा लाभ सम्मान जैसा  बड़ा.
                                             शत्रु दुर्भावना से प्रबल कौन सा 
                                             मित्र निज आत्मबल से सबल कौन सा 
                                             नीर देवापगा सा धवल कौन सा 
                                            छीर जननी हृदय सा विमल कौन सा.
कर्म दायित्व की पूर्ति से क्या बड़ा
मर्म निज आत्म अनुभूति से क्या बड़ा
प्रीति अनुराग परमार्थ से क्या बड़ा
शास्त्र अरु ग्रन्थ पुरषार्थ से क्या बड़ा.
                                           मोह जैसा बड़ा आत्मछल  कौन सा
                                           लोभ जैसा बड़ा दुष्ट खल कौन सा
                                           दंभ जैसा जगत में निबल कौन सा
                                           क्रोध जैसा प्रबलतम अनल कौन सा.
कौन सा क्लेश जग में विरह सा दुखद
कौन सा हर्ष प्रिय के मिलन सा सुखद
विष्व भर में भला क्या गगन सा वृहद्
कौन सी प्राप्ति है ज्ञान जैसी विशद.
                                        सृष्टि में ग्लानि जैसा गरल कौन सा
                                        नेत्र के अश्रु जैसा तरल कौन सा
                                        मातु के स्नेह जैसा सरल कौन सा
                                        दामिनी धुति तड़ित सा चपल कौन सा. प्रश्न?



Thursday, May 26, 2011

(28) यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था

कोयल की कूक और महकी सी अमराई
मोर की मुरलिया से  बजती थी शहनाई
बाल व किशोरों की दौड़-धूप,चहल-पहल
छप्पर की बेलों पर चिडियों का कोलाहल 
रामू और बिरजू का यहीं कहीं ठांव था 
यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.
                  नीम की निमौड़ी की कच्ची पक्की छमियां 
                  सनई की फलियों की कल्लो की करधनिया
                  बांसों के झुरमुट की बंशी की आवाजें
                  यहीं उस बड़े वाले पीपल का छाँव था 
                  यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.
चमकीले खंजन की वह प्यारी सी फुदकन
बगुलों की कों-कों और गौरैया की थिरकन
तोतों के झुण्ड वे, कबूतरों की गुटर गूं वह
यहीं पर कौओं का होता कांव-कांव था
यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.

                 खेतों की मेड़ें और धूल भरे गलियारे
                 पोखर वे, पनघट वे, गलियां वे चौबारे
                 नदी की कछारों में लोटती पड़ी भैसें
                 रामदीन काका का यहीं एक नाव था
                 यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.

गाय का रम्भाना और बकरी का मिमियाना
पेड़ों के पीछे वह सूरज का छिप जाना 
चोखे का, दीनू का, घुरहू का, झीनू का
हम सब का आपस में कितना लगाव था 
यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.

               गूलर की गंध और सोने सी पकी फसलें 
               बौर और फूलों पर बैठकर मधुप रस लें
               सरसों का साग और मक्के की रोटी का
               हाथ मथे मठ्ठे का आहा क्या चाव था
               यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.
रमई की गैय्या वह, बकरियां फरीदन की 
तीतर दुलारे के, मुर्गियां अमीरन की 
सकटू की भेड़ों का साथ-साथ चलना वह 
लगता नदी का सा मंथर बहाव था
यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.

             नदियों की रेती में गाँव का अखाड़ा वह
             धोबीपाट, कालफांस दावों का नज़ारा वह
             कसरती शरीरों  की कुश्ती और डंड बैठक
             फागू से मैंने यहीं सीखा पेंच-दांव था
             यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.

बिरहा की, आल्हा की, चैता की तानें वे
कजरी के, फगवा के मोहक तराने वे
काका की पगड़ी और चुन्ना की फटी कमीज़
दादा की मूछों का अपना ही ताव था
यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.

           बोझों में, मीलों तक फैले खलिहानों में
           कितना था हेल-मेल गाँव के किसानों में
           हलवाहे काका की प्यारी सी गोदी वह
           ऊँच-नीच, भेद-भाव न कोई दुराव था
           यहीं कहीं मेरा वह छोटा सा गाँव था.

