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Wednesday, September 12, 2012

(166) दीवाना बना डाला

      
हकीकत को तेरी इक जिद ने अफसाना बना डाला /
तेरी  मासूमियत  ने , मुझको   दीवाना  बना डाला /

ये दुनिया भी तेरी ही हमनवा , दुश्मन हमारी है ,
तुझे रोशन शमा  ,तो मुझको परवाना बना डाला /

तू समझे या न समझे , अपने दिल को तेरी फुरकत में ,
हमेशा  के  लिए  मैंने  ,  सनमखाना  बना  डाला /

तेरी ही याद की वर्जिश , सुबह से शब् तलक हर दम ,
ये दिल अब दिल कहाँ है,  दिल को जिमखाना बना डाला /

मैं फाकेमस्त हूँ  , मुझको ज़मीं ज़र की ज़रुरत क्या ,
तेरी  उल्फत  की  दौलत  ने  ही  , शाहाना बना डाला /

                                        -  एस.एन.शुक्ल  

16 comments:

expression said...

बहुत बढ़िया गज़ल ....

सुन्दर शेर ...

सादर
अनु

मनीष said...

sundar rachana hai....

Pradeep said...

बड़ी अल्हड़ गजल है शुक्ला जी ...
"तू समझे या ना समझे, अपने दिल को तेरी फुरकत में ...
हमेशा के लिए मैंने सनाम्खाना बना डाला " ... वाह !

dheerendra said...

वाह ,,,,बहुत बेहतरीन गजल,,,,,बधाई शुक्ल जी

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Anita said...

उल्फत ऐसी ही होती है..सुंदर रचना !

प्रवीण पाण्डेय said...

बेहतरीन रचना..

Rajesh Kumari said...

वाह बेहतरीन ग़ज़ल बधाई आपको

S.N SHUKLA said...

Anu ji,

स्नेह मिला , आभारी हूँ .

S.N SHUKLA said...

Manish ji,
Pradeep ji,

आपकी स्नेहिल शुभकामनाओं का आभार .

S.N SHUKLA said...

Dheerendra ji,
Anita ji,

आपसे इसी स्नेह की अपेक्षा थी , आभार .

S.N SHUKLA said...

Pravin pandey ji,
Rajesh Kumari ji,
आभार आपकी शुभकामनाओं का .
.

Amrita Tanmay said...

बहुत सुंदर..वाह..

S.N SHUKLA said...

Amrita Tanmay ji,

स्नेह मिला , आभारी हूँ.

shalini said...

वाह....क्या बात है, हरेक शेर लाजवाब है|

Udaya said...

बहुत खूब:)

S.N SHUKLA said...

Shalini ji,
Uday ji,

ब्लॉग पर आगमन और समर्थन का आभार.