(27) हम भारत के गौरव किसान

हम भारत के गौरव किसान, हम वसुधा के वैभव किसान
हम भूमिपुत्र, हम कृषक वीर, हमसे जग में धन और धान्य.

हमने पाषाण सदृश धरती, पर भी निज हल को खींचा है
सूखी वसुधा के चरणों को, अपने श्रम जल से सींचा है
निर्जीव मृदा में हमने ही निज श्रम से पूरित किये प्राण
हम भारत के गौरव किसान, हम वसुधा के वैभव किसान.

हम कृष्ण सखा, अग्रज, हलधर बलदाऊ के अनुयायी हैं
भाषा, भूषा या जाति धर्म से परे कृषक हम भाई हैं
अपने पौरुष से जीवन हित जन-जन को करते अन्न दान 
हम भारत के गौरव किसान, हम वसुधा के वैभव किसान.

हम भरी दोपहर में खेतों की मिटटी से टकराते हैं 
घुटनों तक पानी में घुसकर वर्षा में धान लगाते हैं 
लड़ते हम शीत लहर से भी वह निशा प्रहर हो या बिहान 
हम भारत के गौरव किसान, हम वसुधा के वैभव किसान

निज मातृभूमि का शीश जगत उन्नत करने की आशा है  
पूरित हो धरा धान्य-धन से अपनी इतनी अभिलाषा है
कमाना, विश्व में पुनः बढे भारत का वैभव और मान
हम भारत के गौरव किसान, हम वसुधा के वैभव किसान 





(26) नगर

तब भी यहाँ सभी धर्म, जातियां और सम्प्रदाय थे
नगर हमारी संस्कृति के वाहक और सभ्यता के पर्याय थे 
सभी लोग-
पीर की मजार पर चादर चढाते थे 
होली में रंग खेलते, ईद पर गले मिलते
और बैसाखी पर नाचते गाते थे .
किन्तु आज-
यहाँ भी लोगों के सोच बौने हो गए हैं 
हम दायरों में सिमटकर
राजनैतिक बाज़ीगरों के हाथों के खिलौने हो गए हैं. नगर

(25) दरिंदों का शहर

 लखनऊ कैसा ये बरपा है  तेरे घर में कहर
 शहर-ऐ-तहजीब है इस दौर दरिंदों का शहर.

कहीं बलवा और कहीं कत्ल, कहीं डाकेजनी
मिल्ल्तों का ये शहर आज है दंगों का शहर.

अदब-ओ-तहजीब पे ग़ालिब हैं बदजुबा फिकरे
हर तरफ यक सा नुमायाँ है लफंगों का शहर. 

बीती बातें हैं नफासत और वो शाम-ए-अवध 
बदनुमा लग रहा है आज ये रंगों का शहर. 

 कैसे कह दूँ कि फ़िदा हम व लखनऊ हम पर
 है ये अब सिर्फ और सिर्फ दबंगों का शहर.  

Wednesday, May 25, 2011

(24) आदमी और इंसान में फर्क क्या?

                 जो निराकार मंदिर में भगवान है
                 वह ही दूजे को मस्जिद में रहमान है
                 जिसने मंदिर बनाया वह है आदमी
                 जिसने मस्जिद बनाई वह इंसान है
बेवजह  के बखेड़े बिला नीव के, राम में और रहमान में फर्क क्या
एक पूजा करे इक इबादत करे, आदमी और इंसान में फर्क क्या.
                कोई मंदिर में जाकर  के पूजा करे
                कोई गुरद्वारे  जाकर के माथा धरे
                कोई सिजदा करे मस्जिद-ओ-चर्च में
                कोई तन पर मले खाक विनती करे
रास्ते हैं जुदा एक मंजिल मगर, जग के मालिक की पहचान में फर्क क्या
एक पूजा करे एक इबादत करे, आदमी और इंसान में फर्क क्या.
                कौन मजहब सिखाता बहाना लहू
                कौन सा धर्म इंसानियत छोड़ना
                कौन कहता कि मजलूम पर जुल्म कर
                कौन हैवानियत की तरफ मोड़ना
हो गुरुग्रंथ  साहिब कि हो बाइबिल, वेद, गीता व कुरआन में फर्क क्या
एक पूजा करे एक इबादत करे, आदमी और इंसान में फर्क क्या .
               धर्म ग्रंथों के हर एक सफे पर हमे
               बस लिखी एक जैसी इबारत मिली
               सबसे मिलकर रहो सबको लेकर चलो
               सबमें बस एक अल्लाह का नूर है
पादरी, मौलवी, पंडितों का वहम, गाड, अल्लाह, भगवान् में फर्क क्या
एक पूजा करे एक इबादत करे, आदमी और इंसान में फर्क क्या .
               अपने मकसद के ही खातिर ही इंसान ने
               धर्म-ओ-मजहब की खाई की इजाद की
               और फिरकापरस्तों की चालों ने फिर
               उनको गहरा बनाने में इमदाद की
एक इंसान को खौफ इंसान का, आदमी और शैतान में फर्क क्या
एक पूजा करे एक इबादत करे, आदमी और इंसान में फर्क क्या .
meri kavitayen

(23) वीरवर कर्ण

रण वीरगती को प्राप्त कर चुके, थे अब तक योद्धा अनंत
भट भीष्म पितामह,  गुरु द्रोण, दोनों का था हो चुका अंत
कुरु सैन्य नियंत्रण और युद्ध, उसके निर्देशों पर निर्भर
सेनापतित्व का भार आज, था कर्ण वीर के कन्धों पर
-------
पैदल से पैदल, गज से  गज, थे भिड़े हुए योद्धा समान  
अश्वारोही सैनिकों   मध्य भी, मचा हुआ था घमासान
रथी, महारथी योद्धा स्यंदन पर , चढ़कर  थे कर रहे युद्ध
नभ से सुरगण इस अप्रतिम रण को देख   रहे थे मंत्रमुग्ध
---------
अर्जुन-राधेय सुभट दोनों, थे एक दुसरे के समक्ष
आयुध-आयुध टकराते थे, पर निबल न था एक भी पक्ष
रक्ताभ नेत्र चपला सी गति, दोनों की भृकुटी तनी हुई 
शरवृष्टि अनवरत थी ऐसी, मानों नभ बदली घनी हुई
---------
थे व्यर्थ हो रहे दिन भर से , दोनों पर दोनों के प्रहार
पर नहीं निकलता दीख रहा था, उनके रण का कोई सार
गिर रहे धरा थे टूट-टूट, दोनों के आयुध टकरा कर 
दोनों थे पीड़ित रोम-रोम, पर नहीं प्रदर्शन था मुख पर
---------
रण मध्य किन्तु फिर भी दोनों , थे नहीं शस्त्र रखने वाले
क्रोधित वनराज सदृश दोनों, भट जूझ रहे थे मतवाले
अवसान दिवस का था समीप, दिनकर आभा थी मलिन श्रांत
लड़ते लड़ते रण मध्य इधर, कौन्तेय-कर्ण थे श्रमित क्लांत
--------- 
क्रोधित रविसुत ने तरकश से, चाहा निकालना तभी  तीर 
फुंकार उठा विषधर भुजंग, जो उसमें बैठा था अधीर 
आश्चर्यचकित रह गया कर्ण, सोचा मन-यह कैसी माया
मेरे तूणीर मध्य कैसे, यह विषधर तक्षक घुस आया?
---------
बोला सक्रोध मेरे तरकश में, बैठा क्या कर रहा दुष्ट
व्यवधान बन रहा है रण में, क्यों मुझे और कर रहा रुष्ट,
मैं जान रहा तू शत्रु दूत, चाहता मुझे तू डस लेना
पर कीट पतंगों का वध कर,चाहता न मैं अपयश लेना
---------
बोला तक्षक हे अंगराज मैं शत्रु नहीं हितकामी हूँ
इस समर भूमि में आया बस बन कर तेरा अनुगामी हूँ
हे वीर शत्रु जो तेरा है, वह ही वैरी मेरा भी है
जो लक्ष्य जन्म से मेरा है वह लक्ष्य आज तेरा भी है
---------
जग के भुजंगों का स्वामी हूँ मैं अश्वसेन कहलाता हूँ
अर्जुन का शत्रु जन्म से हूँ, पर पहुँच न उस तक पाता हूँ
बस तेरे ही शर हैं समर्थ, उसके श्यन्दन तक जाने में
हो सकते तुम्हीं सहायक हो,मुझको उस तक पहुचाने में
---------
निज शर पर कर आरूढ़ वीर, बस उस तक जाने दे मुझको
अर्जुन को अंतिम निद्रा में अविलम्ब सुलाने दे मुझको
जीवन भर का संचित निज विष, जब उस पर वमन करूँगा मैं
फिर विजय तुम्हारी निश्चित है, क्षण में ही प्राण हरूँगा मैं
---------
बोला राधेय अरे विषधर, तू समझ न मुझको पाया है
है सर्प जन्म से मनुज शत्रु, नर मित्र कभी कहाया है
फिर कैसे तुने सोच लिया यह, तेरा मित्र बनूंगा मैं
अर्जुन से भट से विजय हेतु, तेरी सहायता लूँगा मैं ?
---------
संघर्ष, शत्रुता नहीं सदा, यह मात्र इसी जीवन भर है 
जय और पराजय, लाभ-हानि , सब कुछ विधना पर निर्भर है 
अर्जुन है मेरा शत्रु किन्तु नर है वह कोई नाग नहीं 
पर मैं उससे जय पाने में, दे सकता तुझको भाग नहीं 
---------
हे अश्वसेन अपने मन  से तज दे ऐसा कुत्सित विचार
करने दे सकता कभी सिंह, क्या औरों को अपना शिकार?
तेरी सहायता से निश्चित जय पाउँगा है मुझे भान
पर ऐसी जय पा शेष रहेगा कर्ण वीर का कहाँ मान
---------
जा चला मनुज के दुष्ट शत्रु, सहयोग न मुझसे पायेगा
जीते जी ऐसा घृणित कर्म राधेय नहीं कर पायेगा  

Tuesday, May 24, 2011

(22) आंकड़ों में देश

चीथड़ों में जिन्दगी हो या कि भूखे पेट हों पर
आंकड़ों में देश यह खुशहाल रहता है हमेशा.
                         झूठ की बुनियाद पर तीमार होती हैं इमारत 
                         यह सियासत में यहाँ का हाल रहता है हमेशा.
साल भर में भी नहीं फाइल सरकती इंच भर भी
दफ्तरों का काम कछुआ चाल रहता है हमेशा.
                        प्यार की भाषा समझ  आती नहीं सरकार को भी
                        पर दबंगों के लिए तर माल रहता है हमेशा.
वायदों बातों के लच्छेदार भाषण रोज लेकिन
सच ये डाली पर चढ़ा बेताल रहता है हमेशा.
                      झूठ मक्कारी जिन्हें आती वही खुशहाल हैं बस
                      सत्य बेचारा यहं बदहाल रहता है हमेशा.

(21) राजनीति

हमारे राजनीतिबाजों ने ऐसा कुछ किया है
की राजनीति की नीति को सांगोपांग जिया है
सुनते हैं की लड़ाओ और राज करो अंग्रेजों  की नीति थी
शायद उस समय राजनीति की यही रीति थी
किन्तु वे जाते हुए अपने इस मूल मन्त्र को -
भारतीय राजनीति से जोड़  गए
अंग्रेज चले गए कितु अपने मानस पुत्रों को यहीं छोड़ गए.
यह भारतीय राजनीति का राज है
कि जो जितना विध्वंसक है वह उतना बड़ा राजनीतिबाज है. राजनीति

(20) जलना होगा

जग को यदि प्रकाश देना है
तो बाती बन जलना होगा
सस्य श्यामला धरती करने हित
हिम बनकर गलना होगा.
---------
राम, कृष्ण, नानक, सुभाष की
गाथाओं के पृष्ठ देख लो
देने या पाने दोनों में
कंटक पथ पर चलना होगा.

(19) कहना होगा

जल में रहकर मगरमच्छ के
हर नखरे को सहना होगा
बलशाली के बल से या फिर
भय से दबकर रहना होगा.
----------
युग-युग से सारी दुनिया की
प्यारे ये ही रीत रही है
हो प्रतिकूल समय तो
काका गदहे तक को कहना होगा.

(18) घर के पहरेदार सो गये

रक्षक ही भक्षक बन बैठे, जन सेवक बटमार हो गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
           उन्हें छोड़कर उनको पकड़ा
           उनको छोड़ा उनको पकड़ा
           किन्तु जिसे हमने अपनाया
           उसने ही गर्दन को जकड़ा
हर चुनाव में थोथे वादे , नारों से दीवार भर गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
         होली और दिवाली फीकी
         फीकी ईद और बैसाखी
         रक्षा सौदों बीच दलाली
         क्या मतलब रखती अब राखी
क्रिसमस भी छुट्टी तक सीमित, फीके सब त्यौहार हो गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
        अक्षम आयुध लेकर लड़ते
        सीमाओं पर लड़ने वाले
        खुद की पीठ ठोंकते शासक
        मरते रहते मरने वाले
कौन दवा अब करे रोग की, वैद्य स्वयं बीमार हो गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
       भय अब नहीं शत्रु से उतना
       जितना मित्र घात का भय है
       अविश्वास का घना अँधेरा
       निज प्रतिछाया पर संशय है
करें भरोसा कैसे किस पर, मतलब के व्यवहार हो गये
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.
       भरी सभा में झूठ बोलते 
       हया हो गयी हवा हवाई 
       सावधान अब तो कुछ चेतो 
       ये सब मतलब के सौदाई
बड़े-बड़े नेता भी अब तो, लोलुप और लबार हो गये 
हुई लुटेरों की पौ बारह, घर के पहरेदार सो गये.

(17) तिल तिल कर के गलते देखा

भरी दोपहर तपती धरती
रवि किरणें ज्वाला बरसातीं
और हवा की भीषण गति में
रह रह कर लपटें बल खातीं
वस्त्रहीन शिशुओं को मैंने
देखा फुटपाथों पर जलते
फटे चीथड़े में माओं को
तिल तिल कर के गलते देखा. 

जल-थल सारे एक हो गए
मूसलधार बरसता पानी
झोपड़ियों में घुस घुटनों तक
वारि राशि करती मनमानी
छप छप कर कीचड पानी में
कीड़ों जैसा जीवन जीते
आश्रयहीन समूहों में भी
जनमानस को पलते देखा.

पौष माघ की कड़ी शीत में
गोदी में दुधमुहाँ दबाये
पाले कुहरे और ओस में
लघु वस्त्रों में लाज छुपाये
लाखों ललनाओं को मैंने
देखा भूख प्यास से व्याकुल
कृश शरीर निर्वसन देह में
वृद्ध जनों को ढलते देखा.

दैव तुम्हारी रचना में तो 
मानव सबसे श्रेष्ठ कहाता
कितु बिलाव स्वान मूषक के
जैसा भी वह भाग्य न पाता
रजत पीन्जरों में मूषक सुत
क्षीर बिलावों को मिलता  है
और सुन्दरी की गोदी में
स्वान पुत्र को पलते देखा.
तिल तिल कर के गलते देखा.

Monday, May 23, 2011

(16) जीवन

जीवन एक अबूझ पहेली
हर पग एक नई डगर है
हर मग पर उलझन अलबेली
जीवन एक अबूझ पहेली.

योग, घटाना, गुणा, भाग
या लघुत्तम, गुरुत्तम से सुलझाओ
नए सूत्र नित नई विधाएं
फिर-फिर जोड़ो और घटाओ
जोड़-जोड़ थक गयी जिंदगी
आखिर खाली हाँथ हथेली 
जीवन एक अबूझ पहेली.

अमरबेलि सी इसकी लड़ियाँ
अमरलता जैसी लतिकाएँ
ओर-छोर का पार न मिलता
चाहे जितना भी सुलझाएं
चक्रव्यूह की संरचना सी
हर क्षण यह करती अठखेली 
जीवन एक अबूझ पहेली.

गोद, पालना, किलकन, थिरकन 
बचपन, यौवन और बुढ़ापा 
जन्म, जवानी जरा, म्रत्यु तक 
मन से मिटा न पाए आपा
गठरी गांठ रहा मन बांधे
पाई ऐसी बुद्धि हठेली
जीवन एक अबूझ पहेली.

लम्बा सफ़र लक्ष्य अनजाना
प्रतिपल,प्रतिक्षण चलते जाना  
पथ समतल हो याकि विषम हो
सुख-दुःख हंसकर सहते जाना
छूट गए सब मेले पीछे
अंत समय रह गयी अकेली
जीवन एक अबूझ पहेली.


(15) कितना सुन्दर वह बचपन था

छोटे न बड़े का अंतर था, न उंच-नीच का भेदभाव
था लाभ- हानी का खेद नहीं, न सुख-दुःख का कोई प्रभाव
खेलना और खाना सोना बस केवल इतना जीवन था
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.

क्या अपने और पराये क्या, सारा संसार हमारा था
सबका प्रिय, सबका स्नेह पात्र, सबकी आँखों का तारा था
मेरी किलकारी क्रीडा से घर भी बन जाता उपवन था
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.

खेलना, झगड़ना या लड़ना, रूठना, मनाना ही बस था
पर हम सब के उस झगडे में भी एक अनूठा ही रस था
संवादहीनता का हो जाता कुछ पल बाद समापन था
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.

हम बढे और दूरियां बढीं, फिर भेद-भाव पनपा मन में
हम उच्च और वे दलित, नीच विष लगा दीखने चन्दन में
अब वे भी खिचे-खिंचे से थे, रह गया न वह अपनापन था  
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.

सोचो बच्चे हैं श्रेष्ठ, याकि अब हम वयस्क हो अच्छे हैं 
हम घृणा, स्वार्थ, तिकड़म में रत, वे कितने सीधे-सच्चे हैं 
अब सीमाओं में बंधे हुए, तब सारा ही जग आँगन था 
मस्ती के दिन मधुमय रातें कितना सुन्दर वह बचपन था.


(14) वह मुझसे प्यार करता है

वह जब भी साथ होता है, तो अक्सर ही झगड़ता है 
कभी किस बात को लेकर, कभी बेबात लड़ता है 
झगड़ना, रूठना, लड़ना भी चाहत की निशानी है 
मैं उससे प्यार करता हूँ वह मुझसे प्यार करता है

वह हँसता है तो लगता है की नदियाँ खिलखिलाती हैं
तबस्सुम ले के उसकी फूल-कलियाँ मुस्कुराती हैं
दिवाली का उजाला है, है उसमें रंग होली का
वह सावन की फुहारों सा मुझे सरसार करता है

कुछ ऐसी वख्त की मजबूरियां हैं, मिल नहीं पाता
मुसलसल रात-दिन चलता हूँ पर मंजिल नहीं पाता
मैं थकता हूँ तो उसकी याद की थपकी सुलाती है
वह मेरे दिल में रहता है, वह दिल के साथ रहता है

मैं वह भंवरा न जो हर फूल-पत्ती देख ललचाता
हर एक तितली के पंखों पर हमारा दिल नहीं आता
बिठा लूँ उस जगह कैसे किसी भी ऐरे-गैरे को
जहन पर मेरे दिल की दुनिया का सरताज रहता है ?

(13) दो ख़त

उसने मुझको इस जीवन में
कितनी ही बार लिखे ख़त हैं
पर मैं जो अब तक समझ सका
तो दो ही मुझे दिखे ख़त हैं.

पहले कुछ ख़त जिनमें केवल
था प्यार- प्यार कुछ और नहीं
पर उसके बाद लिखे जितने
शिकवे इतने कुछ ठौर नहीं.

तीतर के आगे था तीतर
तीतर के पीछे था तीतर
आगे तीतर, पीछे तीतर
तो आगे-पीछे था तीतर.

जैसे इस सहज पहेली में
वे सारे ही तीतर दो थे
बस उसी तरह उसके सारे
वे ख़त मिलकर के भी दो थे.

(12) तेरे दृगों का नीर रानी

पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी
और उससे भी अधिक तेरे दृगों का नीर रानी .

आज तक हमको मिले विश्वास के पथ पर अँधेरे
मित्र बन छलते रहे हमको सदा मग के लुटेरे
पर बदल सकता नहीं अपनी प्रकृति मैं भी विवश हूँ
हो भले ताने खड़ा सिर पर समय शमसीर रानी
पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी .

मैं हिमालय का समूचा भर सिर पर ढो रहा हूँ
बांस जैसा था तना लेकिन धनुष अब हो रहा हूँ
घाव हो यदि एक तो उसको दिखाऊँ भी तुम्हें मैं
इस ह्रदय में बिंधे हैं अगणित विषैले तीर रानी
पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी.

कौन लाया कौन लेकर जायेगा वैभव यहाँ से
सब यहीं रह जाय खली हाँथ जाते सब जहाँ से
इसलिए जो है उसी में खुश रहो , खुशियाँ लुटाओ
बांटता कोई किसी का दुःख नहीं यह बात जानी
पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी .

पीर अपनी ही रही मेरे ह्र्दय को चीर रानी
और उससे भी अधिक तेरे दृगों का नीर रानी .




Monday, April 25, 2011

(11) निष्काम कर्म

था कहा  कृष्ण ने कर्म वश्य प्राणी नर जीवन पाता है
निष्काम कर्म का वाक्य स्वंय फिर प्रश्न मात्र रह जाता है
निष्काम भाव से करे कर्म तो लक्ष्य कहाँ रह जायेगा
क्या लक्ष्यहीन मानव जीवन में कभी सफल हो पायेगा?

कामना जब तलक  है मन में जीवन गतिमान तभी तक है
जब तक उद्देश्यपूर्ण गति है, जीवन वरदान तभी तक है
उद्देश्यहीन नर इस जग में, पग-पग ठुकराया जायेगा
फिर निरुद्देश्य, निस्पृह, निरीह कैसे कोई  रह पायेगा?

गुरु, पिता, सखा, जननी, भगिनी, पत्नी, सुत हो या प्राणी मात्र
किसके प्रति  कैसे रखें  भाव, कर्तव्य  सिखाते हमें शास्त्र  
हो धर्म, अर्थ  या काम, मोक्ष  प्राणी जब उस  पथ  जायेगा
कामनाहीन  रहकर  कैसे फिर लक्ष्य वेध  कर  पायेगा?

उस कंस नाश में जननि, जनक मुक्ति का ध्येय ही छाया था
फिर सगी  बुआ के  पुत्रों  हित  कृष्ण  ने युद्ध  रचवाया  था
पूतना, बकासुर वध, कालीदह  में भी  थे कुछ निहित स्वार्थ  
निष्काम  कर्मयोगी  कैसे फिर कहा कृष्ण को  जायेगा?  

(10) हथियार गहेंगे

मौन रहे अब भी यदि तो फिर बढ़ते अत्याचार रहेंगे.
सहनशीलता  की सीमा है आखिर कब तक भार सहेंगे .

कहीं हवाला, कहीं घोटाला, कहीं तहलका डाट काम है
किसको कौन किस तरह पकडे चोरों में तीसरा नाम है
दफ्तर, अफसर, मंत्री सब का पैसा ही बस लक्ष्य रह गया
विभ्रम, विवश, विवेकशून्य हम कब तक इनका साथ गहेंगे .

सैन्यायुध खरीद में भी अब शासन करता गोलमाल है
देश लुटेरों के हाथों में चोरों का बिछ रहा जाल है
कौन करे  प्रतिवाद किसी का, चोर-चोर मौसेरे  भाई
यही लुटेरे कल चोरी, रिश्वत अपना अधिकार कहेंगे

हर चुनाव में गलती अपनी दोष दूसरों को देते हैं
स्वार्थ विवश या फिर दबाववश बाहुबली को चुन लेते हैं
छूट  लूट की जब दी हमने तो फिर जग से रोना कैसा
आखिर कब तक शोषित पीड़ित बेबश और लाचार रहेंगे .

जाति, धर्म की सीमाओं से देश न बाटें नेक राय है
दल की निष्ठा छोड़ चुने हम व्यक्ति यही अंतिम उपाय है
आज न चेते तो निश्चित  है भावी  पीढ़ी की बरबादी
युवा रक्त लेगा उबाल तो कलम  छोड़ हथियार गहेंगे .

Sunday, April 24, 2011

(9) कैसे मान लें हम

इस अमा की रात को वरदान कैसे मान लें हम.
है प्रगति पथ राष्ट्र का अभियान कैसे मान लें हम .

स्वार्थ, लिप्सा, कुटिलता, कुविचार हर मन में भरा है
अराजकता, अनृत, छल, अन्याय से पूरित धरा है
स्वहित पोषण ही जहाँ पर नीति शासक वर्ग की  हो
उस स्वशासन  को भला वरदान कैसे मान लें हम .

हम प्रगति पथ अग्रसर हैं देश में नित घोषणायें
किन्तु अब तक बेअसर है नीतियाँ सब योजनायें
योजना या घोषणा का  षष्ठमांश कृतित्व दुष्कर
चढ़ सकेंगे प्रगति के सोपान कैसे मान ले हम .

वेश, भूषा, तत्त्व, दर्शन, धर्म आयातित  जहाँ पर
और अपना धर्म, भाषा, वेश ही शापित जहाँ पर
अनुकरण  होता जहाँ पर दूसरों की सभ्यता का
राष्ट्र का होगा वहां  पर उत्थान कैसे मान लें हम .

नीति सिखलाते हमें अब हैं उजालों के लुटेरे
बस इसी से नीति पथ , सनमार्ग पर बादल घनेरे
दम्भ, हिंसा, द्वेष, ईष्र्या से प्रदूषित  आज जन मन
इस निशा में उदय होगा  भानु कैसे मान लें हम .

(8) नेकी का फल

ठसाठस भरी हुई नगर बस-
गोद में दुधमुहा शिशु दबाए खड़ी नवयौवना  को देखा-
त्यों ही -
मेरे मन में सहानुभूति  की चिंगारी फूटी
मैंने अपनी सीट से उठते हुए कहा-
बहन जी बैठ जाइये .
बच्चा भीड़ में परेशान हो जायेगा-
खड़े होने का कष्ट मत उठाइए.
उसने मुझे भस्म कर देने वाली नजरों से-
घूरते हुए कहा -
बदतमीज़ी करते हो शर्म नहीं आती ?
क्या तुम्हारी माँ बहने बस में नहीं जातीं ?
हम इस अप्रत्याशित स्तिथि पर परेशान थे .
तब तक देखा -
हमारे सीट पर एक और भद्र पुरुष विराजमान थे .
पड़ोस की सीटों पर बैठे लोग -
मेरी दयनीय स्तिथि पर मुस्कुरा  रहे थे .
और हम-
अपनी सीट खुद छोड़ कर पछता रहे थे.


नेकी का फल

(7) कुएं में ही भाँग है

अपने विवाहित मित्रों की दृष्टि में-
मैं आवारा हूँ.
क्योंकि तीस वसंत देखने के बाद भी
अभी  तक क्वांरा  हूँ .
अब तुम्हें क्या बताऊँ
अजब सूरते हाल है
इस महंगाई में एक पेट लेकर तो जीना  मुहाल है .
खैर मैंने अपना साहस बटोर
और मित्रों की हिकारत का जवाब देने के लिए
वैवाहिक विज्ञापन का मसौदा कुछ इस तरह जोड़ा .
तीस वर्षीय लम्बे, छरहरे, गौरवर्ण, स्नातकोत्तर  युवक को -
एक अदद पत्नी की तलाश है .
प्रतिउत्तर के ढेरों खतों को पढ़-
अब मेरा मन बिलकुल  निराश है.
लगभग हर उम्मीदवार  की -
दहेज में  कार और रंगीन टीवी की मांग है.
अब आप ही सुझाएँ - मैं क्या करूँ
यहाँ तो कुएं में ही भाँग है.